मंत्रालय: 
विधि एवं न्याय
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    मई 04, 2017
    Gray

अध्यादेश की मुख्‍य विशेषताएं

  • बकाया लोन्स की रिकवरी के लिए कुछ प्रावधानों को सम्मिलित करने हेतु यह अध्यादेश बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में संशोधन करता है। इन प्रावधानों के तहत केंद्र सरकार भारतीय रिजर्व बैंक को इस बात के लिए अधिकृत कर सकती है कि वह लोन डीफॉल्टरों के खिलाफ बैंकों को कार्रवाई शुरू करने के संबंध में निर्देश जारी करे।   
     
  • रिकवरी की यह कार्रवाई इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत की जाएगी। यह संहिता निम्नलिखित के जरिए डीफॉल्ट से निपटने के लिए समयबद्ध प्रक्रिया का प्रावधान करती है: (i) लोन की रीस्ट्रक्चरिंग (जैसे रीपेमेंट के शेड्यूल में बदलाव करना), या (ii) डीफॉल्टर के एसेट्स को लिक्विडेट करना (यानी बेचना)।
     
  • आरबीआई स्ट्रेस्ड एसेट्स से निपटने के लिए समय-समय पर बैंकों को निर्देश जारी कर सकता है। स्ट्रेस्ड एसेट्स ऐसे लोन्स होते हैं जिनमें उधारकर्ता ने रीपेमेंट नहीं किया है (डीफॉल्ट किया है), या जिन लोन्स को रीस्ट्रक्चर किया गया है।  
     
  • आरबीआई अथॉरिटीज या कमिटियों को विनिर्दिष्ट कर सकता है कि वे स्ट्रेस्ड एसेट्स से निपटने के लिए बैंकों को सलाह दें। इन कमिटियों के सदस्यों की नियुक्ति या मंजूरी आरबीआई द्वारा की जाएगी।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • वर्तमान में, आरबीआई सार्वजनिक हित (पब्लिक इंटरेस्ट) या बैंकिंग नीति के हित (इन द इंटरेस्ट ऑफ बैंकिंग पॉलिसी) जैसी स्थितियों में बैंकों को निर्देश जारी कर सकता है। अध्यादेश आरबीआई को अतिरिक्त शक्ति प्रदान करता है कि वह बैंकों को इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत रिकवरी संबंधी कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दे सकता है। प्रश्न यह है कि क्या आरबीआई की मौजूदा शक्तियां पर्याप्त हैं और अध्यादेश अनावश्यक है।
     
  • अधिकतर एनपीएज (88%) सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में हैं जिनमें केंद्र सरकार मुख्य शेयरहोल्डर है। यह कहा जा सकता है कि सरकार आरबीआई को बैंकों को निर्देश देने के लिए अधिकृत किए बिना ही डीफॉल्टरों के खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई शुरू कर सकती है।
     
  • बैंकिंग रेगुलेटर के रूप में आरबीआई वित्तीय स्थिरता बरकरार रखने के लिए जिम्मेदार है, जबकि बैंक अपने व्यापारिक फैसले करने के लिए स्वतंत्र हैं। डीफॉल्ट पर बैंकों को निर्देश देने के औचित्य- जोकि एक व्यापारिक फैसला है- की जांच किए जाने की जरूरत है।
     
  • वर्तमान में, बैंकों को रिकवरी की कार्रवाई के दौरान कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे (i)  सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकरों में नुकसान की पहचान करने के लिए प्रोत्साहनों की कमी, (ii) कम रिकवरी होने पर जांच का भय, और (iii) नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त पूंजी न होना। संभव है, अध्यादेश इनमें से कुछ को हल नहीं कर पाए।

