मंत्रालय: 
श्रम एवं रोजगार
  • प्रस्तावित
    राज्यसभा
    अगस्त 11, 2016
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    अगस्त 11, 2016
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    मार्च 09, 2017
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    मार्च 20, 2017
    Gray

बिल की मुख्‍य विशेषताएं

  • एक्ट सभी महिलाओं के लिए 12 हफ्ते तक के मातृत्व अवकाश का प्रावधान करता है। बिल में इस अवधि को बढ़ाकर 26 हफ्ते किया गया है। लेकिन दो या दो से अधिक बच्चों वाली महिलाएं 12 हफ्ते के मातृत्व अवकाश के लिए ही अधिकृत हैं। 
     
  • बिल तीन महीने से कम आयु के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं और कमीशनिंग करने वाली महिलाओं के लिए 12 हफ्ते तक के मातृत्व अवकाश को प्रस्तावित करता है। मातृत्व अवकाश की अवधि को उस तारीख से गिना जाएगा, जिस तारीख को गोद लेने वाली या कमीशनिंग करने वाली महिला को बच्चा सौंपा जाएगा। 
  • बिल में 50 या 50 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रत्येक प्रतिष्ठान (इस्टैबलिशमेंट) से अपेक्षा की गई है कि वह एक निर्धारित दूरी के अंदर क्रेश की सुविधाएं प्रदान करेगा। महिला कर्मचारियों को क्रेश में चार बार जाने की अनुमति दी जाएगी।
     
  • अगर किसी महिला को सौंपे गए काम की प्रकृति ऐसी है कि वह घर से भी किया जा सकता है, तो नियोक्ता उसे घर से काम करने की अनुमति दे सकता है। यह नियोक्ता और महिला कर्मचारी द्वारा परस्पर सहमति से तय किया जा सकता है।
  • बिल में प्रतिष्ठान से अपेक्षा की गई है कि वह नियुक्ति के समय महिला को बिल के तहत प्रदत्त मातृत्व लाभ के संबंध में सूचना प्रदान करे। सूचना लिखित रूप में और इलेक्ट्रॉनिकली प्रदान की जानी चाहिए। 

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • डब्ल्यूएचओ जैसे अनेक विशेषज्ञ संगठनों ने यह सुझाव दिया है कि मां और शिशु की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए 24 हफ्ते का मातृत्व अवकाश अपेक्षित है। चूंकि इस अवकाश की भरपाई नियोक्ता द्वारा की जाती है, इसलिए इसका प्रतिकूल प्रभाव महिलाओं के रोजगार अवसरों पर पड़ सकता है।
  • विभिन्न देशों ने मातृत्व लाभ के संबंध में भिन्न-भिन्न फंडिंग मॉडलों को लागू किया है। कुछ में इसकी भरपाई नियोक्ता द्वारा की जाती है, तो कुछ में यह सरकार द्वारा चुकाया जाता है।
  • महिलाओं को दो बच्चों के लिए 26 हफ्ते का मातृत्व अवकाश प्रदान किया जाएगा, लेकिन तीसरा बच्चा होने पर 12 हफ्ते का अवकाश मिलेगा। इससे तीसरे बच्चे की वृद्धि और विकास प्रभावित हो सकता है। 
  • एक्ट और बिल के दायरे में 10 या 10 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठान और अन्य अधिसूचित प्रतिष्ठान आते हैं। लेकिन संभव है कि महिला श्रमशक्ति का एक बड़ा हिस्सा, जोकि असंगठित क्षेत्र में मौजूद है, इसके दायरे न आए।
     
  • ऐसे अनेक श्रम कानून हैं जो विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को मातृत्व लाभ प्रदान करते हैं। इन कानूनों के दायरे, उनके लाभ और वित्त पोषण भिन्न-भिन्न हैं।  

