मंत्रालय: 
कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन
  • प्रस्तावित
    राज्यसभा
    अगस्त 19, 2013
    Gray
  • रेफर
    स्टैंडिंग कमिटी
    अगस्त 23, 2013
    Gray
  • रिपोर्ट
    स्टैंडिंग कमिटी
    फ़रवरी 06, 2014
    Gray
  • रेफर
    सिलेक्ट कमिटी
    दिसंबर 11, 2015
    Gray
  • रिपोर्ट
    सिलेक्ट कमिटी
    अगस्त 12, 2016
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    जुलाई 19, 2018
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    जुलाई 24, 2018
    Gray

बिल की मुख्य विशेषताएँ

  • भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) बिल, 2013 भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम (एक्ट), 1988 में संशोधन करता है।
  • इस एक्ट के तहत किसी सरकारी कर्मचारी को उकसा कर रिश्वत देना एक अपराध माना गया है। इस बिल में किसी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देने, और किसी व्यावसायिक संगठन द्वारा रिश्वत देने से संबंधित विशेष प्रावधान तैयार किए गए हैं।  
     
  • इस बिल में केवल संपत्ति की हेराफेरी और आय से अधिक संपत्ति रखने को लेकर आपराधिक दुर्व्यवहार को दोबारा परिभाषित किया गया है।
     
  • इस बिल में रिश्वत लेने से संबंधित अपराधों, आदतन रिश्वत लेने और रिश्वत को बढ़ावा देने से संबंधित अपराधों के लिए परिभाषाओं और दंडों में संशोधन किया गया है।
     
  • इस बिल में भ्रष्टाचार के आरोपी सरकारी कर्मचारियों की संपत्ति की कुर्की और जब्ती के लिए अधिकार और प्रक्रियाओं को बताया गया है।
     
  • एक्ट के तहत सेवारत सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा करने से पहले पूर्व अनुमति अनिवार्य है। यह बिल सेवानिवृत्त कर्मचारियों को भी यह सुरक्षा प्रदान करता है।

प्रमुख मुद्दे और विश्लेषण

  • इस बिल में रिश्वत देने को एक विशेष अपराध माना गया है। सभी परिस्थितियों के अंतर्गत रिश्वत देने के लिए दंड दिया जाएं या नहीं इसे लेकर अलग-अलग विचार हैं। कुछ ने यह तर्क दिया है कि मजबूरी में रिश्वत देने वाले व्यक्ति और अपनी इच्छा से रिश्वत देने वाले व्यक्ति में फर्क किया जाए।
     
  • इस बिल में उस प्रावधान को हटा दिया गया है जो रिश्वत देने वाले को, भ्रष्टाचार के मुकदमे की सुनवाई के दौरान उसके द्वारा दिये गए किसी भी बयान के लिए, सजा से बचाता है। ऐसा करना रिश्वत देने वाले को कोर्ट में गवाह के रूप में पेश होने से रोक सकता है।
     
  • इस बिल में आपराधिक दुर्व्यवहार की परिभाषा को बदल दिया गया है। अब आय से अधिक सम्पत्तियों को रखने के अलावा उन्हें रखने की नीयत को भी साबित करना ज़रूरी हो जाएगा। इस प्रकार से, इस बिल में आय से अधिक संपत्ति रखने के अपराध को साबित करने की सीमा को बढ़ा दिया गया है।
     
  • आपराधिक दुर्व्यवहार के अपराध को दोबारा परिभाषित करने में, यह बिल उन परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखता है जहां सरकारी अधिकारी: (i) अवैध तरीकों का उपयोग करता हो, (ii) अपने पद का दुरुपयोग करता हो, या (iii) सार्वजनिक हितों की अनदेखी कर स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के लिए बहुमूल्य चीज़ या इनाम प्राप्त करता हो।
     
  • इस एक्ट के तहत, रिश्वत लेने के अपराधों के लिए व्यक्ति को पहले से ही आदतन रिश्वत लेने या रिश्वत को बढ़ावा देने का दोषी मान लिया जाता है। इस बिल में रिश्वत लेने के अपराध को ही शामिल करने के लिए इस प्रावधान में संशोधन किया गया है।

