मंत्रालय: 
वित्त, कॉरपोरेट मामले और सूचना एवं प्रसारण
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    मार्च 12, 2018
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    जुलाई 19, 2018
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    जुलाई 25, 2018
    Gray

बिल और अध्यादेश की मुख्‍य विशेषताएं

  • बिल किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी (एफईओ) घोषित करने की अनुमति देता है, अगर: (i) उसके खिलाफ किसी निर्दिष्ट अपराध के संबंध में गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है और यह अपराध 100 करोड़ से अधिक की राशि वाला है, और (ii) उसने देश छोड़ दिया है और मुकदमे का सामना करने के लिए देश लौटने से इनकार कर दिया है।
     
  • किसी व्यक्ति को एफईओ घोषित करने के लिए विशेष अदालत (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 के अंतर्गत नामित) में आवेदन दायर किया जाएगा जिसमें जब्त की जाने वाली संपत्तियों का विवरण और उस व्यक्ति के ठिकानों की सूचना होगी। विशेष अदालत द्वारा यह अपेक्षा की जाएगी कि नोटिस मिलने के कम से कम छह हफ्ते के भीतर वह व्यक्ति निर्दिष्ट स्थान पर पेश हो। उस व्यक्ति के पेश होने पर विशेष अदालत द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियां खारिज कर दी जाएंगी।
     
  • बिल अथॉरिटीज़ को अनुमति देता है कि विशेष अदालत में आवेदन के लंबित रहने के दौरान वे आरोपी की संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क कर सकते हैं।
     
  • किसी व्यक्ति के एफईओ घोषित होने पर उसकी संपत्ति जब्त की जा सकती है और केंद्र सरकार के अधीन की जा सकती है लेकिन केंद्र सरकार उससे जुड़ी सभी देनदारियों (संपत्ति पर अधिकार और उससे संबंधित सभी दावों) से मुक्त होगी। इसके अतिरिक्त एफईओ या उससे संबंधित किसी भी कंपनी को सिविल दावे दायर करने या सफाई देने से प्रतिबंधित किया जा सकता है।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • बिल के अंतर्गत कोई भी अदालत या ट्रिब्यूनल एफईओ या उससे संबंधित कंपनी को सिविल दावे दायर करने या सफाई देने से रोक सकती है। ऐसे लोगों को सिविल दावे दायर करने या सफाई देने से रोकने से संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। अनुच्छेद 21 की व्याख्या में न्याय हासिल करने का अधिकार भी शामिल है।
     
  • बिल के अंतर्गत एफईओ की संपत्ति को जब्त और केंद्र सरकार के अधीन किया जा सकता है। बिल विशेष अदालत को ऐसी संपत्ति को छूट देने की अनुमति देता है जिनमें कुछ विशिष्ट व्यक्तियों का हित है (जैसे सिक्योर्ड क्रेडिटर्स)। हालांकि बिल यह स्पष्ट नहीं करता कि क्या केंद्र सरकार बिक्री से होने वाली आय में दूसरे दावेदारों, जिनका ऐसा कोई हित न हो (जैसे अनसिक्योर्ड क्रेडिटर्स), को हिस्सा देगी।
     
  • बिल में यह अपेक्षित नहीं है कि तलाशी से पहले अधिकारियों को सर्च वारंट लेना होगा या गवाहों की मौजूदगी सुनिश्चित करनी होगी। यह दूसरे कानूनों, जैसे दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 से अलग है जिसमें ऐसे सुरक्षात्मक उपाय किए गए हैं। ऐसे उपाय उत्पीड़न और झूठे सबूतों के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं।
     
  • बिल में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति के एफईओ घोषित होने पर उसकी संपत्ति को जब्त किया जाएगा। यह दूसरे कानूनों जैसे सीआरपीसी, 1973 से अलग है जिसमें किसी व्यक्ति के भगोड़ा घोषित होने के दो वर्ष बाद उसकी संपत्ति जब्त होती है।