भाग क : बिल की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

वर्तमान में फैक्ट्रियों, खदानों, 10 या 10 से अधिक कर्मचारियों वाली दुकानों एवं प्रतिष्ठानों और राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य प्रतिष्ठानों में कार्यरत महिलाएं मातृत्व लाभ एक्ट, 1961 के अंतर्गत 12 हफ्ते के मातृत्व अवकाश के लिए अधिकृत हैं।

अन्य श्रम कानून भी मातृत्व लाभ का प्रावधान करते हैं। कर्मचारी राज्य बीमा एक्ट, 1948 बीमित महिला को 12 हफ्ते के मातृत्व अवकाश के दौरान वेतन के भुगतान का प्रावधान करता है।[1]  समाचार पत्रों में कार्य करने वाली महिलाएं और पत्रकार के रूप में कार्य करने वाली महिलाएं श्रमजीवी पत्रकार (सेवा की शर्तें) और विविध प्रावधान एक्ट, 1955 के तहत ऐसे ही मातृत्व अवकाश के लिए अधिकृत हैं।[2]  इसके अतिरिक्त केंद्रीय महिला कर्मचारियों को 24 हफ्ते का मातृत्व अवकाश और बच्चों की देखभाल के लिए दो वर्ष तक का अतिरिक्त अवकाश प्रदान किया जाता है।[3] 

असंगठित श्रमिक एक्ट, 2008 के अनुसार, असंगठित श्रमिक ऐसे श्रमिक हैं जो गृह आधारित, स्वरोजगार प्राप्त या 10 से कम कर्मचारियों वाले उपक्रमों में कार्य करते हैं। [4]  2008 का एक्ट केंद्र सरकार को निर्देश देता है कि वह असंगठित क्षेत्र की महिला श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य और मातृत्व लाभ योजनाओं को तैयार करे। सरकार द्वारा 2008 के एक्ट के तहत जननी सुरक्षा योजना को लागू किया गया। इस योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली महिलाओं को इस बात के लिए वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाता है कि वे प्रसव के लिए अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों में जाएं। [5],[6]  महिलाओं को वेतन की भरपाई के लिए इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना (आईजीएमएसवाई) की शुरुआत की गई है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रसव के बाद महिला आराम कर सकती है और नवजात के स्वास्थ्य की देखभाल कर सकती है।[7]  आईजीएमएसवाई एक नकद हस्तांतरण योजना है जोकि 19 वर्ष से अधिक आयु की गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं, जिनके दो से कम बच्चे हैं, के लिए 6,000 रुपयों का प्रावधान करती है। 

2015 में भारतीय विधि आयोग ने 1961 के एक्ट के तहत मातृत्व अवकाश की अवधि को 24 हफ्ते करने और इसके दायरे में असंगठित क्षेत्र की श्रमशक्ति को लाने का सुझाव दिया।[8]  पिछले कुछ वर्षों के दौरान, जिसमें 2016 भी शामिल है, भारतीय श्रम सम्मेलन ने भी मातृत्व अवकाश की अवधि को 12 से 24 हफ्ते करने का सुझाव दिया है।9 

मातृत्व लाभ (संशोधन) बिल, 2016 को 11 अगस्त, 2016 को राज्यसभा में प्रस्तावित और पारित किया गया। वर्तमान में यह बिल लोकसभा में लंबित है।

प्रमुख विशेषताएं

बिल मातृत्व लाभ एक्ट, 1961 में संशोधन करता है। तालिका 1 में 1961 के मुख्य प्रावधानों और 2016 के संशोधन में प्रस्तावित परिवर्तनों को प्रदर्शित किया गया है।

तालिका 1 : 1961 के एक्ट के प्रावधानों और 2016 के बिल के प्रस्तावित मुख्य संशोधनों के बीच तुलना:

मातृत्व लाभ एक्ट, 1961

मातृत्व लाभ (संशोधन) बिल, 2016

मातृत्व अवकाश की अवधि

·    फैक्ट्रियों, खदानों, 10 या 10 से अधिक कर्मचारियों वाली दुकानों एवं प्रतिष्ठानों और अन्य अधिसूचित प्रतिष्ठानों में कार्य करने वाली महिलाएं पूरे वेतन के साथ 12 हफ्ते के मातृत्व अवकाश के लिए अधिकृत हैं।  

