मंत्रालय: 
आवास एवं शहरी गरीबी उपशमन (एलिविएशन)
  • प्रस्तावित-अस्वीकृत
    राज्यसभा
    अगस्त 14, 2013
    Gray
  • रेफर
    स्टैंडिंग कमिटी
    सितंबर 11, 2013
    Gray
  • रिपोर्ट
    स्टैंडिंग कमिटी
    फ़रवरी 17, 2014
    Gray
  • रेफर
    सिलेक्ट कमिटी
    मई 06, 2015
    Gray
  • रिपोर्ट
    सिलेक्ट कमिटी
    जुलाई 30, 2015
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    मार्च 10, 2016
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    मार्च 15, 2016
    Gray

बिल की मुख्य विशेषताएँ

  • यह बिल आवासीय रियल एस्टेट परियोजनाओं के खरीदारों और प्रोमोटरों के बीच लेनदेन को रेग्युलेट करता है। यह रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी (रेरा) नामक राज्य स्तरीय रेग्युलेटरी अथॉरिटी स्थापित करता है।
     
  • आवासीय रियल एस्टेट परियोजनाओं को, कुछ अपवादों को छोड़कर, रेरा से पंजीकृत होने की आवश्यकता होगी। प्रोमोटर बिक्री के लिए इन परियोजनाओं की बुकिंग या पेशकश बिना पंजीकृत कराए नहीं कर सकते हैं। इन परियोजनाओं में सौदा करने वाले रियल एस्टेट एजेंटों को भी रेरा से पंजीकरण करवाना होगा।  
     
  • पंजीकरण होने पर, प्रोमोटर को रेरा की वेबसाइट पर उस परियोजना की जानकारी अपलोड करनी पड़ेगी। इसमें साइट और लेआउट योजना, और रियल एस्टेट परियोजना के समापन के लिए अनुसूची शामिल हैं।
     
  • खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम का 70% एक अलग बैंक खाते में जमा करना होगा जिसका उपयोग उस परियोजना के निर्माण के लिए ही किया जाना होगा। राज्य सरकार इस रकम को 70% से कम कर सकती है।
     
  • यह बिल रियल एस्टेट अपील ट्रिब्यूनल नामक राज्य सतरीय ट्रिब्यूनलों की स्थापना करता है। रेरा के निर्णयों के विरुद्ध इन ट्रिब्यूनलों में अपील की जा सकती है।

प्रमुख मुद्दे एवं विश्लेषण

  • रियल एस्टेट से संबंधित कानून बनाने के संसद के अधिकार पर सवाल उठाए जा सकते हैं क्योंकि “भूमि” संविधान की राज्य सूची में आती है। हालाँकि, यह तर्क पेश किया जा सकता है कि इस बिल का मुख्य उद्देश्य संपत्ति से संबंधित अनुबंधों और हस्तांतरण को रेग्युलेट करना है, और दोनों ही समवर्ती सूची में आते हैं।
     
  • कुछ राज्यों ने रियल एस्टेट परियोजनाओं को रेग्युलेट करने के लिए कानून बनाए हैं। यह बिल कई मायनों में राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों से अलग है। किसी तरह असंगतता के मामले में यह बिल राज्य के कानूनों के तहत आने वाले प्रावधानों को रद्द कर देगा।
     
  • इस बिल में दिया है कि परियोजना के खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम का 70% उस परियोजना के निर्माण के लिए ही उपयोग में लाया जाए। कुछ विशेष मामलों में, निर्माण लागत 70% से कम हो सकती है और भूमि की लागत कुल इकठ्ठा की गई रकम के 30% से अधिक हो सकती है। इसका अर्थ यह है कि इकठ्ठा की गई रकम का कुछ हिस्सा उपयोग में नहीं आए, जिससे अन्य स्रोतों से पैसा लेने की ज़रुरत पड़ सकती है। यह परियोजना की लागत में बढ़ोतरी कर सकता है।
     
  • इस बिल की जाँच कर रही स्थायी समिति ने कई सुझाव दिए हैं। जैसे: (क) व्यावसायिक रियल एस्टेट को भी रेग्युलेट  करना चाहिए, (ख) छोटी परियोजनाओं को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए, और (ग) सभी रियल एस्टेट एजेंटों के लिए पंजीकरण आवश्यक  
     
  • रियल एस्टेट क्षेत्र की कुछ अन्य समस्याएँ भी हैं जैसे की परियोजना की स्वीकृति लिए लंबी प्रक्रिया, भूमि के स्वामित्व को लेकर अस्पष्टता, और काले धन का प्रचलन। इनमें से कुछ राज्य सूची के तहत आती हैं।

भाग अ: बिल की मुख्य विशेषताएँ[1]