भाग क : बिल और अध्यादेश की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

आर्थिक अपराधों में फ्रॉड, नकली नोट बनाना, मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स की चोरी इत्यादि शामिल हैं। वर्तमान में विभिन्न कानूनों के अंतर्गत ऐसे अपराधों के लिए दंड का प्रावधान है। इन कानूनों में निम्नलिखित शामिल हैं : (i) प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002 जो मनी लॉन्ड्रिंग को प्रतिबंधित करता है, (ii) बेनामी संपत्ति लेनदेन एक्ट, 1988 जो बेनामी लेनदेन को प्रतिबंधित करता है, और (iii) कंपनीज़ एक्ट, 2013 जो फ्रॉड और गैर कानूनी डिपॉजिट्स के लिए दंड देता है। दूसरे कानून जैसे भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) के दायरे में भी आर्थिक अपराध, जैसे जालसाजी और धोखाधड़ी, आते हैं।

2017 में वित्त मंत्रालय ने एक ड्राफ्ट बिल जारी किया था। यह ड्राफ्ट बिल उन हाई वैल्यू वाले आर्थिक अपराधियों के मामलों को संबोधित करता था जो मुकदमे से बचने के लिए देश छोड़कर भाग जाते हैं।[1]  तब यह कहा गया था कि एक नए कानूनी ढांचे की जरूरत है क्योंकि मौजूदा सिविल और क्रिमिनल कानूनों में ऐसे अपराधियों से निपटने से संबंधित प्रावधान नहीं हैं।[2]  इसके अतिरिक्त मंत्रालय ने कहा था कि इन कानूनों के अंतर्गत कार्यवाहियों में समय लगता है जिससे जांच में रुकावट होती है और बैंकों की वित्तीय सेहत प्रभावित होती है।2 

मार्च 2018 में विदेशी मामलों के मंत्रालय ने कहा था कि भारतीय अदालतों के मुकदमों से बचने के लिए 30 से अधिक व्यवसायी जिनकी जांच सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय कर रहे हैं, देश से फरार हो चुके हैं।[3]  भगोड़ा आर्थिक अपराधी बिल, 2018 लोकसभा में 12 मार्च, 2018 को पेश किया गया।[4]  इसके बाद ऐसे ही प्रावधानों के साथ एक अध्यादेश 21 अप्रैल, 2018 को जारी किया गया।[5]

प्रमुख विशेषताएं

  • भगोड़ा आर्थिक अपराधी (एफईओ): एफईओ एक ऐसा व्यक्ति है जिसके खिलाफ अनुसूची में दर्ज किसी अपराध के संबंध में गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है और इस अपराध का मूल्य कम से कम 100 करोड़ रुपए है। इसके अतिरिक्त उस व्यक्ति ने मुकदमे से बचने के लिए देश छोड़ दिया है और मुकदमे का सामना करने के लिए देश लौटने से इनकार कर दिया है। बिल अनुसूची में 55 आर्थिक अपराधों को सूचीबद्ध करता है जिनमें निम्न शामिल हैं : (i) नकली सरकारी स्टाम्प या करंसी बनाना, (ii) पर्याप्त धन न होने पर चेक का भुनाया न जाना, (iii) बेनामी लेनदेन, (iv) क्रेडिटर्स के साथ धोखाधड़ी वाले लेनदेन करना, (v) टैक्स की चोरी, और (vi) मनी लॉन्ड्रिंग। अध्यादेश केंद्र सरकार को अधिसूचना के जरिए इस अनुसूची में संशोधन की अनुमति देता है।
     
  • अथॉरिटीज़: पीएमएलए, 2002 के अंतर्गत गठित अथॉरिटीज़ बिल द्वारा दी गई शक्तियों का उपयोग करेंगी। ये शक्तियां सिविल अदालतों के समान होंगी, जिनमें निम्नलिखित शामिल है: (i) ऐसे व्यक्ति की तलाशी लेना, जिसके पास अपराध के रिकॉर्ड्स या आय हो, (ii) यह मानकर किसी स्थान की तलाशी लेना कि व्यक्ति एफईओ है, और (ii) दस्तावेजों को जब्त करना।

