मंत्रालय: 
ऊर्जा
  • जनवरी 28, 2019

बिल की मुख्‍य विशेषताएं

  • एक्ट के अंतर्गत एक डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी बिजली सप्लाई करता है और वितरण प्रणाली का प्रबंधन करता है। संशोधन मसौदा वितरण प्रणाली और बिजली की सप्लाई के लिए अलग-अलग लाइसेंस का प्रावधान करता है। इस प्रकार एक इलाके में कई सप्लाई लाइसेंसी हो सकते हैं।
     
  • सप्लाई कंपनियों को सभी उपभोक्ताओं को 24X7 बिजली सप्लाई सुनिश्चित करनी होगी। इलाके में बिजली की वार्षिक औसत मांग को पूरा करने के लिए बिजली की बिक्री या खरीद का काम पावर पर्चेज एग्रीमेंट्स (पीपीएज़) के जरिए किया जाएगा।
     
  • संशोधनों में अक्षय ऊर्जा (रीन्यूएबल एनर्जी) को पारिभाषित किया गया है। इसमें यह अपेक्षा की गई है कि अक्षय ऊर्जा की एक न्यूनतम मात्रा कोयला/लिग्नाइट बेस्ड जेनरेटर्स से सप्लाई की जाए और एक निश्चित प्रतिशत डिस्कॉम्स/सप्लाई लाइसेंसी द्वारा खरीदी जाए।
     
  • वर्तमान में शुल्क में उपभोक्ताओं के विशिष्ट वर्गों के लिए क्रॉस-सबसिडी शामिल हो सकती है। ये संशोधन क्रॉस सबसिडी के लिए 20% की सीमा निश्चित करने और तीन वर्ष के भीतर उसे समाप्त करने का प्रयास करते हैं। सरकार इस सबसिडी को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के जरिए दे सकती है।
     
  • एक्ट के अंतर्गत राज्य सरकार स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (एसईआरसी) के सदस्यों को चुनने के लिए एक सिलेक्शन कमिटी बनाती है। संशोधन मसौदे में सिलेक्शन कमिटी के संयोजन को बदला गया है ताकि (i) केंद्र सरकार के अधिक सदस्यों को शामिल किया जा सके, और (ii) कमीशन के अध्यक्ष पद पर सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत न्यायाधीश को आसीन किया जाए।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • संशोधनों के अनुसार सप्लाई कंपनियां पीपीएज़ के जरिए बिजली खरीदेंगी। हालांकि समय-समय पर उन्हें अप्रत्याशित मांग का सामना करना पड़ सकता है, जिसे सिर्फ पीपीएज़ के जरिए पूरा नहीं किया जा सकेगा। प्रश्न यह है कि इस अप्रत्याशित मांग को पूरा करने के लिए उन्हें पीपीएज़ के अतिरिक्त किसी दूसरे तरीके से बिजली खरीदने की अनुमति क्यों नहीं दी गई है।
     
  • संशोधनों में एक इलाके में अनेक सप्लाई लाइसेंसी की अनुमति दी गई है। इससे एक इलाके में उपभोक्ताओं को अनेक सप्लायर्स से बिजली खरीदने का विकल्प मिलेगा। हालांकि ऐसी स्विचिंग या सप्लायर्स के बीच ट्रांजिशन किस तरह काम करेगा, इस बारे में स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया है।
  • क्रॉस सबसिडी को हटाने से उन उपभोक्ताओं के लिए शुल्क बढ़ सकता है जो अब तक बिजली का कम मूल्य चुकाते हैं। सरकार ऐसे उपभोक्ताओं को डीबीटी के जरिए सुनिश्चित सबसिडी देते हुए बढ़े हुए शुल्क को कम करने का विकल्प चुन सकती है। इससे सरकारी खजाने पर सबसिडी का दबाब बढ़ सकता है। 
     
  • यह अस्पष्ट है कि सीईआरसी की सिलेक्शन कमिटी को अधिक केंद्रीय प्रतिनिधित्व की क्यों जरूरत है। इसके अतिरिक्त इस सिलेक्शन कमिटी में एक ज्यूडीशियल सदस्य के होने का तर्क भी स्पष्ट नहीं है।