भाग अ: बिल की मुख्य विशेषताएँ[1]

संदर्भ

वर्तमान में, सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार से जुड़े अपराधों को भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988 द्वारा रेग्युलेट किया जाता है। भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988 के तहत रिश्वत लेना अपराध माना जाता है और किसी भी सरकारी अधिकारी पर मुकदमा चलाने से पहले सरकारी अनुमति की ज़रूरत होती है। 2008 में, एक संशोधन बिल पेश किया गया था जिसमें भूतपूर्व सरकारी अधिकरियों पर मुकदमा करने, और भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों की संपत्ति की कुर्की करने के लिए पूर्व अनुमति प्राप्त करने से संबंधित प्रावधानों को शामिल किया गया है। हालांकि, यह बिल लैप्स हो चुका है।[2]  

1999 में, भारतीय विधि आयोग (लॉ कमीशन) ने सुझाव दिया कि भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों की संपत्ति जब्त करने से संबंधित एक अलग बिल पेश किया जाए।[3] 2007 में, दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि एक्ट में रिश्वत देने को अपराध मानने, कुछ विशेष मामलों में मुकदमा करने से पहले अनुमति लेने को सीमित करने, और भ्रष्टाचार के दोषी सरकारी अधिकारियों की संपत्ति की कुर्की करने से जुड़े प्रावधानों को शामिल करने के लिए उसमें संशोधन किया जाए।[4] 2011 में, भारत ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में सहमति जताई, और अपने घरेलू कानूनों में सम्मेलन की शर्तों के अनुसार सुधार करने की स्वीकृति दी। यूएन सम्मेलन में रिश्वत देने और लेने, सरकारी अधिकारियों द्वारा अवैध तरीके से आमदनी करने और आय से अधिक संपत्ति रखने, विदेशी सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने, और निजी क्षेत्र में रिश्वतख़ोरी को अपराध माना गया है।[5]   

अगस्त 2013 को संसद में भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) बिल, 2013 पेश किया गया था। वह बिल भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988 में संशोधन करता है। उस बिल में किसी व्यक्ति और संगठन द्वारा रिश्वत देने को अपराध मानने, भूतपूर्व सरकारी अधिकारियों पर मुकदमा चलाने से पहले पूर्व अनुमति लेने और संपत्ति की कुर्की और जब्ती का प्रावधान शामिल किया गया है। उस बिल की जांच कर रही स्थायी समिति ने फरवरी 2016 को अपनी रिपोर्ट जमा की।[6]

मुख्य विशेषताएँ

यह बिल भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988 के कई प्रावधानों में संशोधन करता है और रिश्वत देने, और संपत्ति की कुर्की और जब्ती जैसे कुछ नए प्रावधान जोड़ता है।

तालिका 1: बिल में प्रस्तावित मुख्य बदलावों की तुलना एक्ट के प्रावधानों के साथ:

 

भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988

 भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) बिल, 2013

वर्तमान या भावी सरकारी कर्मचारी द्वारा रिश्वत लेना

·  वेतन के अलावा किसी प्रकार के इनाम को प्राप्त करना या उसका प्रयास करना। यह इनाम किसी सरकारी काम को करने या करने की इच्छा रखने से जुड़ा होना चाहिए।

·  किसी ऐसे सरकारी काम के लिए इनाम स्वीकार करना जो किसी व्यक्ति के पक्ष या विरोध में हो।

·  किसी सरकारी कर्मचारी के ऊपर निजी प्रभाव डालने के लिए अन्य व्यक्ति से इनाम स्वीकार करना।

·  अनुचित तरीके से सरकारी काम करने के लिए इनाम को प्राप्त करना या उसका प्रयास करना

·  इनाम के बदले में अन्य सरकारी कर्मचारी को अनुचित तरीके से उसका सरकारी करने के लिए उकसाना।

·  सरकारी काम को निम्न रूप से परिभाषित किया गया है: i) सार्वजनिक प्रकृति का, ii) रोजगार से संबंधित, iii) निष्पक्ष भाव से अच्छी नीयत के साथ किया जाने वाला।