तालिका 1: बिल और अध्यादेश के अंतर्गत किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी (एफईओ) घोषित करने की प्रक्रिया

प्रक्रिया

विवरण

आवेदन

·    पीएमएलए के अंतर्गत नियुक्त अधिकारी किसी को एफईओ घोषित करने के लिए विशेष अदालत (पीएमएलए द्वारा नामित) में आवेदन कर सकते हैं। इसमें निम्न शामिल होगा: (i) उसे एफईओ मानने के कारण, (ii) उसके ठिकाने की सूचना, (iii) बेनामी संपत्तियों, अपराध की आय मानी जाने वाली संपत्तियों और विदेशी संपत्तियों की सूची जिन्हें जब्त किया जा रहा है, और (iv) उन लोगों की सूची जिनके हित इन संपत्तियों से जुड़े हैं।

कुर्की

·    अधिकारी विशेष अदालत की अनुमति से आवेदन में उल्लिखित किसी संपत्ति को कुर्क कर सकते हैं। यह कुर्की 180 दिनों तक जारी रहेगी, विशेष अदालत इस अवधि को बढ़ा सकती है। अगर ये अधिकारी 30 दिनों के भीतर अदालत में आवेदन दायर कर दें तो विशेष अदालत की अनुमति से पहले ही किसी संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क कर सकते हैं। 

नोटिस

·    आवेदन मिलने के बाद विशेष अदालत एफईओ को नोटिस जारी करेगी, (i) जिसमें नोटिस जारी होने के छह हफ्ते के भीतर उससे निर्दिष्ट स्थान पर पेश होने की अपेक्षा की जाएगी, और (ii) यह कहा जाएगा कि उस स्थान पर पेश न होने पर उसे भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर दिया जाएगा। उस व्यक्ति को पैन या आधार डेटाबेस में रिकॉर्ड ईमेल एड्रेस पर नोटिस भेजा जाएगा।

कार्यवाहियां

·    अगर वह व्यक्ति निर्दिष्ट स्थान पर पेश हो जाता है तो विशेष अदालत द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियां खारिज कर दी जाएंगी। अगर वह व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं होता, बल्कि अपना वकील भेजता है तो विशेष अदालत वकील को एक हफ्ते के भीतर जवाब देने की अनुमति देगी। अगर कार्यवाही के अंत में उस व्यक्ति को एफईओ नहीं पाया जाता तो उसकी कुर्क की गई संपत्ति को मुक्त कर दिया जाएगा।

घोषणा

·    निर्धारित अवधि में व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से उपस्थित न होने पर विशेष अदालत आवेदन की सुनवाई के साथ कार्यवाही शुरू करेगी। आवेदन पर सुनवाई के बाद अदालत व्यक्ति को एफईओ घोषित कर सकती है।

जब्ती

·    विशेष अदालत एफईओ की अपराध की आय से खरीदी गई संपत्तियों, बेनामी संपत्तियों और अन्य संपत्तियों को जब्त कर सकती है। ये संपत्तियां भारत या विदेश में हो सकती हैं। ऐसी संपत्तियों जिनमें किसी अन्य व्यक्ति का वैध हित हो, उन्हें विशेष अदालत जब्त करने से छोड़ सकती हैं। जब्ती के बाद संपत्ति के सभी अधिकार और टाइटिल केंद्र सरकार में निहित होंगे लेकिन केंद्र सरकार संपत्ति से जुड़ी सभी देनदारियों से मुक्त होगी (जैसे संपत्ति पर कोई शुल्क)। केंद्र सरकार ऐसी संपत्तियों का निस्तारण 90 दिनों में कर सकती है।

·    अपराध की आय में वे संपत्तियां (या उसके बराबर की कीमत) शामिल हैं जिन्हें अनुसूचित अपराध करने के बाद हासिल किया गया है। अधिसंभाव्यता की प्रबलता (प्रिपॉन्डरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटीज) प्रमाण का मानक (स्टैंडर्ड ऑफ प्रूफ) होगा।