भाग क : बिल की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

बिजली क्षेत्र में तीन खंड होते हैं: उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण। उत्पादन उर्जा के विभिन्न स्रोतों का प्रयोग करते हुए बिजली पैदा करने की प्रक्रिया होती है। फिर हाई वोल्टेज की बिजली को ट्रांसमिशन ग्रिड के जरिए उत्पादन संयंत्रों से वितरण हेतु सब-स्टेशनों में लाया जाता है। तीसरे खंड में बिजली को सब-स्टेशनों से वितरण नेटवर्क के जरिए उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाता है। भारत में 1975 तक यह तीनों काम सरकारी स्वामित्व वाले बिजली बोर्ड (या विभाग) एक साथ करते थे। 90 के दशक की शुरुआत में उत्पादन के काम में निजी क्षेत्र को भी शामिल किया गया। इसी दशक के अंत में ओड़िशा और हरियाणा जैसे राज्यों ने अपने राज्य बिजली बोर्डों को पुनर्गठित करना शुरू किया और इन तीनों खंडों को अलग-अलग किया।[1] 1998 में केंद्र और राज्य स्तर पर बिजली की कीमतों को रेगुलेट करने के लिए रेगुलेटरी कमीशंस बनाए गए।

बिजली एक्ट, 2003 एक ऐसा केंद्रीय कानून है जो बिजली क्षेत्र को रेगुलेट करता है। 2003 के इस एक्ट ने क्षेत्र में अनेक बदलाव किए जैसे (i) राज्य बिजली बोर्ड्स का पुनर्गठन किया गया, (ii) रेगुलेटर्स को अधिक शक्तियां दी गईं, (iii) अपीलीय ट्रिब्यूनल का गठन किया गया, (iv) ट्रांसमिशन और वितरण में प्रतिस्पर्धा का प्रावधान किया गया, (v) पावर ट्रेडिंग को लाइसेंसशुदा गतिविधि माना गया, और (vi) क्षेत्र में क्रॉस सबसिडी को समाप्त करने की मांग की गई। 2003 के एक्ट को 2007 में संशोधित किया गया और क्रॉस सबसिडी को समाप्त करने की बजाय कम किया गया। 

बिजली उत्पादन में निजी क्षेत्र के आगमन से देश में बिजली उत्पादन क्षमता में सुधार हुआ।[2]  1991 में जहां उत्पादन क्षमता 75 गिगावॉट थी, वहीं 2018 में यह बढ़कर 347 गिगावॉट हो गई। हालांकि 2003 का एक्ट अक्षय ऊर्जा को रेगुलेट नहीं करता, अक्षय उर्जा क्षमता पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। नवंबर 2018 तक देश की कुल 21% उत्पादन क्षमता अक्षय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त होती है (72 गिगावॉट)।[3] फिर भी ट्रांसमिशन और वितरण खंड में प्रतिस्पर्धा सीमित है।2 ट्रांसमिशन लाइन्स अधिकतर राज्य सरकार की कंपनियों (57%), इसके बाद केंद्रीय कंपनियों (37%) और निजी कंपनियों (6%) के स्वामित्व में होती हैं।[4] वितरण का काम अधिकतर सरकार के स्वामित्व वाली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम्स) करती हैं। हालांकि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में निजी कंपनियां भी वितरण के कारोबार में शामिल हैं।2 

दिसंबर 2014 में लोकसभा में बिजली (संशोधन) बिल, 2014 पेश किया गया और यह विचार के लिए लंबित है। यह बिल (i) वितरण के खंड में वितरण और सप्लाई को अलग करते हुए इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने, (ii) शुल्क निर्धारण को तर्कसंगत बनाने, और (iii) रीन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने का प्रयास करता है।[5]  ऊर्जा संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर : डॉ. किरीट सोमैय्या) ने 2014 के बिल की समीक्षा की और उसमें कुछ परिवर्तन के सुझाव दिए।[6] ऊर्जा मंत्रालय ने कमिटी के सुझावों और स्टेकहोल्डर्स की सलाह से संशोधन मसौदे को प्रस्तावित किया है।[7] हम इसी संशोधन मसौदे पर निम्नलिखित चर्चा कर रहे हैं।

