मंत्रालय: 
गृह मामले
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    जुलाई 08, 2019
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    जुलाई 15, 2019
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    जुलाई 17, 2019
    Gray
  • गृह मामलों के मंत्री अमित शाह ने 8 जुलाई, 2019 को लोकसभा में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (संशोधन) बिल, 2019 पेश किया। यह बिल राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) एक्ट, 2008 में संशोधन करता है। एक्ट अनुसूची में सूचीबद्ध अपराधों (अनुसूचित अपराधों) की जांच और मुकदमेबाजी के लिए राष्ट्रीय स्तर की एजेंसी का प्रावधान करता है। इसके अतिरिक्त एक्ट अनुसूचित अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत स्थापित करने की अनुमति देता है।
     
  • अनुसूचित अपराध: एक्ट की अनुसूची उन अपराधों की सूची विनिर्दिष्ट करती है जिनकी एनआईए को जांच करनी है और उन पर मुकदमा चलाना है। इनमें परमाणु ऊर्जा एक्ट, 1962 और गैर कानूनी गतिविधि निवारण एक्ट, 1967 जैसे कानूनों के अंतर्गत आने वाले अपराध शामिल हैं। बिल एनआईए को अनुसूचित में दर्ज अपराधों की जांच की अनुमति देता है, इसके अतिरिक्त (i) मानव तस्करी, (ii) नकली करंसी या बैंक नोट्स से संबंधित अपराध, (iii) प्रतिबंधित हथियारों की मैन्यूफैक्चरिंग या बिक्री, (iv) साइबर आतंकवाद, और (v) विस्फोटक पदार्थ एक्ट, 1908 के अंतर्गत अपराधों की जांच की भी अनुमति देता है।
     
  • एनआईए का क्षेत्राधिकार: एक्ट अनुसूची में विनिर्दिष्ट अपराधों की जांच और मुकदमेबाजी के लिए एनआईए की स्थापना का प्रावधान करता है। एनआईए के अधिकारियों के पास पूरे भारत में ऐसे अपराधों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों के समान शक्तियां होंगी। बिल कहता है कि इसके अतिरिक्त एनआईए के अधिकारियों को भारत के बाहर किए गए अनुसूचित अपराधों की जांच करने की शक्ति होगी, जोकि अंतरराष्ट्रीय संधियों और अन्य देशों के घरेलू कानूनों के अधीन होगा। अगर भारत में अपराध किया गया हो तो केंद्र सरकार एनआईए को ऐसे मामलों की जांच के निर्देश दे सकती है। ऐसे मामले नई दिल्ली स्थित विशेष अदालत के क्षेत्राधिकार में आएंगे।
     
  • विशेष अदालतें: एक्ट केंद्र सरकार को अनुसूचित अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने की अनुमति देता है। बिल इसमें संशोधन करता है और कहता है कि केंद्र सरकार अनुसूचित अपराधों की सुनवाई के लिए सत्र अदालत को विशेष अदालत के रूप में नामित कर सकती है। केंद्र सरकार को सत्र अदालत को विशेष अदालत के रूप में नामित करने से पहले उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह करनी होगी, जिसके अंतर्गत सत्र अदालत कार्य करती है। जब किसी क्षेत्र में एक से अधिक विशेष अदालतें नामित की गई हों तो वरिष्ठतम न्यायाधीश अदालतों में मामलों का वितरण करेंगे। इसके अतिरिक्त राज्य सरकारें अनुसूचित अपराधों की सुनवाई के लिए सत्र अदालत को विशेष अदालत के रूप में भी नामित कर सकती हैं।

 

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