सिविल दावों पर प्रतिबंध

·    कोई भी अदालत या ट्रिब्यूनल एफईओ को सिविल दावा करने या सफाई देने से रोक सकती है। इसके अतिरिक्त बिल अदालतों को अनुमति देता है कि वे किसी ऐसी कंपनी को दावा करने या सफाई देने से प्रतिबंधित कर सकती हैं जिनके प्रमोटर, मुख्य प्रबंधन अधिकारी (जैसे मैनेजर या सीईओ) या मुख्य शेयरहोल्डर को एफईओ घोषित किया गया है।  

अपील

·    विशेष अदालत के आदेशों के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। ऐसी अपील आदेश जारी होने के 30 दिनों के भीतर दायर की जा सकती हैं (अगर उच्च न्यायालय विलंब के कारणों से संतुष्ट हो जाता है तो इसे 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है)।

Sources: The Fugitive Economic Offenders Bill, 2018; PRS.

भाग ख:  प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

लोगों को सिविल दावे करने या सफाई देने से रोकने से अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो सकता है

क्लॉज 14 के अंतर्गत अदालत या ट्रिब्यूनल किसी एफईओ को अपने सामने सिविल दावा करने या सफाई देने से प्रतिबंधित कर सकता है। इसके अतिरिक्त बिल अदालतों को अनुमति देता है कि वे किसी ऐसी कंपनी को दावा करने या सफाई देने से प्रतिबंधित कर सकती हैं जिनके प्रमोटर, मुख्य प्रबंधन अधिकारी (जैसे मैनेजर या सीईओ) या मुख्य शेयरहोल्डर को एफईओ घोषित किया गया है। कहा जा सकता है कि यह प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन कर सकता है। अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी भी व्यक्ति (या कंपनी) को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, सिवाय कानून के द्वारा।[6] अदालतों ने इसकी व्याख्या में न्याय हासिल करने के अधिकार को शामिल किया है जिसे वापस नहीं लिया जा सकता।[7]  इस अधिकार में ऐसे मंच की उपलब्धता शामिल है जिसके जरिए पीड़ित कानूनी सलाह की मांग कर सकता है। प्रश्न यह है कि क्या सिविल दावे करने या सफाई देने से रोकना इस अधिकार का उल्लंघन होगा। 

जैसे एफईओ घोषित व्यक्ति विवाह संबंधी मुकदमे या उत्तराधिकार संबंधी विवाद में फंसा हो सकता है। क्लॉज 14 के अंतर्गत अदालतों को अनुमति दी गई है कि वे किसी व्यक्ति को ऐसे दावे करने या अपनी सफाई देने के अधिकार से प्रतिबंधित कर सकती हैं। 

इसके अतिरिक्त ऐसे मामले भी हो सकते हैं जिनमें एफईओ कंपनी का सबसे बड़ा शेयरहोल्डर हो। ऐसे मामलों में हालांकि कंपनी एक अलग लीगल एंटिटी है, उसे मामला दायर करने या अपनी सफाई देने से रोका जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी कंपनी को गुड्स के सप्यालर के खिलाफ मुकदमा दायर करने से रोका जा सकता है या उस मामले में अपना बचाव करने से रोका जा सकता है जिसमें उस पर बकाया टैक्स लगाया गया हो। ऐसे मामले भी हो सकते हैं जिसमें क्रेडिटर्स ने लोन रीपेमेंट के लिए किसी कंपनी के खिलाफ अदालती आदेश हासिल किए हों और कंपनी को अपना बचाव करने के लिए मौका न मिले। ऐसे सभी मामलों में कंपनियों पर प्रतिबंध के कारण बचे हुए शेयरहोल्डरों के हितों की रक्षा नहीं होगी।    