संदर्भ

रियल एस्टेट में आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए भूमि की बिक्री, खरीद और विकास शामिल होता है। रियल एस्टेट के विभिन्न पहलू सरकार के विभिन्न स्रों द्वारा नियंत्रित किये जाते हैं। मौजूदा समय में रियल एस्टेट परियोजनाओं पर राज्य सरकारों के संबंधित राज्य नगर और ग्राम नियोजन या अपार्टमेंट ओनरशिप एक्ट के तहत नियंत्रण किया जाता है। आमतौर पर, नगर और ग्राम नियोजन एक्ट भूमि के उपयोग और विकास को रेग्युलेट  करते हैं। अपार्टमेंट ओनरशिप एक्ट एक से अधिक अपार्टमेंट्स वाले भवनों में अपार्टमेंट्स के निजी स्वामित्व को रेग्युलेट  करते हैं। रियल एस्टेट परियोजनाओं के निर्माण के लिए स्वीकृतियां मुख्य रूप से स्थानीय और राज्य स्तर पर दी जाती हैं। कुछ विशेष स्वीकृतियां केंद्र सरकार द्वारा दी जाती हैं। उपभोक्ता की शिकायतों का निवारण कंज़्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 1986 के तहत स्थापित फोरमों के माध्यम से किया जा सकता है। कम्पीटीशन एक्ट, 2002 के तहत अनुचित व्यापार कार्य प्रणालियों को चुनौती दी जा सकती है। इस क्षेत्र में खरीदारी से संबंधित अनुबंधों और अवैध निर्माण जैसे कई मामलों का निपटारा कोर्ट द्वारा किया गया है। [2] भारतीय कम्पीटीशन कमीशन ने इस र इशारा किया है कि रियल एस्टेट के क्षेत्र में रेग्युलेटर का होना इस क्षेत्र में शिकायत के सही से नहीं निपटने के लिए आंशिक रूप से ज़िम्मेदार है। [3] 2013 में, रियल एस्टेट क्षेत्र में स्वीकृति प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाने पर समिति ने रियल एस्टेट क्षेत्र को और अधिक पारदर्शी बनाने के साथ ही परियोजनाओं की जानकारी को आसानी से उपलब्ध कराने का सुझाव दिया था। उसने भवन मानकों या अनुबंधों के गैर-अनुपालन के मामले में शिकायत निवारण तंत्र को मज़बूत करने का सुझाव भी दिया था। [4]  2009 में, आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय ने मॉडल रियल एस्टेट रेग्युलेशन और डेवेलपमेंट बिल का प्रकाशन किया, जिससे रियल एस्टेट पर नियंत्रण और उसे बढ़ावा दिया जा सके और उपभोक्ता संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। [5] इस मॉडल बिल ने एक ऐसा रेग्युलेटर ढांचा प्रदान किया जिसे राज्य सरकारें अपने कानून बनाते समय अपना सकें। कुछ राज्यों ने रियल एस्टेट क्षेत्र को रेग्युलेट करने के लिए मॉडल बिल के अनुसार कानून तैयार कर लिए हैं या तैयार करने की प्रक्रिया में हैं। [6]   रियल एस्टेट (रेग्युलेशन और डेवेलपमेंट) बिल, 2013 उपभोक्ता संरक्षण, और व्यावसायिक प्रथाओं के मानकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए रियल एस्टेट क्षेत्र में खरीदारों और बेचने वालों के बीच अनुबंधों को रेग्युलेट  करने का प्रयास करता है। यह बिल आवासीय रियल एस्टेट परियोजनाओं के पंजीकरण के लिए राज्य स्तर पर रेग्युलेटरी अथॉरिटी को स्थापित करता है। इस बिल की जाँच कर रही स्थायी समिति ने 13 फरवरी, 2014 को अपनी रिपोर्ट जमा की। [7]

प्रमुख विशेषताएँ

रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी, अपील ट्रिब्यूनल

  • एक्ट लागू होने के एक वर्ष के अंदर सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों (यूटी) को रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी (रेरा) नामक राज्य स्तरीय रेग्युलेटरी अथॉरिटी स्थापित करने पड़ेंगे। दो या उससे अधिक राज्य या यूटी सामूहिक रेरा की स्थापना कर सकते हैं। एक राज्य या यूटी एक से अधिक रेरा की स्थापना कर सकता है।
  • रेरा के कार्यों में निम्न शामिल हैं: (क) सुनिश्चित करना कि आवासीय परियोजनाओं का पंजीकरण किया गया हो, और उनकी जानकारी रेरा की वेबसाइट पर अपलोड की गई हो, (ख) सुनिश्चित करना कि खरीदार, विक्रेता, और एजेंट एक्ट के तहत दायित्वों का अनुपालन करें, और (ग) रियल एस्टेट के विकास से संबंधित मामलों पर सरकार को परामर्श दे।
  • प्रत्येक रेरा रियल एस्टेट, शहरी विकास, कानून और वाणिज्य जैसे क्षेत्रों का अनुभव रखने वाले एक चेयरपर्सन और कम से कम दो पूर्णकालिक सदस्यों से युक्त होगा।
  • रेरा के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने के लिए राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में रियल एस्टेट अपील ट्रिब्यूनल नामक एक या अधिक ट्रिब्यूनल स्थापित किये जाएंगे। दो या उससे अधिक राज्यों के लिए एक ट्रिब्यूनल की स्थापना की जा सकती है। प्रत्येक ट्रिब्यूनल में एक चेयरपर्सन और दो सदस्य शामिल किये जाएँगे, जिनमें से एक न्यायिक और दूसरा तकनकी पृष्ठभूमि से संबंधित होगा।
  • अगर रेरा को लगता है कि कोई मामला कम्पीटीशन को प्रभावित करता है, तो वह उस मामले को कम्पीटीशन कमीशन के पास विचारार्थ भेज सकता है।
  • एक केंद्रीय परामर्श परिषद की स्थापना की जाएगी जिसमें केंद्रीय मंत्रियों, राज्य सरकारों, रेरा के प्रतिनिधि और रियल एस्टेट उद्योग, उपभोक्ताओं, और श्रमिकों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। वह परिषद केंद्र को नीति, और उपभोक्ता हितों के संरक्षण से जुड़े अहम प्रश्नों पर परामर्श देगा।  