प्रमुख विशेषताएं

बिजली के वितरण नेटवर्क और रीटेल सप्लाई को अलग-अलग करना

  • वितरण और सप्लाई: एक्ट के अंतर्गत वितरण लाइसेंसी बिजली सप्लाई करता है और सप्लाई क्षेत्र में वितरण नेटवर्क को मेनटेन करता है। संशोधन मसौदा वितरण नेटवर्क (वितरण लाइसेंस) को मेनटेन करने और बिजली की सप्लाई (सप्लाई लाइसेंस) के लिए अलग-अलग लाइसेंस का प्रावधान करता है। इसके अतिरिक्त वितरण और सप्लाई क्षेत्र के लिए कई लाइसेंस जारी किए जा सकते हैं।
     
  • ट्रांसफर स्कीम: राज्य सरकार इसके लिए ट्रांसफर स्कीम को अधिसूचित करेगी। जब तक वितरण लाइसेंसी के क्षेत्र में ट्रांसफर स्कीम लागू होती है, तब तक वितरण लाइसेंसी को, सप्लाई लाइसेंसी के रूप में बिजली सप्लाई करने के लिए अधिकृत माना जाएगा। ट्रांसफर स्कीम के लागू होने की तिथि से बिजली के वितरण और सप्लाई को उसी प्रकार प्रबंधित किया जाएगा, जिस प्रकार ट्रांसफर स्कीम में निर्धारित किया गया है।  

बिजली की खरीद और बिक्री

  • एक्ट के अंतर्गत वितरण लाइसेंसी बिजली उत्पादन कंपनियों से बिजली खरीदता है (सामान्य तौर से पावर परचेज एग्रीमेंट्स (पीपीएज़))। संशोधन मसौदे के अनुसार, वितरण और सप्लाई के अलग-अलग होने के बाद सप्लाई या वितरण लाइसेंसी (जैसा कि मामला होगा), बिजली खरीदेंगे और उसे उपभोक्ताओं को बेचेंगे। सप्लाई या वितरण लाइसेंसी पर अपने उपभोक्ताओं को 24x7 बिजली सप्लाई करने की बाध्यता होगी।
     
  • क्षेत्र में बिजली की औसत वार्षिक मांग को पूरा करने के लिए दीर्घ/मध्यम/अल्प अवधि के पीपीएज़ के जरिए सभी प्रकार की बिक्री या खरीद की जाएगी। अगर कोई भी पक्ष इन पीपीएज़ का अनुपालन नहीं करता तो केंद्र या राज्य बिजली रेगुलेटरी कमीशन (सीईआरसी/एसईआरसी) द्वारा जुर्माना वसूला जाएगा।

शुल्क का निर्धारण

  • शुल्क का निर्धारण: बिजली की रीटेल बिक्री के लिए सीईआरसी/एसईआरसी शुल्क की सिर्फ अधिकतम सीमा निर्धारित करेंगे, और सप्लाई लाइसेंसी इस सीमा से कम शुल्क वसूल सकता है। शुल्क की सीमा उचित लागत और प्रदर्शन मानकों के आधार पर निर्धारित की जाएगी, जिन्हें कमीशंस द्वारा तय किया जाएगा। संशोधन मसौदे में यह भी कहा गया है कि एक्ट के अंतर्गत वसूला जाने वाला कोई जुर्माना शुल्क में नहीं जोड़ा जाएगा, और उसे शुल्क के रूप में उपभोक्ताओं से नहीं वसूला जाएगा।
     
  • बोली लगाने के मामले में शुल्क : संशोधन मसौदे में प्रावधान है कि अगर बिजली की खरीद बोली लगाकर (बिडिंग) की गई है तो कमीशंस रीटेल सप्लाई के लिए शुल्क को निर्धारित नहीं करेंगे। पारदर्शी बोली के जरिए निर्धारित किए गए शुल्क को कमीशन द्वारा पुनर्निर्धारित नहीं किया जाएगा।

बिजली पर सबसिडी

  • प्रत्यक्ष सबसिडी: एक्ट के अंतर्गत राज्य सरकार अग्रिम भुगतान के जरिए उपभोक्ताओं को सबसिडी प्रदान करती है, जिसे एसईआरसी द्वारा निर्धारित किया जाता है। सामान्य रूप से यह सबसिडी राज्य के डिस्कॉम्स को हस्तांतरित कर दी जाती है। डिस्कॉम्स उपभोक्ताओं के शुल्क में इस सबसिडी को सीधे जोड़ देते हैं। संशोधन मसौदे में प्रावधान किया गया है कि अगर राज्य या केंद्र सरकार प्रत्येक उपभोक्ता को सबसिडी देने का प्रयास करती है तो वह प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के जरिए इसे लाभार्थी के बैंक खाते में जमा कर सकती है।
     