·  गलत प्रदर्शन में निम्न शामिल हैं: i) प्रासंगिक उम्मीद का उल्लंघन, ii) एक ऐसे काम को करने में असफलता जो उम्मीद का उल्लंघन करता हो।

·  प्रासंगिक उम्मीद को निम्न रूप से परिभाषित किया गया है: i) अच्छी नीयत से किया गया काम, या ii) विश्वास की स्थिति में किया गया काम ।

सरकारी कर्मचारी को प्रभावित करने के लिए किसी व्यक्ति से रिश्वत लेना

·  किसी के हित या अहित के लिए अवैध तरीके से सरकारी कर्मचारी को बहकाने के लिए किसी व्यक्ति से इनाम प्राप्त करना।

·  किसी के हित या अहित के लिए सरकारी कर्मचारी के ऊपर निजी प्रभाव डालने के लिए इनाम प्राप्त करना।

बिल में कोई प्रावधान नहीं है।

सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देना

·  कोई विशेष प्रावधान नहीं।

·  उकसाने के प्रावधान के तहत आता है।

·  किसी सरकारी अधिकारी से गलत तरीके से उसका सरकारी काम करवाने के लिए किसी व्यक्ति को इनाम देने की पेशकश करना या वादा करना।

·  किसी सरकारी अधिकारी को इनाम पेश करना, यह जानते हुए कि उसे स्वीकार करने से वह अपना सरकारी काम गलत तरीके से करेगा।

व्यावसायिक संगठन द्वारा किसी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देना।

·  कोई विशेष प्रावधान नहीं।

·  उकसाने के प्रावधान के तहत आता है।

·  व्यवसाय में कोई लाभ प्राप्त करने या उसे कायम रखने के एवज़ में इनाम की पेशकश करना।

·  संगठन के लिए कार्यरत व्यक्ति और संगठन के मुखिया को भी उत्तरदाई बनाया जाता है।

·  संगठन और उसके मुखिया को उत्तरदाई नहीं माना जाएगा अगर यह साबित हो गया कि संगठन ने पर्याप्त उपाय किए थे, और मुखिया को उस कार्य की कोई जानकारी नहीं थी।

उकसाना

·  किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अन्य सरकारी कर्मचारी को प्रभावित करने से संबंधित अपराध के लिए उकसाने को शामिल किया गया है।

·  किसी व्यक्ति द्वारा निम्न से संबंधित अपराध के लिए उकसाने को शामिल किया गया है i) रिश्वत लेना और ii) व्यावसायिक लेनदेन से जुड़े व्यक्ति से बहुमूल्य चीज़ लेना।

·  एक्ट के तहत सभी अपराधों के लिए किसी भी व्यक्ति द्वारा उकसाने को शामिल करता है।

 

सरकारी कर्मचारी द्वारा आपराधिक दुर्व्यवहार

·  आदतन रिश्वत या मुफ्त में बहुमूल्य चीज़ लेना।

·  उसके नियंत्रण वाली संपत्ति पर धोखे से कब्जा करना।

·  अवैध तरीके से बहुमूल्य चीज़ या इनाम लेना।

·  किसी बहुमूल्य चीज़ या पैसे को लेने के लिए पद का दुरुपयोग।

·  बिना सार्वजनिक हित के बहुमूल्य चीज़ या पैसा लेना।

·  आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक पैसे या संपत्ति को रखना।

·  सरकारी कर्मचारी को सौंपी गई संपत्ति पर धोखे से कब्जा करना।

·  अवैध साधनों द्वारा जानबूझकर पैसा या संपत्ति इकट्ठा करना और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति या संसाधन रखना।

आदतन अपराधी

किसी सरकारी कर्मचारी को प्रभावित करने या रिश्वत लेने के लिए उकसाने वास्ते आदतन इनाम लेना।

एक्ट के तहत एक ऐसे व्यक्ति द्वारा अपराध करना जिसे पहले भी दोषी पाया गया हो।

संपत्ति की कुर्की और कब्जा

एक्ट के तहत कोई विशेष प्रावधान नहीं।

अगर किसी अधिकृत पुलिस जांच अधिकारी को विश्वास हो कि सरकारी अधिकारी अपराध का दोषी है, तो वह संपत्ति की कुर्की के लिए स्पेशल जज के पास जा सकता है।