भाग क : अध्यादेश की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

रेखाचित्र 1: एपीए और उनकी रिकवरी

नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीएज़) बैंकों द्वारा दिए गए लोन्स हैं जिनमें उधारकर्ता ने रीपेमेंट में डीफॉल्ट किया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के अनुसार, डीफॉल्ट के 90 दिन बाद लोन्स को एनपीएज़ में वर्गीकृत किया जाता है।[1] पिछले दशक में, बैंकों द्वारा दिए गए कुल लोन्स में एनपीएज़ का अनुपात 2008 में 2.3% से बढ़कर 2016 में 7.5% हो गया है (6.11 लाख करोड़ रुपए या जीडीपी का 4.5%)।[2]  इस स्तर पर, देश के एनपीएज़ दूसरे उभरते हुए बाजारों से अधिक हैं।[3]  एनपीएज़ में वृद्धि से बैंकों की उधार देने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसका असर ऋण उपलब्धता, निवेश और आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ता है।[4]

बकाया राशि को रीकवर करने के लिए बैंक लोन्स को रीस्ट्रक्चर कर सकते हैं (जैसे पेमेंट के शेड्यूल में बदलाव), या आरबीआई की योजनाओं के तहत कार्रवाई शुरू करने का विकल्प चुन सकते हैं। इन योजनाओं में विभिन्न विकल्पों की अनुमति है, जिनमें निम्नलिखित शामिल है: (i) ऋण को इक्विटी में बदलना, (ii) कंपनी के मैनेजमेंट को टेकओवर करना, और (iii) रिकवरी योजना पर बैंकों द्वारा सामूहिक फैसला करना। ऐसे मामले भी हो सकते हैं, जहां रीस्ट्रक्चरिंग के बावजूद डीफॉल्टर ने लोन नहीं चुकाया।

इसके अतिरिक्त बैंक (i) डेट रिकवरी ट्रिब्यूनलों में एप्रोच करके, (ii) कोलेट्रल पर कब्जा करके (सरफेसी एक्ट), या (iii) इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत कार्रवाई करके, कानूनी प्रक्रिया अपना सकते हैं। अगर बैंक लोन के एक हिस्से को रिकवर नहीं कर पाते, तो रिकवर न की गई राशि को नुकसान बता दिया जाता है। रेखाचित्र 1 लोन्स के एनपीएज़ में बदलने की प्रक्रिया और रिकवरी के विकल्पों को प्रदर्शित करता है।

4 मई, 2017 को बैंकिंग रेगुलेशन (संशोधन) अध्यादेश, 2017 जारी किया गया। इसके तहत केंद्र सरकार आरबीआई को इस बात के लिए अधिकृत कर सकती है कि वह बैंकों को लोन डीफॉल्टरों के खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दे सकती है।[5]  यह कार्रवाई इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत की जाएगी।[6] अध्यादेश के बाद वित्त मंत्रालय ने आरबीआई को इस बात के लिए अधिकृत किया है कि वह उन बैंकों को, जो उसे जरूरी लगें, इनसॉल्वेंसी की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश जारी कर सकती है।[7] आरबीआई ने इन शक्तियों का उपयोग करते हुए 12 डीफॉल्टरों की पहचान की, जिनमें से प्रत्येक पर 5,000 करोड़ रुपए की राशि बकाया हैं।[8] इसके बाद इनमें से एक कपंनी ने आरबीआई के निर्देशों को चुनौती दी है।[9]

प्रमुख विशेषताएं

इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत रिकवरी की प्रक्रिया

·   डीफॉल्टरों के एसेट्स को प्रबंधित करने के लिए विशेष इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स की नियुक्ति जो क्रेडिटर्स (लेनदारों) की एक कमिटी का गठन करेगा।

·   क्रेडिटर्स की कमिटी निम्नलिखित का फैसला करेगी: (i)  डीफॉल्टर के लोन को रीस्ट्रक्चर करने की रेसोल्यूशन योजना बनाई जाए, या (ii) बकाया राशि को रीकवर करने के लिए उसके एसेट्स को लिक्विडेट किया (बेचा) जाए।

·   अगर 180 दिनों तक कोई फैसला नहीं किया जाता (इस अवधि को 90 दिनों तक और बढ़ाया जा सकता है) तो डीफॉल्टर के एसेट्स को बेच दिया जाएगा।   