रियल एस्टेट परियोजनाओं और एजेंटों का पंजीकरण

  • इस बिल में यह ज़रूरी है कि कुछ अपवादों को छोड़कर, सभी आवासीय परियोजनाओं का पंजीकरण किया जाए। प्रोमोटर इन परियोजनाओं का पंजीकरण करवाए बिना बिक्री के लिए इनकी बुकिंग या पेशकश नहीं कर पाएंगे। पंजीकरण उन परियोजनाओं के लिए अनिवार्य नहीं होगा जो: (क) 1000 वर्ग मीटर से कम की हों, या (ख) जहाँ 12 अपार्टमेंट्स से कम का निर्माण किया जाना हो, या (ग) जहाँ उस परियोजना के पुनःआबंटन या मार्केटिंग के बिना पुनरुद्धार/मरम्मत/पुनर्विकास किया जाना हो।   
  • राज्य सरकारें छूट क सीमा में कमी ला सकती हैं। अगर किसी परियोजना का विकास चरणों में किया जा रहा हो, तो प्रत्येक चरण को अलग से पंजीकृत किया जाना चाहिए। पंजीकरण के लिए, प्रोमोटर को रेरा के पास उस परियोजना का लेआउट प्लान, और बिक्री के लिए संपत्ति के कार्पेट क्षेत्र जैसी जानकारी प्रदान करनी पड़ेगी।
  • अगर आवेदनकर्ता को पंजीकरण के लिए आवेदन के 15 दिनों के अंदर रेरा से कोई जवाब ना मिले, तो परियोजना को पंजीकृत मान लिया जाएगा। प्रोमोटर को 30 दिन का नोटिस देने के बाद पंजीकरण रद्द किया जा सकता है। रद्द किये जाने के मामले में, रेरा योग्य अथॉरिटी या खरीदार संस्था या किसी अन्य तरीके के माध्यम से उस परियोजना के पूर्ण होने का सुझाव दे सकता है। यहाँ योग्य अथॉरिटी से मतलब है भूमि विकास के लिए ज़िम्मेदार स्थानीय अथॉरिटी।  
  • रियल एस्टेट एजेंटों को पंजीकृत रियल एस्टेट परियोजनाओं में संपत्ति की बिक्री या खरीद को सुविधाजनक बनाने के लिए रेरा से पंजीकरण करा लेना चाहिए। पंजीकृत एजेंटों को अपंजीकृत परियोजनाओं की बिक्री नहीं करनी चाहिए या पेश की जाने वाली सेवाओं के संबंध में खरीदारों को गुमराह नहीं करना चाहिए।   

प्रोमोटर और खरीदार के कर्तव्य

  • पंजीकरण होने पर, प्रोमोटर बिक्री के लिए संपत्तियों की संख्या और प्रकार, और परियोजना की स्थिति पर तिमाही अपडेट सहित रेरा की वेबसाइट पर परियोजना की जानकारियां अपलोड करेगा। इसके अलावा, प्रोमोटर को परियोजना की साइट और लेआउट प्लान, और परियोजना के समापन की अनुसूची खरीदार को उपलब्ध करानी पड़ेगी। अगर खरीदार को झूठे विज्ञापन के कारण घाटा सहना पड़ हो, और वह उस परियोजना से पीछे हटना चाहता हो, तो प्रोमोटर को इकठ्ठा की गई रकम ब्याज सहित वापस लौटानी पड़ेगी  
  • खरीदारों से परियोजना के लिए इकठ्ठा की गई रकम का 70% उस परियोजना के निर्माण के लिए उपयोग में लाना ज़रूरी है। राज्य सरकार इस रकम को 70% से कम कर सकती है। प्रोमोटर लिखित समझौता किये बिना अग्रिम भुगतान के रूप में संपत्ति की कुल लागत के 10% से अधिक को स्वीकार नहीं कर सकता  
  • प्रोमोटर: (क) संबंधित अथॉरिटी से समापन प्रमाणपत्र प्राप्त करेगा, (ख) खरीदारों क एक संस्था या सोसाइटी का निर्माण करेगा, और (ग) ज़रूरी सेवाएं प्रदान करेगा जब तक कि खरीदारों क संस्था उस परियोजना के रखरखाव की ज़िम्मेदारी नहीं ले लेत। अगर प्रोमोटर संपत्ति का कब्ज़ा देने में असमर्थ हो, वह ब्याज सहित उस संपत्ति के लिए उसके द्वारा प्राप्त रकम की वापसी के लिए उत्तरदाई होगा।
  • खरीदार को प्रोमोटर के साथ किये गए समझौते में बताए गए नियम के अंदर रहते हुए ज़रूरी भुगतान करना होगा। भुगतान में किसी तरह की देरी के लिए वह ब्याज अदा करने का ज़िम्मेदार होगा। खरीदारों को एक संस्था/सोसाइटी/कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।   