मुकदमे के लिए पूर्व अनुमति

सरकारी अधिकारियों पर मुकदमे के लिए उपयुक्त प्राधिकारी से पूर्व अनुमति की आवश्यकता है।

भूतपूर्व सरकारी अधिकारियों के लिए भी पूर्व अनुमति की आवश्यकता है, यदि वह कार्य उनकी आधिकारिक क्षमता में किया गया था।

रिश्वत देने वाले की मुकदमे से सुरक्षा

किसी सरकारी कर्मचारी पर चलने वाले भ्रष्टाचार के मुकदमे में रिश्वत देने वाले द्वारा दिया गया कोई भी बयान उसे उकसाने के अपराध के लिए दोषी नहीं मानेगा।

बिल के तहत कोई विशेष प्रावधान नहीं।

दंड*:

·  आदतन अपराधी

·  आपराधिक दुर्व्यवहार

·  अन्य (रिश्वत लेना, उकसाना)

 

·  5-10 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

·  4-10 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

·  3-7 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

 

·  3-10 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

·  बिल में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

·  3-7 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

*नोट: इस तालिका में दिसंबर 2013 में लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट, 2013 द्वारा भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988 में किए गए संशोधन दिखाए गए हैं।

स्रोत: भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988; लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट, 2013; भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) बिल; PRS.

 

भाग ब: प्रमुख मुद्दे और विश्लेषण

बिल के तहत रिश्वत देने को विशेष अपराध मानने को शामिल करना

सभी परिस्थितियों में रिश्वत देने को अपराध मानना

मुख्य एक्ट के तहत, रिश्वत देने वाले पर रिश्वत लेने के लिए उकसाने के लिए दंड लगाया जा सकता है। बिल के तहत, प्रत्यक्ष या किसी तीसरे पक्ष द्वारा, रिश्वत देने को अपराध माना गया है।

कई विशेषज्ञों ने इस मुद्दे की जांच की है कि सभी परिस्थितियों में रिश्वत देने को मुख्य एक्ट के तहत अपराध माना जाए या नहीं। यूएन कन्वेंशन में कहा गया है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी गई रिश्वत को दंडनीय अपराध बनाया जाए।[7] भारत ने इस कन्वेंशन में सहमति जताई है।

दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट ने सुझाव दिया है कि भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट को मजबूरी और अपनी इच्छा से रिश्वत देने वालों के बीच अंतर करना चाहिए।4 बिल की जांच कर रही स्थायी समिति ने गौर किया कि सामान्य परिस्थितियों में रिश्वत देने के बाद राज्य को इस मामले की सूचना देने वालों और मजबूरी में रिश्वत देने वालों के बीच अंतर किया जा सकता है। जबकि पहले मामले में किसी प्रकार की सुरक्षा देने की ज़रूरत नहीं है, दूसरे मामले में कोर्ट मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय ले सकता है।6 यह तर्क भी दिया गया है कि प्रताड़ित रिश्वतदाता को सुरक्षा देने से मामले की सूचना देने के लिए उसे हौंसला मिलेगा।[8] 

गवाह के रूप में रिश्वत देने वालों को सुरक्षा दिये जाने को हटाया गया

मुख्य एक्ट के तहत, भ्रष्टाचार के मुकदमे के दौरान, अगर कोई व्यक्ति बयान देता है कि उसने रिश्वत दी तो उस बयान को उकसाने के अपराध के लिए उस व्यक्ति पर मुकदमा चलाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। बिल में इस प्रावधान को हटा दिया गया है। ऐसा करने से सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध मामलों में रिश्वत देने वाले गवाह के तौर पर आने से हिचकिचाएंगे।

एक्ट में कुछ विशेष अपराध जिनका संशोधन बिल में किया गया है

आय से अधिक संपत्ति रखने के लिए नीयत स्थापित करना

मुख्य एक्ट के तहत, आय से अधिक संपत्ति रखने के अपराध को साबित करने के लिए सरकारी कर्मचारी के कब्जे में आय से अधिक धन या संपत्ति की मौजूदगी को स्थापित करना ज़रूरी होगा।