·   बिक्री से होने वाली आय का वितरण प्राथमिकता के आधार पर किया जाएग। सुरक्षित लेनदारों और कर्मचारियों को दूसरों के मुकाबले प्राथमिकता मिलेगी।

बैंकिंग रेगुलेशन (संशोधन) अध्यादेश, 2017 बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में संशोधन करता है।[10]  1949 का एक्ट बैंकों के कामकाज को रेगुलेट करता है और बैंकों की लाइसेंसिंग, प्रबंधन और कामकाज जैसे पहलुओं का विवरण प्रदान करता है। अध्यादेश की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • इनसॉल्वेंसी की कार्रवाई: अगर लोन के रीपेमेंट में डीफॉल्ट होता है तो केंद्र सरकार आरबीआई को अधिकृत कर सकती है कि वह बैंकों को कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दे। यह कार्रवाई इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत की जाएगी
     
  • स्ट्रेस्ड एसेट्स पर बैंकों को निर्देश जारी करना: आरबीआई बैंकों को निर्देश दे सकती है कि वे स्ट्रेस्ड एसेट्स का निपटान करें (स्ट्रेस्ड एसेट्स में एनपीएज़, और ऐसे लोन्स शामिल हैं, जिन्हें रीस्ट्रक्चर किया गया है)। इसके अतिरिक्त आरबीआई  अथॉरिटीज या कमिटियों को विनिर्दिष्ट कर सकता है कि वे स्ट्रेस्ड एसेट्स से निपटने के लिए बैंकों को सलाह दें। इन कमिटियों के सदस्यों की नियुक्ति या मंजूरी आरबीआई द्वारा की जाएगी।

भाग ख:  प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

अध्यादेश की क्या जरूरत है, वह स्पष्ट नहीं

अध्यादेश केंद्र सरकार को आरबीआई को यह अधिकृत करने की अनुमति देता है कि वह बैंकों को लोन डीफॉल्टरों के खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दे सकती है। यह कार्रवाई इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत की जाएगी। इस संदर्भ में हम अध्यादेश के उद्देश्य और इस बात पर चर्चा करेंगे कि क्या मौजूदा तंत्र के जरिए इन उद्देश्यों को हासिल किया जा सकता था। 

अध्यादेश के तहत आरबीआई को प्राप्त शक्तियां 1949 के एक्ट में मौजूद शक्तियों के समान ही

अध्यादेश बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में एक प्रावधान सम्मिलित करता है, जोकि आरबीआई को इस बात की अनुमति देता है कि वह बैंकों को डीफॉल्टरों के खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दे सकता है। प्रश्न यह है कि क्या एक्ट के तहत आरबीआई को प्राप्त मौजूदा शक्तियां उसे ऐसे निर्देश जारी करने का अधिकार देती हैं।

उपरिलिखित प्रावधान 1949 एक्ट की धारा 35 ए के अतिरिक्त है। इस धारा के तहत आरबीआई को बैंकों को विभिन्न परिस्थितियों में बाध्यकारी निर्देश जारी करने की अनुमति दी गई है। ऐसे निर्देश ‘सार्वजनिक हित’ में या उन स्थितियों में दिए जा सकते हैं, जब बैंकों का संचालन उनके हित न किया जा रहा हो।10कहा जा सकता है कि एनपीएज़ अधिक होने से देश की ऋण उपलब्धता और व्यापक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है।4  क्या यह स्थिति ‘सार्वजनिक हित’ के अंतर्गत आती है और क्या ऐसी स्थिति में धारा 35 ए के तहत आरबीआई बैंकों को यह निर्देश दे सकता है कि वे इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत रिकवरी की कार्रवाई शुरू करें।[11]

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बड़ा शेयरहोल्डर होने के नाते केंद्र कार्रवाई शुरू करने का फैसला कर सकता है

रेखाचित्र 2: कुल लोन्स के % के रूप में सकल एपीएज़

 

NoteFigures for public and private sector banks is a % of loans advanced by them, respectively.