जुर्माना

  • अगर प्रोमोटर संपत्ति का पंजीकरण करवाने में असफल हो जाए, उसे परियोजना की अनुमानित लागत के 10% तक के लिए दण्डित किया जा सकता है। रेरा द्वारा जारी आदेशों के बावजूद पंजीकरण करवाने में असफलता के कारण तीन वर्ष तक का कारावास, और/या परियोजना की अनुमानित लागत के 10% तक का अतिरिक्त जुर्माना लिया जाएगा। अगर प्रोमोटर एक्ट के किसी अन्य प्रावधान का उल्लंघन करता हो, तो उसे परियोजना की अनुमानित लागत के 5% तक का भुगतान करना पड़ेगा।  
  • रियल एस्टेट एजेंटों को एक्ट के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करने के लिए प्रतिदिन के हिसाब से 10,000 रुपये का जुर्माना अदा करना होगा।

भाग ब: प्रमुख मुद्दे एवं विश्लेषण

रियल एस्टेट पर कानून बनाने को लेकर संसद का क्षेत्राधिकार

इस बिल में आवासीय रियल एस्टेट परियोजनाओं के खरीदारों और प्रोमोटरों के बीच लेनदेन को रेग्युलेट  करने का प्रयास किया गया है ताकि निम्न को सुनिश्चित किया जा सके: (क) उपभोक्ता संरक्षण, और (ख) क्षेत्र में व्यावसायिक कार्य प्रणालियों का मानकीकरण। ऐसा यह राज्य स्तर पर रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी की स्थापना के माध्यम से करता है।   

वर्तमान में, रियल एस्टेट परियोजनाओं का रेग्युलेशन मुख्य रूप से राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है क्योंकि भूमि और भूमि सुधार संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में आता है। राज्य सूची की प्रविष्टि 18 के अंतर्गत, राज्य भूमि, या भूमि में या उसके ऊपर अधिकार; भूमि सुधार; और भूमि पर बस्ती बसाने से संबंधित कानून बना सकते हैं। संसद में प्रश्नों का उत्तर देते हुए, मंत्रालय ने कहा है कि रियल एस्टेट रेग्युलेशन की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की है और राज्यों को रियल एस्टेट परियोजनाओं की निगरानी रखनी चाहिए। [8]

हालाँकि, इस बिल का दायरा खरीदारों और प्रोमोटरों के बीच समझौतों, और संपत्ति के हस्तांतरण तक ही सीमित है। ये दोनों आइटम समवर्ती सूची के अंदर आते हैं। [9] सरकार द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति भी इसी स्थिति का वर्णन करती है। [10]  

रियल एस्टेट का रेग्युलेशन करने वाले राज्य कानूनों के साथ असंगतियां      

इस बिल के अनुसार राज्य रियल एस्टेट का रेग्युलेशन करने वाले उनके कानूनों को उस समय तक लागू कर सकते हैं, जब तक ये कानून एक्ट के साथ असंगत नहीं होते। हालाँकि, कई राज्य ऐसे कानून बना चुके हैं या बनाने की तैयारी में हैं जिनमें बिल के साथ असंगतता रखने वाले प्रावधान शामिल हैं। इन प्रावधानों क जगह बिल के प्रावधान लागू होंगे। कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं।    हालाँकि केंद्रीय बिल राज्य में परियोजनाओं के पंजीकरण के लिए वैधानिक रेग्युलेटरी अथॉरिटी को स्थापित करने का आदेश देता है, पश्चिम बंगाल ने इस कार्य का जिम्मा सरकारी विभाग को सौंपा हुआ है। [11] जबकि केंद्रीय बिल यह आदेश देता है कि परियोजना के खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम का 70% (या कम, जैसा राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित किया गया हो) केवल उस परियोजना के निर्माण के लिए इस्तेमाल में लाया जाए, कुछ राज्य सरकारों ने रकम के इस्तेमाल में अधिक लचीलेपन की अनुमति दी है। महाराष्ट्र हाउसिंग रेग्युलेशन और डेवेलपमेंटएक्ट, 2012 यह आदेश देता है कि खरीदारों से इकठ्ठा की गई सारी रकम एक अलग खाते में राखी जाए और इकठ्ठा करने के उद्देश्य6 के लिए उसका इस्तेमाल किया जाए। हरियाणा रियल एस्टेट (रेग्युलेशन और डेवेलपमेंट) बिल, 2013 का ड्राफ्ट यह आदेश देता है कि परियोजना के लिए खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम के 70% का इस्तेमाल उस विशेष रियल एस्टेट परियोजना6 के लिए ही किया जाए, ना कि केवल निर्माण के लिए6पंजाब, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने कहा है कि रियल एस्टेट को रेग्युलेट करने के लिए वे मौजूदा कानूनों को प्राथमिकता देते रहेंगे।[12]  हमने एनेक्सचर में कुछ निश्चित राज्यों के कानूनों के साथ इस बिल की तुलना की है।    

खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम का 70% केवल निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जाए

रियल एस्टेट परियोजनाओं की लागत में भूमि की लागत और निर्माण लागत (और लाभ मार्जिन) शामिल होते हैं। बिल में आदेश दिया गया है कि किसी विशेष परियोजना के लिए खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम का 70% एक अलग बैंक खाते में जमा किया जाए और उस परियोजना के निर्माण के लिए ही केवल इस्तेमाल में लाया जाए। यह प्रावधान बिल्डरों की उस कार्य प्रणाली का समाधान निकालने का प्रयास करता है जहाँ वे मौजूदा परियोजना से रकम निकाल कर किसी अन्य परियोजना में उसका इस्तेमाल करते हैं, जिसके कारण परियोजना समापन में देरी होती है।7 हालाँकि, इस प्रावधान के कारण परियोजना की लागत में वृद्धि आ सकती है। 

कुछ मामलों में, भूमि की लागत परियोजना की कुल लागत के 30% से अधिक और निर्माण लागत 70% से कम हो सकती है। यह आदेश कि परियोजना के लिए खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम के 70% का इस्तेमाल उस परियोजना के निर्माण के लिए केवल किया जाए, इससे इकठ्ठा की गई रकम का कुछ हिस्सा उपयोग में नहीं लाया जा सकेगा। उसी समय पर, डेवेलपर को भूमि खरीदने के लिए रकम उधार लेन पड़ सकती है। इस रकम पर ब्याज के कारण परियोजना लागत में बढ़ोतरी हो जाएगी, जिसका भार खरीदारों के ऊपर आ सकता है।

इसी प्रकार के कानून ने इस मामले का समाधान अलग प्रकार से किया है। मॉडल बिल (2009) कहता है कि खरीदारों से प्राप्त सारी रकम को एक अलग बैंक खाते में रखा  जाए और उसका इस्तेमाल इकठ्ठा करने के उद्देश्य के लिए किया जाए, जिससे उसके इस्तेमाल में ज़्यादा लचीलापन आ सके।5 महाराष्ट्र एक्ट (2012) ऐसा ही करता है।6 हरियाणा बिल (2013) यह आदेश देता है कि 70% इकठ्ठा किया जाए और इस रकम का इस्तेमाल रियल एस्टेट परियोजना के लिए किया जाए।6

स्थायी समिति के प्रमुख सुझाव

शहरी विकास पर स्थायी समिति ने इस बिल पर फरवरी 13, 2014 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।7 उसके सुझाव निम्न से संबंधित हैं:

  • व्यावसायिक और औद्योगिक रियल एस्टेट: मौजूदा बिल केवल आवासीय रियल एस्टेट को रेग्युलेट करने का प्रयास करता है। बिल को व्यावसायिक और औद्योगिक रियल एस्टेट को भी रेग्युलेट करना चाहिए।
  • कुछ निश्चित परियोजनाओं को बाहर रखना: रेरा के कार्यक्षेत्र से 1,000 वर्ग मीटर से छोटे या 12 अपार्टमेंट्स से कम वाली परियोजनाओं को बाहर रखा गया है, जिसके कारण बड़ी संख्या में छोटी आवासीय परियोजनाएं इस बिल के लाभ से वंचित रह जाएंगी। यह सीमा 100 वर्ग मीटर और तीन अपार्टमेंट्स से कम होनी चाहिए।
  • सभी रियल एस्टेट एजेंटों का पंजीकरण: सभी रियल एस्टेट एजेंटों के लिए रेरा से पंजीकरण कराना ज़रूरी होना चाहिए, केवल उन एजेंटों के लिए नहीं जो बिल के दायरे में आने वाली परियोजना की बिक्री की सुविधा प्रदान कर रहे हों।
  • परियोजना की स्वीकृति के लिए एकल खिड़की का सिस्टम: एक नए प्रावधान को जोड़ा जाना चाहिए जिससे रेरा राज्य सरकारों को परियोजनाओं की स्वीकृति प्रदान करने के लिए एकल खिड़की सिस्टम की स्थापना के निर्देश दे सकें। राज्य और स्थानीय प्राधिकरणों को एक निश्चित सीमा के अंदर समापन प्रमाणपत्र जारी करने के लिए कहा जाना चाहिए।
  • कार्पेट क्षेत्र की परिभाषा: यह बिल कार्पेट क्षेत्र को एक अपार्टमेंट के ‘शुद्ध उपयोग योग्य फर्श क्षेत्र’ के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें उसकी दीवारों वाले क्षेत्र को बाहर रखा गया है। ‘शुद्ध उपयोग योग्य फर्श क्षेत्र’ को बिल में परिभाषित किया जाना चाहिए।
  • संरचनात्मक कमियां: यह बिल स्पष्ट करता है कि प्रोमोटर को आबंटन के दो वर्ष के अंदर उसकी जानकारी में ला गई संरचनात्मक कमियों को ठीक करना चाहिए। यह अवधि पांच वर्ष तक बढ़ाई जानी चाहिए।