बिल में इस प्रावधान में संशोधन किया गया है। यह साबित करने के लिए कि सरकारी कर्मचारी के पास आय से अधिक संपत्ति थी, दो बातों को साबित करना होगा: i) उसके पास उसकी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक पैसे या संपत्ति का होना, और ii) स्वयं के लिए गलत तरीके से पैसे या संपत्ति इकट्ठा करने की उस सरकारी कर्मचारी की नीयत। इस प्रकार से, आय से अधिक संपत्ति की मौजूदगी के अतिरिक्त सरकारी कर्मचारी द्वारा आय से अधिक संपत्ति इकट्ठा करने की नीयत को साबित करने की आवश्यकता के चलते, यह बिल अपराध सिद्ध करने की सीमा को बढ़ा रहा है।

स्थायी समिति ने गौर किया है कि सरकारी कर्मचारी द्वारा आय से अधिक संपत्ति के स्रोत के बारे में सही से बता नहीं पाना मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त है। समिति ने सुझाव दिया है कि बिल में से ‘नीयत’ वाले अंश को हटा दिया जाए।6

आपराधिक दुर्व्यवहार से जुड़े कुछ विशेष अपराधों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है

मुख्य एक्ट के तहत, सरकारी कर्मचारी द्वारा आपराधिक दुर्व्यवहार में निम्न शामिल हैं: i) स्वयं या अन्य किसी व्यक्ति के लिए कोई बहुमूल्य चीज़ या पैसे लेने के लिए अवैध तरीकों का उपयोग करना; ii) स्वयं या अन्य किसी व्यक्ति के लिए कोई बहुमूल्य चीज़ या पैसे लेने के लिए सरकारी कर्मचारी के रूप में अपने ओहदे का दुरुपयोग करना; और iii) किसी व्यक्ति के लिए बिना सार्वजनिक हित बहुमूल्य चीज़ या पैसे लेना।

यह बिल सरकारी कर्मचारी द्वारा आपराधिक दुर्व्यवहार को दोबारा परिभाषित कर निम्न को शामिल करता है: i) किसी व्यक्ति के नियंत्रण में संपत्ति पर धोखे से कब्जा करना, और ii) आय से अधिक संपत्ति को जानबूझकर अवैध तरीके से इकट्ठा करना और कब्जा करना। ऐसा करते हुए, यह बिल मुख्य एक्ट में प्रदान की गई तीन परिस्थितियों को अब शामिल नहीं करता है।

दोषी व्यक्ति को केवल रिश्वत लेने के आरोप को साबित करना होगा

मुख्य एक्ट में एक प्रावधान शामिल है जो निम्न से संबंधित अपराधों के लिए मुकदमा झेल रहे व्यक्ति पर सबूत लाने की ज़िम्मेदारी डालता है: i) रिश्वत लेना, ii) आदतन अपराधी होना और iii) अपराध के लिए उकसाना। उसके अनुसार अगर यह साबित हो जाता है कि उस व्यक्ति ने इनाम लिया या दिया है, तो मान लिया जाएगा कि वह इनाम रिश्वत थी। मुख्य एक्ट के तहत, रिश्वत देने पर उकसाने के अपराध के तहत दंडित किया जाएगा।

यह बिल इस प्रावधान में संशोधन करता है। इस बिल के तहत, दोषी व्यक्ति को ही रिश्वत लेने के अपराध को साबित करना होगा। इस मामले में, उसे साबित करना होगा कि उसके द्वारा प्राप्त किया गया इनाम रिश्वत नहीं थी। लेकिन i) आदतन अपराधी होने, ii) उकसाने, और iii) रिश्वत देने से संबंधित अपराधों के लिए यह माना नहीं जाएगा कि उसने अपराध किए हैं, बल्कि मुकदमा करने वाले को इस बात को साबित करना पड़ेगा।