Sources: RBI; PRS.

अध्यादेश केंद्र को अधिकार प्रदान करता है कि वह आरबीआई को बैंकों को लोन डीफॉल्टरों के खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दे सकता है। आरबीआई के अनुसार, देश के एनपीएज़ में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा दिए गए लोन्स की हिस्सेदारी 88% है।2  इसका अर्थ यह है कि अधिकतर एनपीएज़ उन बैंकों में है जहां सरकार प्रमुख शेयरहोल्डर है। इसलिए सरकार के पास सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को यह कहने का अधिकार है कि वह आरबीआई की विभिन्न योजनाओं और इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 जैसे कानूनों के तहत एनपीएज़ की रिकवरी की कार्रवाई शुरू करे। (विवरण के लिए परिशिष्ट देखें)। यह कहा जा सकता है कि अध्यादेश के तहत आरबीआई को अधिकृत किए बिना ही सरकार के पास 88% एनपीएज़ की रिकवरी शुरू करने का अधिकार है।

रेगुलेटर के रूप में आरबीआई द्वारा रिकवरी के निर्देश जारी करने का औचित्य

अध्यादेश आरबीआई को बैंकों को निर्देश जारी करने की अनुमति देता है ताकि लोन डीफॉल्टरों के खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई शुरू की जा सके। प्रश्न यह है कि क्या बैंक रेगुलेटर के रूप में आरबीआई के लिए यह औचित्यपूर्ण है कि वह बैंकों को व्यापारिक फैसलों, जैसे लोन रिकवरी के संबंध में निर्देश दे।

यह कहा जा सकता है कि बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता को सुनिश्चित करना और वित्तीय प्रणाली को जोखिमों से बचाना बैंकिंग रेगुलेटर की जिम्मेदारी है। [12]  इसलिए उसकी भूमिका व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने तक ही सीमित होनी चाहिए जिसका पालन सभी बैंकों द्वारा किया जाए। [13]  बैंकों को व्यापारिक फैसले, जैसे लोन देने के मानदंड, उधारकर्ता की रिस्क प्रोफाइल, ऋण की दरें, और लोन डीफॉल्ट की स्थिति में रिकवरी। रिकवरी की संभावना का आकलन करने का सर्वोत्तम स्थान बैंक है, उदाहरण के लिए बैंक यह अनुमान लगा सकता है कि अगर उसने व्यापार में सुधार का इंतजार किया होता, तो संभव है कि बड़ी राशि रिकवर हो जाती।11 इसके अतिरिक्त आरबीआई के एक विशेष निर्देश से उसे अदालत में चुनौती मिल सकती है। ऐसा हाल ही में चिन्हित डीफॉल्ट के एक मामले में हुआ है।9

दूसरी ओर बैंकों को लोन की रिकवरी के संबंध में निर्देश जारी करने के आरबीआई के अधिकार को इस आधार पर उपयुक्त ठहराया जा सकता है क्योंकि एनपीएज़ का आर्थिक स्थिरता पर असर होता है। लोन डीफॉल्ट की बढ़ती प्रवृत्ति ने बैंकों की ऋण देने की क्षमता और देश में निवेश की संभावना को प्रभावित किया है जिसके व्यापक आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं।4  इस स्थिति में, यह कहा जा सकता है कि इस समस्या का हल निकालने और बकाया राशि को रिकवर करने के लिए आरबीआई का दखल जरूरी है। हालांकि आरबीआई द्वारा निर्देश जारी करने पर बहस की जा सकती है, इस बात पर विचार किया जा सकता है कि क्या अपेक्षित उद्देश्य की प्राप्ति के बाद ऐसे अधिकार कानून का अंग बने रहने चाहिए या एक सीमित समयावधि के बाद लागू नहीं रहेंगे।?11