रियल एस्टेट क्षेत्र में अन्य प्रमुख मुद्दे

कई समितियों और सरकारी एजेंसियों ने रियल एस्टेट क्षेत्र में मुख्य चुनौतियों के बारे में बताया है।4, 15, 16हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह जानते हुए कि इनमें से कुछ आइटम राज्य सरकार के कार्यक्षेत्र के तहत आते हैं, क्या एक केंद्रीय कानून इन समस्याओं का समाधान निकाल सकता है।

  • परियोजना की स्वीकृति के लिए लंबी प्रक्रिया: 2012 में, रियल एस्टेट परियोजनाओं के लिए स्वीकृति प्रक्रियाओं को व्यवस्थित बनाने पर समिति ने स्वीकृतियों के लिए एकल खिड़की मंजूरी सिस्टम को स्थापित करने क सुझाव दिया। उसने यह जानकारी भी दी कि सरकार के सभी तीन स्तरों में से परियोजनाओं के लिए 50 स्वीकृतियों की ज़रुरत पड़ती है, जिसके कारण चार वर्ष तक का समय लग जाता है।15

यह बिल रेरा को स्वीकृति प्रक्रिया में सुधार लाने के उपायों के संबंध में राज्य सरकारों को सुझाव देने की अनुमति देता है। हालाँकि, स्थायी समिति ने सुझाव दिया है कि एकल खिड़की सिस्टम को स्थापित करने के लिए रेरा को राज्य सरकारों को सीधे निर्देश देने का नया प्रावधान डालने को कहा है।

  • अस्पष्ट भूमि अधिकार: योजना आयोग ने बताया है कि अस्पष्ट भूमि अधिकार और रियल एस्टेट से जुड़े लेनदेन में पारदर्शिता की कमी इस क्षेत्र के विकास में बाधा पहुंचाती हैं।[13] 2010 में, केंद्र ने लैंड टाइटलिंग सिस्टम में सुधार के लिए, मॉडल बिल, लैंड टाईटलिंग ड्राफ्ट बिल का प्रकाशन किया।[14] 2012 में, ग्रामीण विकास पर स्थायी समिति ने सुझाव दिया कि भूमि अधिकारों सहित भूमि से जुड़े रिकॉर्ड्स का आधुनिकीकरण भूमि आधारित विकास और रेग्युलेटर गतिविधियों के लिए उपयोगी रहेगा। [15]
  • काले धन का चलन: काले धन पर 2012 में एक पत्र में, वित्त मंत्रालय ने इस बात की और इशारा किया कि रियल एस्टेट क्षेत्र, जिसका देश के जीडीपी में 11% का हिस्सा है, में विशेष रूप से काले धन का प्रचलन बहुत है, जिसका प्रमुख कारण है कर अदा करते समय लेनदेन की कीमतों की ज़रुरत से कम जानकारी प्रदान करना। [16]

एनेक्सचर: मॉडल बिल और राज्य कानूनों के साथ केंद्रीय बिल की तुलना

तालिका 1: मॉडल बिल और राज्य कानूनों के साथ केंद्रीय बिल की तुलना

प्रावधान

केंद्रीय बिल (2013)

मॉडल बिल (2009)

महाराष्ट्र एक्ट (2012)

हरियाणा ड्राफ्ट बिल (2013)

पश्चिम बंगाल (1993)

रेग्युलेटर

रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी

रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी

आवास रेग्युलेटरी अथॉरिटी

हरियाणा रियल एस्टेट अथॉरिटी

अलग से किसी अथॉरिटी का निर्माण नहीं किया गया है, राज्य सरकार परियोजनाओं का पंजीकरण कर सकती है।

परियोजनाएं जिन्हें कवर किया गया है

1000 वर्ग मीटर या 12 अपार्टमेंट्स (या राज्य सरकार के सुझाव पर कम क्षेत्र) से ऊपर वाली आवासीय रियल एस्टेट।