·    मातृत्व अवकाश का लाभ प्रसव की संभावित तिथि से छह हफ्ते पहले से नहीं उठाया जा सकता। 

·    मातृत्व अवकाश का प्रावधान बच्चों की संख्या पर निर्भर नहीं है।

·    मातृत्व अवकाश की अवधि बढ़ाकर 26 हफ्ते की गई है।

 

 

 

 

·    छह हफ्ते की अवधि को आठ हफ्ते किया गया है।

 

 

 

 

 

 

·    दो या दो से अधिक बच्चे होने पर महिला को 12 हफ्ते का अवकाश मिलेगा, जिसका लाभ प्रसव की संभावित तिथि से छह हफ्ते पहले से ही उठाया जा सकता है।

गोद लेने वाली और कमीशनिंग महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश

·    कोई प्रावधान नहीं

·    निम्नलिखित को 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश प्रदान करता है:

(i) एक ऐसी महिला जिसने तीन महीने से कम आयु के बच्चे को कानूनन गोद लिया है, और

(ii) कमीशनिंग करने वाली महिला। कमीशनिंग करने वाली महिला ऐसी बायोलॉजिकल मदर है जो अपने एग का प्रयोग अपने सेरोगेट बच्चे के लिए करती है।

·    12 हफ्ते के मातृत्व अवकाश की अवधि को उस तारीख से गिना जाएगा, जिस तारीख को गोद लेने वाली या कमीशनिंग करने वाली महिला को बच्चा सौंपा गया है।   

क्रेश की सुविधाएं

·    कोई प्रावधान नहीं

·     50 या 50 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रत्येक प्रतिष्ठान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह एक निर्धारित दूरी के अंदर क्रेश की सुविधा प्रदान करेगा। महिला को एक दिन में चार बार क्रेश जाने की अनुमति दी जाएगी। इसमें उसका विश्राम काल भी शामिल होगा।

घर से काम करने का विकल्प

·    कोई प्रावधान नहीं

·     अगर किसी महिला को सौंपे गए काम की प्रकृति ऐसी है कि वह घर से भी किया जा सकता है, तो नियोक्ता उसे घर से काम करने की अनुमति दे सकता है। 

·     मातृत्व अवकाश के बाद इस लाभ की अवधि नियोक्ता और महिला कर्मचारी द्वारा परस्पर सहमति से तय की जाएगी।

नियोक्ता द्वारा महिला को मातृत्व अवकाश के बारे में जानकारी देना

·    कोई प्रावधान नहीं

·     किसी महिला की नियुक्ति के समय प्रतिष्ठान उसे उपलब्ध होने वाले मातृत्व लाभ के संबंध में सूचना प्रदान करेगा। यह सूचना लिखित रूप में और इलेक्ट्रॉनिकली प्रदान की जाएगी।

Sources: The Maternity Benefits Act, 1961; The Maternity Benefits (Amendment) Bill, 2016; PRS.

भाग ख:  प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

मातृत्व लाभ को 26 हफ्ते बढ़ाने के प्रभाव

मातृत्व अवकाश को बढ़ाने के फायदे और नुकसान

मातृत्व लाभ एक्ट, 1961 में नियोक्ता से अपेक्षा की गई है कि वह महिला श्रमिकों को पूरे वेतन के साथ 12 हफ्ते तक का अवकाश प्रदान करे। बिल में इस अवधि को बढ़ाकर 26 हफ्ते किया गया है। 