जब्त की गई संपत्ति को बेचने से होने वाली आय का उपयोग स्पष्ट नहीं है

बिल स्पष्ट करता है कि एफईओ की संपत्ति को जब्त और केंद्र सरकार के अधीन किया जा सकता है लेकिन केंद्र सरकार उससे जुड़ी सभी देनदारियों (संपत्ति पर अधिकार और उससे संबंधित सभी दावों) से मुक्त होगी। केंद्र सरकार 90 दिन के बाद इन संपत्तियों का निपटारा कर सकती है। बिल स्पष्ट नहीं करता कि केंद्र सरकार इनकी बिक्री से होने वाली आय का उपयोग कैसे करेगी। यानी क्या सरकार बिक्री से होने वाली आय को उन व्यक्तियों से बांटने के लिए बाध्य है जिनका एफईओ के खिलाफ कोई दावा हो सकता है। 

बिल के अंतर्गत अगर कोई व्यक्ति इन संपत्तियों पर अपना वैध हित प्रदर्शित करता है तो विशेष अदालत उन्हें जब्त नहीं करेगी। उदाहरण के लिए इन व्यक्तियों में वे सिक्योर्ड क्रेडिटर्स शामिल हो सकते हैं जिनका एफईओ की विशेष संपत्तियों पर दावा हो। बिल में यह नहीं कहा गया है कि दूसरे दावेदारों (जैसे अनसिक्योर्ड क्रेडिटर्स या बकाया वेतन का दावा करने वाले व्यक्तियों) के बकाये को निपटाने के लिए इन संपत्तियों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके विपरीत इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 में स्पष्ट किया गया है कि डीफॉल्टर की संपत्ति की बिक्री से होने वाली आय को प्राथमिकता के क्रम में सभी दावेदारों के बीच बांटा जाएगा।[8] 

तलाशी से जुड़े प्रावधानों में सुरक्षात्मक उपाय नहीं किए गए

बिल के अंतर्गत अधिकारी यह मानकर किसी व्यक्ति की तलाशी ले सकते हैं कि वह एफईओ है। इसके अतिरिक्त अपराध की आय मानकर किसी स्थान की तलाशी भी ली सकती है। बिल सर्च वारंट या गवाहों के बिना तलाशी लेने की अनुमति देता है। यह दूसरे कानूनों जैसे दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 से अलग है जिसमें विशिष्ट सुरक्षात्मक उपाय किए गए हैं।

सीआरपीसी के सेक्शन 94 के अंतर्गत मेजिस्ट्रेट के वारंट के बाद तलाशी ली जाती है। इसके अतिरिक्त सेक्शन 100 कहता है कि अधिकारियों द्वारा किसी स्थान की तलाशी के दौरान दो या दो से अधिक गवाह मौजूद होने चाहिए। दूसरे कानून जैसे प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 और एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया एक्ट, 1992 भी तलाशी के मामले में सीआरपीसी, 1973 में निर्दिष्ट प्रक्रियाऔं का पालन करते हैं। ऐसे उपाय लोगों को उत्पीड़न से बचाते हैं और उन मामलों में सुरक्षा प्रदान करते हैं जहां आरोपी के खिलाफ झूठे सबूत तैयार किए जा सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि भगोड़ा आर्थिक अपराधी अध्यादेश, 2018 के अंतर्गत नियम अधिसूचित किए गए हैं। इनमें स्पष्ट किया गया है कि सीआरपीसी, 1973 की प्रक्रियाएं तलाशी के मामले में लागू होंगी।[9]  यह कहा जा सकता है कि तलाशी से संबंधित प्रक्रियागत उपायों को कानून में निर्दिष्ट किया जाना चाहिए, न कि उन्हें सरकार द्वारा डेलिगेटेड लेजिसलेशन के जरिए अधिसूचित होना चाहिए। 