मामूली इनामों में छूट नहीं  

मुख्य एक्ट के तहत, अगर अदालत सरकारी कर्मचारी द्वारा प्राप्त इनाम को ‘मामूली’ माने, तब उसे भ्रष्टाचार नहीं माना जाएगा। बिल में ‘मामूली’ इनाम से संबंधित प्रावधान को हटा दिया गया है।

व्यावसायिक लेनदेन से जुड़े व्यक्ति से बहुमूल्य चीज़ लेना

मुख्य एक्ट उस सरकारी कर्मचारी को दंड देता है जो व्यावसायिक लेनदेन से जुड़े व्यक्ति से या जिसे वह आधिकारिक रूप से जानता हो, उससे कोई बहुमूल्य चीज़ थोड़ी कीमत पर या मुफ्त में स्वीकार या प्राप्त करता हो। बिल में यह प्रावधान हटा दिया गया है।

स्थायी समिति के सुझाव

बिल की जांच कर रही स्थायी समिति ने कुछ सुझाव दिये हैं: 6

  • आय से अधिक संपत्ति के आरोपी सरकारी कर्मचारी की नीयत को साबित करने वाले प्रावधान को हटाया जाए। सरकारी कर्मचारी द्वारा उसकी आय से अधिक संपत्ति के स्रोत के बारे में स्पष्ट रूप से नहीं समझा पाने को ही मुकदमे के लिए पर्याप्त माना जाए।
  • आदतन अपराधियों के लिए न्यूनतम दंड को तीन से पाँच वर्ष किया जाए जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता हो। ऐसा करने से लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट, 2013 के साथ समानता सुनिश्चित होगी। भ्रष्टाचार के मामलों के मुकदमे के लिए समय सीमा लोकपाल और लोकयुक्त के पास विचारार्थ मामलों में दिए गए समय अनुसार तय होनी चाहिए।
  • व्यावसायिक संस्थाओं (केवल जुर्माना) और ऐसी संस्थाओं से जुड़े लोगों (तीन से सात वर्ष का कारावास, जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है) के लिए दंड में भिन्नता है। व्यावसायिक संगठनों के लिए निर्धारित दंड संगठन के प्रभारी व्यक्तियों के लिए निर्धारित दंड से अतिरिक्त होना चाहिए।
  • बिल में भ्रष्टाचार और भ्रष्ट प्रथाओं की परिभाषाओं को शामिल किया जाना चाहिए। इसके अलावा, ‘सरकारी कर्मचारी की परिभाषा में सेवानिवृत्त अधिकारियों को उस प्रावधान के अनुसार शामिल किया जाना चाहिए जो सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमे के लिए अनुमति का संरक्षण प्रदान करता है।
  • सरकार को ऐसे नियम और विनियम तैयार करने चाहिए जिससे जबरन रिश्वतख़ोरी के अवसरों का कम होना सुनिश्चित किया जा सके। माल और सेवा की समयबद्ध डिलिवरी के लिए नागरिकों का अधिकार बिल, 2011 और व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण बिल, 2011 जैसे कानूनों को लागू किया जाना चाहिए। ऐसा करने से उन व्यक्तियों की चिंताओं का निवारण हो सकेगा जिन्हें सेवाओं की प्राप्ति के लिए रिश्वत देने को मजबूर होना पड़ता है, और भ्रष्टाचार के मामलों की रिपोर्ट करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। [व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण बिल, 2011 को लागू कर दिया गया है।]

दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग के सुझाव

2007 में, दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी) ने भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988 से जुड़े कुछ विशेष सुझाव दिये, जिन्हें बिल में शामिल नहीं किया गया है।

तालिका 2: दूसरे एआरसी के सुझाव जिन्हें बिल में शामिल नहीं किया गया है

मुद्दा

दूसरे एआरसी की चौथी रिपोर्ट

भ्रष्टाचार से जुड़े अपराध

एक्ट में निम्न अपराधों को शामिल किया जाना चाहिए:

·  पद की शपथ के जानबूझकर उल्लंघन द्वारा संविधान के पूरी तरह से अर्थ को पलटना;

·  ज़रूरत से अधिक किसी व्यक्ति का हित कर अधिकार का दुरुपयोग;

·  न्याय में बाधा पहुंचाना;