भारतीय विधि आयोग और भारतीय श्रम सम्मेलन सहित अनेक विशेषज्ञ संस्थाओं ने मातृत्व अवकाश की अवधि को 24 हफ्ते करने की जरूरत पर प्रकाश डाला है। [9] विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुझाव दिया है कि उत्तरजीविता दर (सरवाइवल रेट) में सुधार करने और जच्चा-बच्चा के स्वस्थ विकास के लिए पहले 24 हफ्तों तक शिशुओं को केवल स्तनपान कराया जाना चाहिए। [10] इस संबंध में यह दलील दी जाती है कि पर्याप्त मातृत्व अवकाश और आय सुरक्षा ना होने के कारण महिलाएं श्रम बाजार से बाहर हो जाती हैं। [11]  वर्तमान में केंद्रीय महिला कर्मचारी 24 हफ्ते के मातृत्व अवकाश और बच्चों की देखभाल हेतु दो वर्ष तक के अतिरिक्त अवकाश के लिए अधिकृत हैं। 3

दूसरी तरफ यह भी कहा जा सकता है कि मातृत्व अवकाश को 12 से 26 हफ्ते करने की स्थिति में महिलाओं को उपलब्ध रोजगार अवसरों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। चूंकि बिल में यह अपेक्षा की गई है कि नियोक्ता मातृत्व अवकाश के दौरान महिला को पूरा वेतन देगा इसलिए इससे नियोक्ता पर वेतन की भरपाई करने की लागत बढ़ सकती है जिसके परिणामस्वरूप वह पुरुष कर्मचारी को नौकरी पर रखने को वरीयता दे सकता है।11इससे लागत में वृद्धि का असर उन उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ सकता है जिनमें महिला श्रमिक बड़े अनुपात में कार्य करती हैं। कुछ देशों में मातृत्व अवकाश को वित्त पोषित करने के लिए विभिन्न तंत्रों को विकसित किया गया है ताकि इस समस्या का हल निकाला जा सके।

मातृत्व लाभ का वित्त पोषण

1961 के एक्ट के तहत नियोक्ता का यह दायित्व है कि वह महिला श्रमिकों को 12 हफ्ते तक की अवधि के लिए मातृत्व लाभ चुकाए। बिल में इस अवधि को बढ़ाकर 26 हफ्ते किया गया है। इसका अर्थ यह है कि नियोक्ताओं को इस अवधि के लिए महिला श्रमिकों को पूरा वेतन चुकाना होगा। प्रश्न यह है कि क्या नियोक्ताओं को मातृत्व लाभ प्रदान करने की लागत चुकानी चाहिए। यह दलील दी जा सकती है कि चूंकि जच्चा-बच्चा का स्वास्थ्य जनहित का मामला है इसलिए यह उपयुक्त होगा कि सरकार ही ऐसे सामाजिक सुरक्षा उपायों का वित्त पोषण करे। 

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मातृत्व सुरक्षा से संबंधित कन्वेंशन कहते हैं कि मातृत्व लाभ की लागत के लिए विशेष रूप से नियोक्ता उत्तरादायी नहीं होना चाहिए। [12] यह सुझाव दिया गया है कि अनिवार्य सामाजिक बीमा या पब्लिक फंड के माध्यम से लाभ प्रदान किए जाने चाहिए।

विश्व के विभिन्न देशों में मातृत्व लाभ प्रदान करने के लिए अलग-अलग फंडिंग मॉडल्स को लागू किया गया है। 2014 में आईएलओ ने 185 देशों में मातृत्व अवकाश के प्रावधानों पर एक अध्ययन किया जिसके निष्कर्ष हैं: 11

  • 25% देशों में मातृत्व लाभ नियोक्ताओं द्वारा चुकाया जाता है (जैसे केन्या, प्यूर्तो रिको, नाइजीरिया, पाकिस्तान)।
     
  • 16% देशों में नियोक्ता और सरकार, दोनों के मिश्रित फंड्स से मातृत्व लाभ प्रदान किया जाता है (जैसे ब्रिटेन, जर्मनी)।
     
  • 58% देश राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा लाभ के जरिए गर्भवती महिलाओं को नकद लाभ देते हैं (जैसे नार्वे, ऑस्ट्रेलिया)।
     