बिल के अंतर्गत प्रक्रियाएं मौजूदा कानूनों के समान

बिल में प्रावधान है कि अगर किसी व्यक्ति को एफईओ घोषित किया जाता है तो उसकी संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क किया जाएगा और फिर जब्त कर लिया जाएगा। यह प्रावधान सीआरपीसी, 1973 के समान है जिसमें भगोड़ों की संपत्तियो को कुर्क और जब्त करने की अनुमति दी गई है। सीआरपीसी, 1973 के अंतर्गत, अगर भगोड़ा व्यक्ति दो वर्षों में वापस आ जाता है तो कुर्क की गई संपत्ति उसे लौटाई जा सकती है। इसका यह अर्थ भी है कि संपत्ति कुर्क होने के दो वर्षों के बाद जब्त की जाएगी। इसके विपरीत बिल के अंतर्गत अगर विशेष अदालत किसी व्यक्ति को एफईओ घोषित करती है तो उसकी संपत्ति तत्काल जब्त कर ली जाएगी।  

बिल के अंतर्गत अधिकतर प्रक्रियाएं मौजूदा कानूनों, जैसे सीआरपीसी, 1973 और प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग (पीएमएलए), 2002 के समान ही हैं (देखें तालिका 2)। 

तालिका 2: बिल और मौजूदा कानूनों के बीच तुलना

प्रावधान

भगोड़ा आर्थिक अपराधी बिल, 2018

मौजूदा कानून

भगोड़ा

·    अगर कोई व्यक्ति देश छोड़कर फरार हो जाता है और मुकदमे से बचने के लिए लौटने से इनकार करता है तो उसे भगोड़ा घोषित किया जा सकता है। नोटिस जारी होने के कम से कम छह हफ्तों के भीतर उसे निर्दिष्ट स्थान पर पेश होने को कहा जा सकता है।

·    सीआरपीसी: सेक्शन 82 के अनुसार, अदालत अपील जारी सकती है जिसके अंतर्गत वारंट से बचने वाले व्यक्ति को नोटिस जारी होने के कम से कम 30 दिनों के भीतर एक निर्दिष्ट समय और स्थान पर पेश होना पड़ेगा। 

 

कुर्की

·   किसी व्यक्ति की संपत्ति 180 दिनों के लिए कुर्क की जा सकती है। इनमें अपराध की आय मानी जाने वाली और बेनामी संपत्तियां शामिल हैं।

·   सीआरपीसी: सेक्शन 83 में भगोड़ों की संपत्तियों की कुर्की का प्रावधान है।

·   पीएमएलए:  सेक्शन 8 में ऐसी संपत्तियों की कुर्की की जाती है जो अपराध की आय हैं।

जब्ती या रिकवरी

·   किसी एफईओ की संपत्ति जब्त और केंद्र सरकार के अधीन की जा सकती है जो सभी देनदारियों से मुक्त होगी। केंद्र सरकार 90 दिन बाद उस संपत्ति का निपटारा कर सकती है।

·   विशेष अदालत ऐसी संपत्तियों को जब्त नहीं करेगी, जिसमें दूसरे व्यक्तियों का वास्तविक हित होगा।

·   सीआरपीसी:  सेक्शन 85 के अनुसार कुर्क की गई संपत्ति को राज्य सरकार छह महीने बाद बेच सकती है। अगर भगोड़ा व्यक्ति दो वर्षों के भीतर लौट आता है तो सरकार को संपत्ति या उसकी आय को उस व्यक्ति को लौटाना होगा।

·   पीएमएलए:  सेक्शन 8 में कहा गया है कि दोषी साबित होने पर किसी व्यक्ति की संपत्ति को जब्त किया जा सकता है या संपत्ति तब जब्त हो सकती है जब मुकदमे पर कोई फैसला नहीं लिया जा सकता। यह संपत्ति केंद्र सरकार के  अधीन और सभी देनदारियों से मुक्त होगी।

·   सरफेसी:  सरफेसी के अंतर्गत क्रेडिटर्स अदालती दखल के बिना कोलेट्रल को कब्जे में ले सकते हैं।

तलाशी और कब्जा

·   अधिकारी यह मानकर किसी व्यक्ति की तलाशी ले सकते हैं कि वह एफईओ है। इसके अतिरिक्त अपराध की आय मानकर किसी स्थान की तलाशी भी ली सकती है। वे दस्तावेजों को अपने कब्जे में भी कर सकते हैं।