·  सार्वजनिक पैसे की फिजूलखर्ची।

रिश्वत

एक्ट में सरकारी कर्मचारी और निर्णय के लाभार्थी द्वारा ‘मिलीभगत से रिश्वतख़ोरी’ नामक विशेष अपराध के लिए प्रावधान होना चाहिए। इस अपराध के लिए रिश्वतख़ोरी के अन्य मामलों के बजाय दुगना दंड दिया जाना चाहिए।*

मुकदमे के लिए पूर्व अनुमति

·  रिश्वत लेते पकड़े गए सरकारी कर्मचारी पर मुकदमा चलाने, या आय से अधिक संपत्ति रखने के मामलों में पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

निजी क्षेत्र की संस्थाएं/एनजीओ

·  एक्ट में सार्वजनिक उपयोगिता सेवाएं प्रदान करने वाले निजी क्षेत्रों को शामिल किया जाना चाहिए।

·  सरकार से पर्याप्त पैसा लेने वाली एनजीओ को भी शामिल किया जाना चाहिए।

*नोट: बिल में रिश्वत देने को अपराध माना गया है जिसके लिए मिलने वाले दंड को रिश्वत लेने के अपराध के दंड के बराबर रखा गया है। हालांकि, वह ‘मिलीभगत से’ और ‘जबरन’ रिश्वत देने के बीच अंतर नहीं करता है।

स्रोत: ‘एथिक्स इन गवर्नेंस’, चौथी रिपोर्ट, दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग, 2007; भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) बिल, 2013; पीआरएस.

यूएन सम्मेलन और विभिन्न देशों के कानूनों के साथ तुलना

भ्रष्टाचार के विरुद्ध यूएन सम्मेलन

बिल के उद्देश्यों और कारणों के अनुसार, एक्ट में किए गए संशोधन भ्रष्टाचार के विरुद्ध यूएन सम्मेलन में दी गई सहमति के अनुसार किए गए हैं।[9] हालांकि, बिल में सम्मेलन के कुछ विशेष प्रावधानों को शामिल नहीं किया गया है।

तालिका 3: यूएन सम्मेलन के वे प्रावधान जिन्हें बिल में शामिल नहीं किया गया है

 

यूएन सम्मेलन

पीसीए बिल, 2013

विदेशी सरकारी अधिकारियों को रिश्वत

व्यवसाय प्राप्त करने या उसे कायम रखने के लिए विदेशी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देना अपराध माना गया है।

इस बिल में शामिल नहीं किया गया है। विदेशी सरकारी अधिकारियों और अंतर्राष्ट्रीय लोक संगठनों रिश्वतख़ोरी रोकथाम बिल, 2011 में प्रस्ताव दिया गया जो 15वी लोकसभा की समाप्ति के साथ खत्म हो गया।

निजी क्षेत्र में रिश्वतख़ोरी

निजी क्षेत्र संस्था द्वारा रिश्वत देना और लेना शामिल है।

बिल में निजी क्षेत्र संस्थाओं द्वारा रिश्वत लेने को शामिल नहीं किया गया है।

नुकसान के लिए मुआवजा

भ्रष्टाचार के कारण नुकसान उठाने वाले लोगों को नुकसान के जिम्मेदार लोगों से मुआवजा लेने का अधिकार है।

बिल में भ्रष्टाचार से पीड़ित लोगों के लिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है।

स्रोत: भ्रष्टाचार के विरुद्ध यूएन सम्मेलन, 2003; भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) बिल, 2013; पीआरएस.

विभिन्न देशों में भ्रष्टाचार विरोधी कानून                                 

विभिन्न देशों में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का निपटारा या तो उनके आपराधिक क़ानूनों के माध्यम से या राष्ट्रीय स्तर पर अलग क़ानूनों के माध्यम से किया जाता है। मोटे तौर पर, उनमें रिश्वत देने और लेने से जुड़े प्रावधान शामिल होते हैं। तालिका 4 विभिन्न क्षेत्राधिकारों में कानून की स्थिति प्रस्तुत करती है।

तालिका 4: भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों की अंतर्राष्ट्रीय तुलना

 