एनपीएज़ की रिकवरी के दौरान बैंकों के समक्ष आने वाली समस्याएं

वर्तमान में बैंकों के पास अन्य कानूनों के अतिरिक्त इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के तहत रिकवरी की कार्रवाई शुरू करने का विकल्प है। अध्यादेश आरबीआई को अनुमति देता है कि वह बैंकों को इन कार्रवाइयों को शुरू करने का निर्देश जारी करे। यह कहा जा सकता है कि अध्यादेश में उन चुनौतियों को लक्षित नहीं किया गया है, जिनका सामना बैंकों को रिकवरी के दौरान करना पड़ सकता है।

रिकवरी के दौरान बैंक यह तय कर सकते हैं कि क्या: (i) लोन को रीस्ट्रक्चर किया जाए, या (ii) रिकवरी के लिए एसेट्स को लिक्विडेट किया जाए, तथा उस नुकसान का आकलन कर सकते हैं जिसे रिकवरी की प्रक्रिया के रूप में वे स्वीकार करने को तैयार हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 ने टिप्पणी की थी कि रिकवरी की प्रक्रिया में बैंकों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उनमें निम्न शामिल हैं: (i) सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकरों में नुकसान की पहचान करने के लिए प्रोत्साहनों की कमी, (ii) कम रिकवरी होने पर भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों द्वारा जांच का भय, और (iii) रीकवर न हुए लोन्स के कारण नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त पूंजी।3

परिशिष्ट : बकाया लोन्स को रिकवर करने की मौजूदा प्रक्रियाएं

पिछले वर्षों के दौरान एनपीएज़ को रिकवर करने के लिए अनेक प्रक्रियाएं प्रस्तावित की गईं। हम इन्हें तालिका 1 में प्रस्तुत कर रहे हैं।

तालिका 1 : एनपीएज़ की रिकवरी के लिए उपलब्ध विभिन्न विकल्प

 

वर्ष

कार्रवाई/योजना

विशेषताएं

आरबीआई की योजनाएं

2002

कॉरपोरेट डेट रीस्ट्रक्चरिंग

·   उधारकर्ता के एक से अधिक बैंकों में बकाया लोन को रीस्ट्रक्चर करने की अनुमति।

2014

ज्वाइंट लेंडर्स फोरम

·   डीफॉल्टर के एनपीए के निपटान के लिए सभी लेनदार कार्रवाई योजना तैयार करते हैं। अगर मूल्य के हिसाब से 60% लेनदार और संख्या के हिसाब से 50% लेनदार सहमत हो जाएं, यह योजना लागू हो जाती है।

2014

5:25 स्कीम

·   बैंक 25 वर्ष के लिए लोन की अवधि को बढ़ा देते हैं, जोकि उस प्रॉजेक्ट के कैश फ्लो पर आधारित होता है, जिसके लिए लोन दिया गया था। लोन की ब्याज दर और अन्य शर्तें हर पांच वर्ष के बाद रीएडजस्ट की जाती हैं।

2015

एसेट क्वालिटी रिव्यू

·   इसमें यह सुनिश्चित करने का प्रयत्न किया कि बैंक लोन्स के वर्गीकरण पर आरबीआई के दिशानिर्देशों का अनुपालन कर रहा है। अपने खातों में लोन्स के वर्गीकरण में डिविएशन को सुधारने के लिए बैंकों को छह क्वार्टर दिए गए।

2015

स्ट्रैटेजिक डेट रीस्ट्रक्चरिंग

·   एक कंपनी में अधिकतम शेयर पर कब्जा करने के लिए बैंक अपने ऋण को इक्विटी में बदल देता है। इससे बैंक डीफॉल्ट करने वाली कंपनी के प्रबंधन को बदल सकता है।

2016

सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग ऑफ स्ट्रेस्ड एसेट्स

·   इसमें बकाया लोन के एक हिस्से को इक्विटी या प्रिफरेंस शेयरों के रूप में बदलने की अनुमति है, अगर (i) जिस प्रॉजेक्ट के लिए लोन लिया गया था, वह शुरू कर दिया गया है, और (ii) उधारकर्ता 50% से अधिक लोन चुका सकता है।