वाणिज्य और औद्योगिक सहित सभी रियल एस्टेट परियोजनाएं

250 वर्ग मीटर या 5 अपार्टमेंट्स से ऊपर आवासीय रियल एस्टेट परियोजनाएं।

1000 वर्ग मीटर या 12 अपार्टमेंट्स से ऊपर सभी रियल एस्टेट परियोजनाएं (संशोधन किया जा सकता है)।

सभी रियल एस्टेट परियोजनाएं।

 

 

पंजीकरण

आवेदन के 15 दिनों के अंदर पंजीकरण किया जाना चाहिए। 30 दिन का नोटिस दे कर रद्द किया जा सकता है।

आवेदन के 15 दिनों के अंदर पंजीकरण ना चाहिए। 3 वर्ष के लिए वैध जिसमें 1-1 वर्ष के लिए 2 नवीकरण किये जा सकेंगे। 

आवेदन के 7 दिनों के अंदर पंजीकरण किया जाना चाहिए। रद्द किया जा सकता है अगर कोर्ट को लगता है कि भूमि के ऊपर संविदा वैध है।

आवेदन के 30 दिनों के अंदर पंजीकरण किया जाना चाहिए। 30 दिन का नोटिस दे कर रद्द किया जा सकता है।

पंजीकरण पर विचार आवेदन करने के तीन माह के अंदर किया जाना चाहिए।

रियल एस्टेट एजेंटों का पंजीकरण

पंजीकृत परियोजनाओं के सौदों में शामिल सभी एजेंट।

कोई प्रावधान नहीं।

कोई प्रावधान नहीं।

पंजीकृत परियोजनाओं के सौदों में शामिल सभी एजेंट। 60 दिनों के अंदर किया जाना चाहिए।

कोई प्रावधान नहीं।

लिखित समझौता

अगर अग्रिम के रूप में संपत्ति की लागत के 10% को स्वीकार किया जाता हो।

अगर अग्रिम के रूप में खरीदार से कोई रकम इकठ्ठा की जाती हो।

अगर अग्रिम के रूप में संपत्ति की लागत के 20% को स्वीकार किया जाता हो।

अगर अग्रिम के रूप में संपत्ति की लागत के 10% को स्वीकार किया जाता हो।

अगर अग्रिम के रूप में संपत्ति की लागत के 40% को स्वीकार किया जाता हो।

प्रोमोटर द्वारा एक अलग खाता कायम किया जाए

रकम इकठ्ठा करने के 15 दिन के अंदर एक अलग खाते में खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम का 70% (या कम जैसा राज्यों द्वारा अधिसूचित किया गया हो) जमा किया जाए और जिसका उपयोग केवल निर्माण के लिए किया जाए।

खरीदारों से इकठ्ठा की गई पूरी रकम को एक अलग बैंक खाते में जमा किया जाए और इकठ्ठा करने के उद्देश्य  के लिए उपयोग में लाया जाए।

खरीदारों से इकठ्ठा की गई सारी रकम एक अलग खाते में जमा की जाए जिसकी निगरानी राज्य सरकार करे और जिसका उपयोग इकठ्ठा करने के उद्देश्य  के लिए किया जाए।

रकम इकठ्ठा करने के 15 दिन के अंदर एक अलग खाते में खरीदारों से इकठ्ठा की गई रकम का 70% जमा किया जाए और जिसका उपयोग केवल रियल एस्टेट परियोजना  के लिए किया जाए।

कोई प्रावधान नहीं।

कब्ज़ा देने में असफलता पर दंड

प्रोमोटर को ब्याज और मुआवज़े सहित रकम को लौटाना चाहिए।

प्रोमोटर को ब्याज सहित रकम को लौटाना और अथॉरिटी द्वारा निर्धारित जुर्माना ना चाहिए।

प्रोमोटर को प्रति वर्ष 15% से कम की दर से ब्याज सहित रकम लौटानी चाहिए।

प्रोमोटर को ब्याज और मुआवज़े सहित रकम को लौटाना चाहिए।

3 माह से 4 वर्ष का कारावास, या 10,000 रुपये का जुर्माना या नुकसान की रकम, या दोनों।

प्रोमोटर द्वारा अथॉरिटी के साथ गैर-अनुपालन के लिए दंड

परियोजना की अनुमानित लागत के 5% तक। जुर्माना प्रतिदिन दिया जाएगा, लेकिन प्रति दिन अदा की जाने वाली रकम की कोई सीमा नहीं है।