  • क्रॉस सबसिडी: संशोधन मसौदे में प्रावधान है कि किसी वितरण क्षेत्र में शुल्क का क्रॉस सबसिडाइजेशन 20% से अधिक नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त ऐसी क्रॉस सबसिडी धीरे-धीरे कम की जाएगी और तीन वर्षों के अंदर पूरी तरह से समाप्त कर दी जाएगी। सीईआरसी/एसईआरसी इस कटौती का रास्ता (ट्राजेक्टरी) तय करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि हर साल क्रॉस सबसिडी में छह प्रतिशत से कम कटौती नहीं की गई है।

अक्षय ऊर्जा

  • अक्षय ऊर्जा: एक्ट ऊर्जा के अक्षय स्रोतों को परिभाषित नहीं करता। प्रस्तावित संशोधन मसौदा अक्षय ऊर्जा स्रोतों में निम्नलिखित को शामिल करता है- हाइड्रो, विंड, सोलर, बायो-मास, बायो-ईंधन, म्यूनिसिपल एवं ठोस कचरा समेत दूसरा कचरा, जियो-थर्मल, टाइडल, इन स्रोतों से सह-उत्पादन और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित कोई अन्य स्रोत। अक्षय ऊर्जा के रूप में वर्गीकृत होने वाली हाइड्रो पावर की अधिकतम क्षमता को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाएगा।
     
  • रीन्यूएबल परचेज़ और जनरेशन ऑब्लिगेशन (आरपीओ, आरजीओ) : संशोधन के अनुसार, आरपीओ का अर्थ है, बिजली की वह न्यूनतम मात्रा जिसे एंटिटीज़ (जैसे सप्लाई लाइसेंसी) को अक्षय ऊर्जा स्रोतों से खरीदना ही पड़ेगा। आरजीओ का अर्थ अक्षय ऊर्जा की वह क्षमता, जिसे कोयला या लिग्नाइट बेस्ड जनरेशन स्टेशन द्वारा इंस्टॉल किया जाएगा या खरीदा जाएगा। आरजीओ को अक्षय ऊर्जा स्रोतों या उसे रिप्रेजेंट करने वाले किसी दूसरे इंस्ट्रूमेंट (जैसे अक्षय ऊर्जा सर्टिफिकेट्स) से खरीदा जा सकता है। आरपीओ और आरजीओ को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाएगा।
     
  • विकेंद्रित वितरित उत्पादन : विकेंद्रित वितरण उत्पादन का अर्थ है, उत्पादन स्थल या उसके निकट अंतिम प्रयोग के लिए उत्पादित होने वाली बिजली। यह बिजली किसी भी स्रोत से उत्पादित हो सकती है, जैसे विंड, स्मॉल हाइड्रो, सोलर, बायोमास, बायोगैस, बायो फ्यूल, म्यूनिसिपल एवं ठोस कचरा समेत दूसरा कचरा, जिओथर्मल, हाइब्रिड पावर सिस्टम, या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित कोई भी स्रोत।

स्मार्ट ग्रिड और मीटरिंग

  • संशोधन मसौदा स्मार्ट ग्रिड को ऐसे बिजली नेटवर्क के रूप में परिभाषित करता है जो इनफॉरमेशन लेने और ऑटोमेटेड तरीके से बुद्धिमत्तापूर्ण काम करने के लिए इनफॉरमेशन और कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है। इससे बिजली के उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण की कुशलता, विश्वसनीयता, स्थायित्व में सुधार होगा और धन की भी बचत होगी। ऐसे स्मार्ट मीटर प्रत्येक चरण में लगाए जाने चाहिए ताकि उपभोग को उचित तरीके से मापा जा सके।

एसईआरसी सिलेक्शन कमिटी का संयोजन

  • एक्ट के अंतर्गत राज्य सरकार एसईआरसीज़ के सदस्यों को चुनने के लिए सिलेक्शन कमिटी का गठन करती है। सिलेक्शन कमिटी की अध्यक्षता ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाएगी, जो उस राज्य के उच्च न्यायालय का जज हो। अन्य सदस्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) संबंधित राज्य का मुख्य सचिव, और (ii) केंद्रीय बिजली अथॉरिटी (सीईए) का चेयरपर्सन, या सीईआरसी का चेयरपर्सन।
     
