मंत्रालय: 
विधि एवं न्याय
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    मई 31, 2018
    Gray
  • प्रस्तावित-अस्वीकृत
    लोकसभा
    अगस्त 04, 2018
    Gray
  • 31 मई, 2018 को राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय अध्यादेश, 2018 जारी किया गया। यह अध्यादेश मणिपुर में राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय की स्थापना करता है। उल्लेखनीय है कि 10 अगस्त, 2017 को लोकसभा में राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय बिल पेश किया गया था जोकि लंबित है।
     
  • विश्वविद्यालय की स्थापना: राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय का मुख्यालय मणिपुर में होगा। यह दूरस्थ कैंपस, कॉलेज या क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना कर सकता है। विश्वविद्यालय निम्नलिखित कार्य करेगा : (i) फिजिकल एजुकेशन पर शोध, (ii) खेल के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मजबूती देना, और (iii) फिजिकल एजुकेशन के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग, इत्यादि।
     
  • कार्य: विश्वविद्यालय की मुख्य शक्तियों और कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) अध्ययन के लिए पाठ्यक्रमों को निर्दिष्ट करना और प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करना, (ii) डिग्री, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट देना, (iii) दूरस्थ शिक्षा प्रणाली के जरिए सुविधाएं प्रदान करना, और (iv) किसी कॉलेज या संस्थान को स्वायत्तता प्रदान करना।
     
  • अथॉरिटीज: विश्वविद्यालय के अंतर्गत निम्नलिखित अथॉरिटीज आएंगी: (i) कोर्ट (सभा), जोकि विश्वविद्यालय की व्यापक नीतियों की समीक्षा करेगा और उसके विकास के लिए उपाय सुझाएगा, (ii) एग्जीक्यूटिव काउंसिल (कार्यकारी परिषद), जोकि मुख्य कार्यकारी निकाय होगी, (iii) एकेडमिक एंड एक्टिविटी काउंसिल (शैक्षिक और गतिविधि परिषद), जोकि शैक्षिक नीतियों का निरीक्षण करेगी, और (iv) बोर्ड ऑफ स्पोर्ट्स स्टडीज (खेल अध्ययन बोर्ड), जोकि विभिन्न डिग्रियों के लिए अनुसंधान के विषयों को मंजूरी देगी और शिक्षण के मानदंडों में सुधार के लिए उपायों का सुझाव देगी, और (v) फाइनांस कमिटी (वित्त समिति), जोकि पदों के सृजन से संबंधित प्रस्तावों की जांच करेगी और विश्वविद्यालयों के व्यय की सीमा के संबंध में सुझाव देगी। इसके अतिरिक्त विधि के द्वारा अथॉरिटीज की घोषणा की जा सकती है।
     
  • एग्जीक्यूटिव काउंसिल: एग्जीक्यूटिव काउंसिल विश्वविद्यालय के सभी प्रशासनिक मामलों के लिए जिम्मेदार होगी। इसके सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाएगा और वे दो वर्षों तक अपने पद पर बने रहेंगे। इसके सदस्यों में निम्नलिखित शामिल होंगे : (i) वाइस चांसलर (केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त), (ii) युवा मामलों और खेल मंत्रालय के ज्वाइंट सेक्रेटरी, और (iii) चार सदस्य, जो प्रसिद्ध खिलाड़ी या कोच हों। काउंसिल के मुख्य कार्यों में निम्नलिखित शामिल है : (i) शैक्षिक पदों का सृजन और उनकी नियुक्ति, (ii) विश्वविद्यालय के राजस्व और संपत्ति का प्रबंधन करना, (iii) विश्वविद्यालय के वित्त को प्रबंधित और रेगुलेट करना, और (iv) ज्ञान की वृद्धि करने के लिए उद्योग और गैर सरकारी एजेंसियों के साथ पार्टनरशिप करना।
     
  • विधान: अध्यादेश की अनुसूची में विधान दिए गए हैं। इन विधानों में विभिन्न अथॉरिटीज़ जैसे चांसलर, वाइस चांसलर और डीन ऑफ स्कूल्स की स्थापना, संरचना और शक्तियों को निर्दिष्ट किया गया है। एग्जीक्यूटिव काउंसिल अतिरिक्त विधान बना सकती है, निर्दिष्ट विधानों में संशोधन कर सकती है या उन विधानों को रद्द कर सकती है। ऐसी किसी भी कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी की जरूरत होगी।
     
  • केंद्र सरकार की भूमिका: केंद्र सरकार विश्वविद्यालय के कामकाज की समीक्षा और निरीक्षण करेगी। एग्जीक्यूटिव काउंसिल निरीक्षण के निष्कर्षों के आधार पर कार्रवाई कर सकती है। अगर एक निश्चित समय सीमा में कोई कार्रवाई नहीं की जाती तो केंद्र सरकार काउंसिल को बाध्यकारी निर्देश जारी कर सकती है। अगर विश्वविद्यालय की कोई कार्यवाही अध्यादेश के अनुरूप नहीं है तो केंद्र सरकार उसे अमान्य घोषित कर सकती है।
     
  • फंड: विश्वविद्यालय एक फंड मेनटेन करेगा। इसमें निम्नलिखित राशियों को जमा किया जाएगा : (i) केंद्र सरकार, राज्य सरकारों या विश्वविद्यालय अनुदान कोष (यूजीसी) से प्राप्त होने वाले योगदान, (ii) लोन, उपहार या चंदा, (iii) फीस से प्राप्त होने वाली आय, और (iv) किसी अन्य स्रोत से प्राप्त होने वाली राशि। फाइनांस कमिटी के सुझावों के आधार पर फंड्स को निवेश किया जाएगा।
     
  • विवाद और अपील की प्रक्रिया: अगर किसी विद्यार्थी या उम्मीदवार का नाम विश्वविद्यालय के रोल्स से हटा दिया जाता है और उसे परीक्षा में बैठने से रोका जाता है तो वह एग्जीक्यूटिव काउंसिल से अपील कर सकता है। काउंसिल ऐसे निर्णय की पुष्टि कर सकती है, उसमें परिवर्तन कर सकती है या उस निर्णय को उलट सकती है। अगर किसी विद्यार्थी के खिलाफ विश्वविद्यालय की अनुशासनात्मक कार्रवाई के कारण विवाद पैदा होता है तो मामले को (विद्यार्थी के आग्रह पर) ट्रिब्यूनल ऑफ आर्बिट्रेशन के पास भेजा जा सकता है। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय और किसी कर्मचारी के बीच उत्पन्न होने वाले विवाद को भी ट्रिब्यूनल ऑफ आर्बिट्रेशन के पास भेजा जा सकता है।

 

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