यूके

यूएसए

जर्मनी

कनाडा

फ्रांस

शामिल संस्थाएं

लोक सेवा से जुड़े व्यक्तियों और अन्य व्यक्तियों पर लागू होता है।

सरकारी अधिकारियों पर लागू होता है।*

 

व्यवसाय से जुड़े सरकारी अधिकारियों और अन्य व्यक्तियों पर लागू होता है।

सरकारी कर्मचारियों पर केवल लागू होता है।

सरकारी अधिकारियों और रोज़गार के दौरान अन्य व्यक्तियों पर लागू होता है।

रिश्वत देना

किसी व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्ति को रिश्वत देना शामिल।

सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देना शामिल है।

सरकारी अधिकारी को व्यवसाय से जुड़े मामलों में रिश्वत देना शामिल।

सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देना शामिल है।

सक्रिय भ्रष्टाचार’ के अपराध के तहत शामिल।

रिश्वत लेना

किसी व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्ति से रिश्वत लेना शामिल।

सरकारी अधिकारियों द्वारा रिश्वत लेना शामिल है।

सरकारी अधिकारी से व्यवसाय से जुड़े मामलों में रिश्वत लेना शामिल।

सरकारी अधिकारियों से रिश्वत लेना शामिल है।

निष्क्रिय भ्रष्टाचार’ के अपराध के तहत शामिल।

आय से अधिक संपत्ति

कोई विशेष प्रावधान नहीं।

निश्चित मूल्य से ऊपर संपत्ति या चीज़ का गबन शामिल है।

गैर-कानूनी ढंग से प्राप्त वित्तीय लाभों को छुपाना शामिल है।

कोई विशेष प्रावधान नहीं।

कोई विशेष प्रावधान नहीं।

मुकदमे के लिए पूर्व अनुमति

सभी व्यक्तियों के लिए और सभी अपराधों के लिए मुकदमा चलाने की सहमति।

कोई विशेष प्रावधान नहीं।

व्यावसायिक प्रथाओं के मामले में, मुकदमे के लिए अनुरोध किया जाए, जबतक कि अभियोग अधिकारी उसे ज़रूरी नहीं समझता।

किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई आरंभ करने के लिए अटार्नी जनरल की सहमति।

कोई विशेष प्रावधान नहीं।

नोट: * यूएस में आमतौर पर निजी व्यावसायिक रिश्वतख़ोरी का निपटारा राज्य स्तर पर किया जाता है।

स्रोत: यूके: ब्राइबरी एक्ट, 2010; यूएसए: यूएस कोड, सेक्शन 201, 666; जर्मनी: जर्मन क्रिमिनल कोड, 1988; कनाडा: क्रिमिनल कोड, 1985; फ्रांस: फ्रेंच पीनल कोड; पीआरएस.

 

Notes

[1].  This Brief has been written on the basis of the Prevention of Corruption (Amendment) Bill, 2013 which was introduced in the Rajya Sabha on August 19, 2013.  The Bill was referred to the Standing Committee on Personnel, Public Grievances, Law and Justice, which submitted its report on February 6, 2014.

[2].  The Prevention of Corruption (Amendment) Bill, 2008.

[3]  The Corrupt Public Servants (Forfeiture of Property) Bill, 166th Report, Law Commission of India, February 1999.

[4].  ‘Ethics in Governance’, Fourth Report, Second Administrative Reforms Commission, January 2007.

[5].  United Nations Convention Against Corruption, United Nations Office on Drugs and Crime, United Nations, 2004.

[6].  Prevention of Corruption (Amendment) Bill, 2013, 69th Report, Standing Committee, Rajya Sabha.

[7]Article 15, Bribery of National Public official, United Nations Convention Against Corruption.

[8].  ‘Why for a class of bribes, the act of giving a bribe should be treated as legal”, Kaushik Basu, Chief Economic Adviser, Ministry of Finance, 2011.

[9].  Statement of Objects and Reasons, Prevention of Corruption (Amendment) Bill, 2013.

 

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेज़ी में तैयार की गयी थी। हिन्दी में इसका अनुवाद किया गया है। हिन्दी रूपान्तर में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेज़ी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।