  • शेष 1% देशों में मातृत्व लाभ के लिए कोई प्रावधान नहीं है (जैसे अमेरिका और पापुआ न्यू गिनी)। 11

अगले पृष्ठ पर दी गई तालिका 2 में विभिन्न देशों में मातृत्व और पितृत्व अवकाश की अवधि, इस अवधि के दौरान दिए जाने वाले वेतन का प्रतिशत और मातृत्व लाभ की फंडिंग करने वाले स्रोतों का विवरण दिया गया है। 

तालिका 2 : मातृत्व अवकाश के संबंध में अंतरराष्ट्रीय कानूनों और वित्त पोषण के बीच तुलना

देश

मातृत्व अवकाश

पितृत्व अवकाश

वेतन का प्रतिशत

फंडिंग का स्रोत

भारत*

एक्ट: 12 हफ्ते

बिल: 26 हफ्ते

कोई प्रावधान नहीं

100%

नियोक्ता

ब्रिटेन

52 हफ्ते

लगातार 14 दिन

·  महिलाएं: 6 हफ्ते के लिए औसत साप्ताहिक आय के 90% की दर से वैतनिक अवकाश, 7-39 हफ्ते के लिए फ्लैट रेट या 90% (जो भी कम हो) की दर से वैतनिक अवकाश, 40-52 हफ्ते के लिए अवैतनिक अवकाश

·  पुरुष: फ्लैट रेट लाभ या औसत साप्ताहिक आय का 90% (जो भी कम हो)

मिश्रित (पब्लिक फंड से नियोक्ताओं को 92% तक की प्रतिपूर्ति)

दक्षिण अफ्रीका

17 हफ्ते

3 दिन

·  महिलाएं: 60%

·  पुरुष: 100%

·  महिलाएं: मिश्रित (नियोक्ता, कर्मचारी, सरकार द्वारा योगदान)

·  पुरुष: नियोक्ता का दायित्व

सिंगापुर

16 हफ्ते

7 दिन

पहला और दूसरा बच्चा होने पर 100%

मिश्रित (8 हफ्ते नियोक्ता और 8 हफ्ते पब्लिक फंड)

ब्राजील

17 हफ्ते

5 दिन

100%

·  महिलाएं: मिश्रित (नियोक्ता, कर्मचारी, सरकार द्वारा योगदान)

·  पुरुष: नियोक्ता का दायित्व

चीन

14 हफ्ते

कोई प्रावधान नहीं

100%

बीमा योजना के जरिए नियोक्ता का योगदान

फ्रांस

16 हफ्ते

11 दिन

100%,एक अधिकतम सीमा तक

सामाजिक बीमा योजना

ऑस्ट्रेलिया

52 हफ्ते

14 दिन

·  महिलाएं: संघीय न्यूनतम वेतन स्तर पर 18 हफ्ते

·  पुरुष: संघीय न्यूनतम वेतन

पब्लिक फंड

कनाडा

17 हफ्ते (संघीय)

कोई प्रावधान नहीं

15 हफ्ते के लिए 55%, अधिकतम सीमा तक

पब्लिक फंड

अमेरिका

12 हफ्ते (संघीय)

कोई प्रावधान नहीं

अवैतनिक

कोई प्रावधान नहीं

Note: *India: Covers benefits under the Maternity Benefits Act, 1961 only.

Sources: Maternity and paternity at work: Law and practice across the world, ILO, 2014; laws of various countries; PRS.