·   तलाशी के दौरान अगर व्यक्ति की मांग हो, तो अधिकारी उसे गैजेटेड ऑफिसर या मेजिस्ट्रेट के पास 24 घंटे के भीतर ले जा सकते हैं।

·    सीआरपीसी: सेक्शन 100 के अंतर्गत अधिकारी तलाशी ले सकते हैं। उन्हें तलाशी के वारंट के साथ दो गवाहों की मौजूदगी में तलाशी लेनी होगी।

·    सीआरपीसी के अंतर्गत तलाशी से संबंधित प्रावधान अन्य कानूनों में लागू होते हैं जैसे: (i) पीएमएलए, (ii) सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया एक्ट, 1992, (iii) सेंट्रल एक्साइज एक्ट, 1944, (iv) कंपनीज़ एक्ट, 2013, और (v) केंद्रीय वस्तु और सेवा कर (सीजीएसटी) एक्ट, 2017।

·   पीएमएलए:  तलाशी के दौरान अगर व्यक्ति की मांग हो, तो अधिकारी उसे गैजेटेड ऑफिसर या मेजिस्ट्रेट के पास 24 घंटे के भीतर ले जा सकते हैं।

कॉन्ट्रैक्टिंग देश

·   विशेष अदालत कॉन्ट्रैक्टिंग देशों (ऐसे देश जिनके साथ कानून के प्रावधानों को लागू करने से संबंधित संधि पर हस्ताक्षर किए गए हैं) की अदालत या अथॉरिटी से अनुरोध कर सकती है कि वे जब्ती के आदेश का पालन करें। 

·    सीआरपीसी: अध्याय VII ए के अंतर्गत अदालतें कॉन्ट्रैटिंग देशों से उनके आदेशों का पालन करने का अनुरोध कर सकती हैं (जिन देशों से केंद्र ने संधि की है)।

·    पीएमएलए: अध्याय IX के प्रावधान सीआरपीसी के समान हैं।

·   प्रत्यर्पण (एक्सट्रिडिशन) एक्ट, 1962: अध्याय IV विदेश से किसी अपराधी (आरोपी या दोषी) को वापस लाने की अनुमति देता है।

Sources: The Fugitive Economic Offenders Bill, 2018; The Extradition Act, 1962; CrPC – The Code of Criminal Procedure, 1973; PMLA – The Prevention of Money-Laundering Act, 2002; SARFAESI – The Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002; PRS.

 

[1]Draft Fugitive Economic Offenders Bill, 2017, https://dea.gov.in/sites/default/files/Draft%20Fugitive%20Economic%20Offenders%20Bill%2C%202017-22.3.2017.pdf. 

[2]Explanatory Note on the Fugitive Economic Offenders Bill, 2017, Ministry of Finance, May 2017, https://dea.gov.in/sites/default/files/Final_Explanatory_Note%20on%20the%20Draft%20Bill.pdf. 

[3]Unstarred Question No. 3198, Lok Sabha, Ministry of External Affairs, Answered on March 14, 2018.

[4]The Fugitive Economic Offenders Bill, 2018, Ministry of Finance, http://www.prsindia.org/uploads/media/Fugitive%20Economic%20Offenders/Fugitive%20Economic%20Offenders%20Bill,%202018.pdf.

[5]The Fugitive Economic Offenders Ordinance, 2018, Ministry of Finance, http://www.prsindia.org/uploads/media/Ordinances/The%20Fugitive%20Economic%20Offenders%20Ordinance%202018.pdf.

[6]The State Trading Corporation of India Ltd. and Ors. vs. The Commercial Tax Officer, Vishakhapatnam, AIR 1963 SC 1811.

[7]Anita Kushwaha vs. Pushap Sudan, (2016) 8 SCC 509.

[8].  Section 178, The Insolvency and Bankruptcy Code, 2016.

[9]. G. S. R. 393 (E) to 397 (E), Gazette of India, Ministry of Finance, April 24, 2018.

 

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