कुछ नहीं बताया गया है, अर्थात राज्यों के विवेक पर छोड़ दिया गया।

10 लाख रुपये तक।

परियोजना की अनुमानित लागत के 5% तक। 20,000 रुपये तक का प्रतिदिन जुर्माना।

3 माह से 3 वर्ष तक का कारावास, या 5000 रुपये तक का जुर्माना, या दोनों।

अपीली ट्रिब्यूनल

रियल एस्टेट अपील ट्रिब्यूनल।

रियल एस्टेट अपील ट्रिब्यूनल।

हाउसिंग अपील ट्रिब्यूनल।

रियल एस्टेट अपील ट्रिब्यूनल।

राज्य सरकार द्वारा निर्धारित अथॉरिटी

स्रोत: रियल एस्टेट (रेग्युलेशन और डेवेलपमेंट) बिल, 2013; मॉडल रियल एस्टेट (रेग्युलेशन और डेवेलपमेंट) एक्ट, 2009; महाराष्ट्र आवास रेग्युलेशन और डेवेलपमेंट एक्ट, 2012; हरियाणा रियल एस्टेट रेग्युलेशन और डेवेलपमेंट ड्राफ्ट बिल, 2013; पश्चिम बंगाल बिल्डिंग (प्रोमोटरों द्वारा निर्माण के विकास और हस्तांतरण का रेग्युलेशन) एक्ट, 1993; पीआरएस

नोट्स

[1]. This Brief has been written on the basis of the Real Estate (Regulation and Development) Bill, 2013, which was introduced in the Rajya Sabha on August 14, 2013, http://www.prsindia.org/uploads/media/Real%20Estate/Real%20estate%20Bill...

[2]. Belaire Owners Association vs. DLF Limited, HUDA, and Ors, CCI, Case No. 19/2010, August 12, 2011; Esha Ekta Apartments Co-operative Housing Society Limited and Ors vs. Municipal Corporation of Mumbai and Ors, AIR 2013 SC 1861; Priyanka Estates International Pvt. Ltd. vs. State of Assam, AIR 2010 SC 1030.

[3]. Belaire Owners Association vs DLF Limited, HUDA, and Ors, CCI, Case No. 19/2010, August 12, 2011. The CCI fined DLF Limited Rs 630 crore for abusing its dominant position in the sector by enforcing unfair buyers’ agreements.

[4]. “Volume I: Report of the Committee on Streamlining Approval Procedures for Real Estate Projects in India”, Ministry of Housing and Urban Poverty Alleviation, January 2013, http://mhupa.gov.in/W_new/SAPREP-march.pdf.

[5]. The Model Real Estate (Regulation and Development) Act, 2009, Ministry of Housing and Urban Poverty Alleviation, mhupa.gov.in/W_new/Model%20Real%20Estate%20Act.doc.

[6]. Maharashtra Housing Regulation and Development Act, 2012, https://www.maharashtra.gov.in/Site/Upload/Acts%20Rules/English/Housing_..., Draft Haryana Real Estate (Regulation and Development) Bill, 2013, http://tcpharyana.gov.in/Tentative%20Draft%20Bill%2014.02.2013.pdf.

[7]. “30th Report: The Real Estate (Regulation and Development) Bill, 2013”, Standing Committee on Urban Development, February 13, 2014, http://www.prsindia.org/uploads/media/Real%20Estate/SCR-Real%20Estate%20....

[8]. Lok Sabha, Unstarred Question No. 657, Ministry of Housing and Urban Poverty Alleviation, August, 7, 2013; Lok Sabha, Unstarred Question No. 1564, Ministry of Housing and Urban Poverty Alleviation, August 21, 2012; Lok Sabha, Unstarred Question No. 4707, Ministry of Housing and Urban Poverty Alleviation, May 4, 2012.

[9]. List III (Concurrent List) has the following items. Entry 6: Transfer of property other than agricultural land, registration of deeds, documents.  Entry 7: Contracts, including partnership, agency, contracts of carriage, and other special forms of contracts, but not including contracts relating to agricultural land.

[10].“Real Estate Bill to protect the interest of Consumers and Promote Fair Play in Real Estate Transactions”, Press Information Bureau, Ministry of Housing and Urban Poverty Alleviation, June 5, 2013.

[11]. West Bengal Building (Regulation of Promotion of Construction and Transfer by Promoters) Act, 1993.

[12]. Cabinet Note on the Real Estate (Regulation and Development) Bill, 2013 (obtained through RTI), March 2013.

[13]. “10th Five Year Plan”, 2002 – 07, Planning Commission, http://planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/10th/volume2/v2_ch....

[14].  Draft Land Titling Bill, 2010, Ministry of Rural Development, http://www.prsindia.org/uploads/media/draft/Revised%20Draft%20Land%20Tit....

[15]. “33rd Report: Computerisation of Land Records”, Standing Committee on Rural Development, August 28, 2012, http://164.100.47.134/lsscommittee/Rural%20Development/15_Rural%20Develo....

[16]. “Black Money: White Paper May 2012”, Ministry of Finance, May 2012, http://finmin.nic.in/reports/WhitePaper_BackMoney2012.pdf.

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेज़ी में तैयार की गयी थी। हिन्दी में इसका अनुवाद किया गया है। हिन्दी रूपान्तर में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेज़ी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।