दो या दो से अधिक बच्चों वाली महिलाओं को केवल 12 हफ्ते का अवकाश

बिल में मातृत्व अवकाश की अवधि को 12 से 26 हफ्ते तक बढ़ाया गया है। लेकिन यह व्यवस्था दो या दो से अधिक जीवित बच्चों वाली महिलाओं पर लागू नहीं होती। ऐसी महिलाएं 12 हफ्ते के अवकाश के लिए ही अधिकृत होंगी। सरकार का कहना है कि बिल शैशवकाल में बच्चे की मां द्वारा देखभाल को सुनिश्चित करने के लिए मातृत्व अवकाश को 26 हफ्ते तक बढ़ाने का प्रयास करता है। यह भी कहा गया है कि बच्चे की वृद्धि और विकास के लिए ऐसी शुरुआती देखभाल अनिवार्य है।[13]  यह लक्ष्य संभवतः तब हासिल नहीं हो पाएगा, जब तीसरे शिशु के जन्म के बाद पर्याप्त मातृत्व अवकाश नहीं दिया जाएगा। वर्तमान में 1961 के एक्ट के तहत पहले के बच्चों की संख्या पर ध्यान दिए बिना, 12 हफ्ते के न्यूनतम मातृत्व अवकाश का प्रावधान सभी मामलों में लागू होता है।

एक्ट के दायरे में असंगठित क्षेत्र की महिला श्रमिक शामिल नहीं

1961 के एक्ट के दायरे में फैक्ट्रियों, खदानों, 10 या 10 से अधिक कर्मचारियों वाली दुकानों एवं प्रतिष्ठानों और अन्य प्रतिष्ठानों में कार्य करने वाली महिलाएं शामिल हैं। ये लगभग 18 लाख महिला श्रमिक हैँ।13  उल्लेखनीय है कि कुल महिला श्रमशक्ति का 90% भाग असंगठित क्षेत्र में काम करता है और वह 1961 के एक्ट के दायरे में नहीं आता। [14],152015 में भारतीय विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि 1961 के एक्ट के प्रावधानों में असंगठित महिला श्रमिकों सहित सभी महिला कर्मचारियों को शामिल किया जाना चाहिए।8

असंगठित क्षेत्र की महिलाओं में खेतिहर मजदूर, मौसमी श्रमिक, घरेलू कामगार या निर्माण श्रमिक आते हैं। अक्सर ऐसी महिलाएं असंगठित स्थितियों में कार्य करती हैं और कई बार उनके कई-कई नियोक्ता होते हैं। रोजगार की ऐसी स्थिति होने के कारण वे 1961 के एक्ट के कुछ प्रावधानों के तहत पात्र साबित नहीं हो सकतीं, जैसे प्रसव से पूर्व एक वर्ष के दौरान 80 दिनों तक निरंतर काम करना। 

वर्तमान में ऐसी महिलाएं इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना, जोकि एक सशर्त नकद हस्तांतरण योजना है, के तहत मातृत्व लाभ का दावा कर सकती हैं। 7  इस योजना के तहत दो बच्चों के जन्म के लिए किसी गर्भवती महिला को 6,000 रुपए प्रदान किए जाते हैं। योजना के तहत एकमुश्त भुगतान किया जाता है लेकिन इसमें आय के नुकसान या रोजगार सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे मुद्दों को हल नहीं किया गया है। इससे ऐसी महिलाओं के लिए शिशु और अपने स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिए काम से पूरी तरह आराम लेना मुश्किल हो सकता है। 

मातृत्व लाभ से संबंधित अन्य श्रम कानूनों में एकरूपता की कमी

वर्तमान में ऐसे अनेक श्रम कानून हैं जो विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को मातृत्व लाभ प्रदान करते हैं। इन कानूनों का दायरा, लाभ और लाभ का वित्त पोषण अलग-अलग है। 2002 में द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग ने सामाजिक सुरक्षा से जुड़े विभिन्न श्रम कानूनों, जिसमें मातृत्व लाभ भी शामिल है, को सुसंगत करने का सुझाव दिया[15] निम्नलिखित तालिका 3 में मातृत्व लाभ प्रदान करने वाले विभिन्न श्रम कानूनों को स्पष्ट किया गया है।  