कानूनी विकल्प

1993

आरडीडीबीएफआई एक्ट, 1993

·   बैंक और कुछ वित्तीय संस्थान विशेष डेट रिकवरी ट्रिब्यूनलों में कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। यह विकल्प सुरक्षित और असुरक्षित, दोनों लेनदारों के लिए उपलब्ध है।

2002

सरफेसी एक्ट, 2002

·   यह एक्ट सुरक्षित लेनदारों को अदालत या ट्रिब्यूनल की संलग्नता के बिना कोलेट्रल को कब्जे में लेने का अधिकार देता है। यह एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनियों के कामकाज को भी रेगुलेट करता है।

2016

इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016

·   यह संहिता लेनदारों को (i) डीफॉल्टरों के लोन्स को रीस्ट्रक्चर करने, या (ii) बकाया राशि को हासिल करने के लिए एसेट्स को लिक्विडेट करने के लिए 180 दिन की समय-सीमा प्रदान करती है।

Sources: RBI scheme guidelines; Economic Survey 2016-17; Recovery of Debts Due to Banks and Financial Institutions Act, 1993 (RDDBFI Act); Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002 (SARFAESI Act); Insolvency and Bankruptcy Code, 2016; PRS 

 

[1].  ‘Master Circular - Prudential norms on Income Recognition, Asset Classification and Provisioning pertaining to Advances, Reserve Bank of India, July 1, 2014, https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/notification/PDFs/74MIR010714FL.pdf.

[2]Statistical Tables Relating to Banks in India, RBI, https://dbie.rbi.org.in/DBIE/dbie.rbi?site=publications#!4; Press Note on Provisional Estimates of Annual National Income 2016-17, Ministry of Statistics and Programme Implementation, May 31, 2017

[3]Chapter 4, The Economic Survey 2016-17, http://unionbudget.nic.in/es2016-17/echap04.pdf

[4]Chapter 3, Volume 2, The Economic Survey 2015-16, http://indiabudget.nic.in/es2015-16/echapvol2-03.pdf

[5]The Banking Regulation (Amendment) Ordinance, 2017, http://www.prsindia.org/uploads/media/Banking%20Ordinance%202017/The%20Banking%20Regulation%20Amendment%20Ordinance%202017.pdf

[6]The Insolvency and Bankruptcy Code, 2016, http://www.ibbi.gov.in/Law/IBC%202016.pdf.

[7]S. O. 1435 (E), Gazette of India, Ministry of Finance, May 5, 2017, http://egazette.nic.in/WriteReadData/2017/175797.pdf.

[8].  RBI identifies Accounts for Reference by Banks under the Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), Press Release, RBI, June 13, 2017, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_PressReleaseDisplay.aspx?prid=40743  

[9]Essar Steel India Limited vs RBI, Special Civil Application No. 12434 of 2017, High Court of Gujarat.

[10]The Banking Regulation Act, 1949, https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/Publications/PDFs/BANKI15122014.pdf

[11].  ‘Ring-fencing RBI in a new NPA regime, Usha Thorat, The Hindu Business Line, May 14, 2017, http://www.thehindubusinessline.com/opinion/rbi-and-indian-banks-npa-problem/article9697753.ece.

[12]Financial Stability Report, RBI, 2010, https://www.rbi.org.in/SCRIPTs/PublicationReportDetails.aspx?UrlPage=&ID=586

[13]Core Principles for Effective Banking Supervision, BIS, 2012, http://www.bis.org/publ/bcbs230.pdf; Handbook on adoption of governance enhancing and non-legislative elements of the draft Indian Financial Code, Ministry of Finance, December 26, 2013, http://mof.gov.in/fslrc/Handbook_GovEnhanc_fslrc.pdf.

 

अस्वीकरणः यह रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) की स्वीकृति के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।