तालिका 3 : विभिन्न क्षेत्रों में मातृत्व लाभ प्रदान करने वाले श्रम कानून

महिलाओं पर लागू होने वाले श्रम कानून

दायरा

मातृत्व लाभ संबंधी प्रावधान

वित्त पोषण

मातृत्व लाभ एक्ट, 1961

·  फैक्ट्री, खदान, बागान,

·  10 कर्मचारियों से अधिक वाली दुकानें और प्रतिष्ठान,

·  राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य प्रतिष्ठान।

·  12 हफ्ते (पूरे वेतन के साथ)

·  नियोक्ता

कर्मचारी राज्य बीमा एक्ट, 1948

·  मौसमी फैक्ट्रियों के अतिरिक्त सभी फैक्ट्रियां,

·  केंद्र या राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य प्रतिष्ठान और जिनमें कर्मचारियों का वेतन 15,000 या उससे कम है।*

·  12 हफ्ते (पूरे वेतन के साथ)*

·  मिश्रित (नियोक्ता का योगदान: वेतन का 4.75% भाग, कर्मचारी का योगदान: वेतन का 1.75% भाग)

अखिल भारतीय सेवा (अवकाश) नियम, 1955

·  भारतीय प्रशासनिक सेवा;

·  भारतीय पुलिस सेवा;

·  भारतीय इंजीनियर सेवा (सिंचाई, ऊर्जा, भवन और सड़कें),

·  भारतीय वन सेवा;

·  भारतीय चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा।

·  महिलाएं: 24 हफ्ते, अगर दो से कम जीवित बच्चे हैं (पूरे वेतन के साथ),

·  गोद लेने वाली महिलाएं भी शामिल;

·  दो बच्चों की देखभाल के लिए अधिकतम 730 दिन के अवकाश का प्रावधान, जब तक कि वे बच्चे 18 वर्ष के नहीं हो जाते (पूरे वेतन के साथ),

·  पुरुष: 15 दिन, अगर दो से कम जीवित बच्चे हैं (पूरे वेतन के साथ)।

·  नियोक्ता (केंद्र सरकार)

केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972

·  ऐसे सरकारी कर्मचारी, जो सिविल सेवा और केंद्रीय मामलों से संबंधित पदों पर कार्य करते हैं,

·  रेलवे कर्मचारी, कैजुअल श्रमिक, औद्योगिक श्रमिक, इत्यादि इसके दायरे में नहीं आते।

·  महिलाएं: 180 दिन, अगर दो से कम जीवित बच्चे हैं (पूरे वेतन के साथ),

·  गोद लेने वाली महिलाएं : अगर दो से कम बच्चे हैं तो 60 दिन का अवकाश, जिसे एक वर्ष के भीतर लेना होता है,

·  दो बच्चों की देखभाल के लिए अधिकतम 730 दिन के अवकाश का प्रावधान, जब तक कि वे बच्चे 18 वर्ष के नहीं हो जाते (पूरे वेतन के साथ),

·  पुरुष: 15 दिन, अगर दो से कम जीवित बच्चे हैं (पूरे वेतन के साथ)।

·  नियोक्ता (केंद्र सरकार)

फैक्ट्री एक्ट, 1948

·  जैसा कि एक्ट में पारिभाषित है, फैक्ट्रियों में कार्य करने वाले श्रमिक।

·  12 हफ्ते (पूरे वेतन के साथ)

·  नियोक्ता

श्रमजीवी पत्रकार (सेवा की शर्तें) और विविध प्रावधान नियम, 1957

·  समाचार पत्रों में कार्य करने वाली महिला पत्रकार।

·  3 महीने (पूरे वेतन के साथ)

·  नियोक्ता

भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार का रेगुलेशन और सेवा की शर्तें) एक्ट, 1996

·  ऐसे श्रमिक जो किसी ऐसे प्रतिष्ठान में काम करते हैं जहां 10 या 10 से अधिक श्रमिक किसी भवन या निर्माण कार्य में संलग्न हैं।

·  महिला लाभार्थियों को राज्य कल्याण बोर्ड द्वारा मातृत्व लाभ भुगतान किए जाते हैं।

·  मिश्रित [केंद्र सरकार, लाभार्थियों और अन्य स्रोतों के योगदान वाले फंड द्वारा भुगतान किया जाता है]

असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा एक्ट, 2008

·  वस्तुओं की बिक्री और सेवाएं प्रदान करने में संलग्न उपक्रम, जिनमें 10 से कम कर्मचारी हैं।

·  केंद्र सरकार को मातृत्व लाभ हेतु योजनाएं बनाने के संबंध में निर्देश देता है।

·  केंद्र सरकार

*Note: The Ministry of Labour and Employment has recently released two draft amendments to the EmployeesState Insurance (Central) Rules, 1950.[16]  The draft Rules seek to raise the period of maternity benefit to 26 weeks, and extend its coverage to adoptive and commissioning mothers.

Sources: Various central Acts and Rules;[17] PRS.

 

[1]Rule 56 (2), Employees State Insurance (Central) Rules, 1950.

[2]Rule 29, Working Journalists and Other News Paper Employees (Conditions of Service) and Miscellaneous Provisions Rules 1957.

[3]Rule 18, The All India Services (Leave) Rules, 1955; Rule 43(1), Central Civil Services (Leave) Rules, 1972.

[4]Section 2 (l), The Unorganised Workers Social Security Act, 2008.

[5].  Schedule I, The Unorganised Workers Social Security Act, 2008.

[6]Janani Suraksha Yojana, National Health Mission, Ministry of Health and Family Welfare, http://nrhm.gov.in/nrhm-components/rmnch-a/maternal-health/janani-suraksha-yojana/background.html.

  1. Indira Gandhi Matritva Sahyog Yojana: 2011 Guidelines and 2013 notification, Ministry of Women and Child Development,http://wcd.nic.in/sites/default/files/IGMSYscheme.pdf;http://wcd.nic.in/sites/default/files/nfsigmsydtd10012013.pdf

[8]Report no. 259: Early Childhood Development and Legal Entitlements, August 2015, Law Commission of India.

[9]46th Session of Indian Labour Conference, July 2015, Ministry of Labour and Employment, http://www.labour.nic.in/46th-session-indian-labour-conference.

[10].  ‘Infant and young child feeding: Factsheet, World Health Organisation, September, 2016, http://www.who.int/mediacentre/factsheets/fs342/en/.

[11]Maternity and paternity at work: Law and practice across the world, International Labour Organisation Report 2014, http://www.ilo.org/global/topics/equality-and-discrimination/maternity-protection/publications/maternity-paternity-at-work-2014/lang--en/index.htm.

[12]International Labour Organisation Maternity Protection Conventions Nos. 3 and 103; http://www.ilo.org/travail/aboutus/WCMS_119238/lang--en/index.htm.

[13].  “Amendments to the Maternity Benefits Act, 1961, Press Information Bureau, Union Cabinet, August 10, 2016, http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=148712.

[14].  “The Challenge of Employment in India: An Informal Economy Perspective, National Commission for Enterprises in the Unorganised Sector, Volume II, April 2009, http://nceuis.nic.in/The_Challenge_of_Employment_in_India_(Vol.%20II).pdf.

[15]Report of the Second National Commission on Labour, 2002, http://www.prsindia.org/uploads/media/1237548159/NLCII-report.pdf.

[16].  “Draft Rules: EmployeesState Insurance (Central) Amendment Rules, 2016, Notification G.S.R. 958(E), Notification G.S.R. 957(E), October 6, 2016, Ministry of Labour and Employment.

[17]Maternity Benefit Act, 1961, Employees State Insurance Act and Rules, 1948, The Factories Act, 1948, Working Journalists (Conditions of Service) and Miscellaneous Provisions Rules, 1957, All India Services (Leave) Act and Rules, 1955, Central Civil Services (Leave) Rules, 1972, Unorganised WorkersSocial Security Act, 2008, The Building and other Construction Workers (Regulation of Employment and Conditions of Service) Act, 1996.

 

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