  • संशोधन मसौदा सिलेक्शन कमिटी के संयोजन में परिवर्तन करता है। अब इसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत जज द्वारा की जाएगी, जिन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित किया जाएगा। अन्य सदस्यों में निम्नलिखित शामिल होंगे : (i) केंद्रीय विद्युत सचिव, (ii) केंद्रीय नवीन और अक्षय ऊर्जा सचिव, (iii) संबंधित राज्य के मुख्य सचिव या विद्युत सचिव, (iv) सीईए के चेयरपर्सन, और (v) सीईआरसी के चेयरपर्सन।

सजा

  • संशोधन मसौदा सीईआरसी या एसईआरसी के निर्देशों का अनुपालन न करने पर सजा में बढ़ोतरी करता है। एक्ट के अंतर्गत सभी कंपनियों के लिए हर बार नियम का उल्लंघन करने पर एक लाख रुपए तक के जुर्माने और उल्लंघन जारी रहने पर हर दिन 6,000 रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। संशोधन में इन्हें क्रमशः एक करोड़ रुपए तक और हर दिन एक लाख तक कर दिया गया है।

भाग ख: प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

यह अस्पष्ट है कि उपभोक्ता आसानी से सप्लायर्स के बीच स्विच कैसे करेंगे

एक्ट के अंतर्गत वितरण लाइसेंसी वितरण नेटवर्क को मेनटेन करता है और रीटेल उपभोक्ताओं को बिजली सप्लाई करता है। सीईआरसी/एसईआरसी किसी एक क्षेत्र में बिजली वितरण के लिए दो या उससे अधिक व्यक्तियों को लाइसेंस दे सकते हैं, जो उस क्षेत्र में अपनी खुद की वितरण प्रणाली का इस्तेमाल करेंगे। प्रस्तावित संशोधन में कहा गया है कि वितऱण प्रणाली (वितरण लाइसेंस) और बिजली की सप्लाई (सप्लाई लाइसेंस) के लिए अलग-अलग लाइसेंस दिए जाएंगे। इसके अतिरिक्त सीईआरसी/एसईआरसी किसी खास क्षेत्र के लिए कई वितरण और सप्लाई लाइसेंस दे सकते हैं।

2003 के एक्ट में प्रावधान है कि एक ही क्षेत्र के लिए कई लाइसेंसी अपने वितरण नेटवर्क बना सकते हैं। इससे क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को मंजूरी दी गई है। हालांकि बिजली वितरण के क्षेत्र में बहुत प्रतिस्पर्धा नहीं देखी जाती है। नए नेटवर्क को लगाने के लिए बड़े पूंजीगत निवेश की जरूरत होती है जोकि नए प्रतिभागियों के प्रवेश के लिए बड़ी बाधा है। इसलिए देश के कुछ स्थानों (जैसे मुंबई) को छोड़कर अधिकतर क्षेत्रों में एक ही डिस्कॉम बिजली सप्लाई कर रही है। प्रस्तावित संशोधन वायर बिजनेस को सप्लाई बिजनेस से अलग करते हैं और इसके जरिए सप्लाई सेगमेंट में प्रतिस्पर्धा पैदा करने का प्रयास करते हैं, साथ ही सप्लाई क्षेत्र में अनेक सप्लाई लाइसेंसी का प्रावधान करते हैं।  

तर्क यह है कि इससे उपभोक्ताओं को अनेक सप्लाई लाइसेंसी में से किसी एक को चुनने का (या उनके बीच स्विच करने का) विकल्प मिलेगा। उपभोक्ताओं को आकर्षित करने और उन्हें अपने साथ बनाए रखने के लिए प्रत्येक सप्लाई लाइसेंसी सस्ती और बेहतर क्वालिटी की सेवा प्रदान करने को प्रोत्साहित होगा। यह भी कि सप्लायर्स अपनी क्षमता में सुधार करने और अपने पीपीएज़ एवं दूसरी लागत के लिए मोलभाव करने का का प्रयास करेंगे और इसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा। इसके लिए उपभोक्ताओं के पास ऐसी सुविधान होनी चाहिए कि अगर वे चाहें तो एक से दूसरे सप्लाई लाइसेंसी की तरफ आसानी से स्विच कर सकें। यह स्विचिंग आसान होनी चाहिए और संक्रमण के दौरान उपभोक्ताओं की बिजली सप्लाई में व्यवधान नहीं होना चाहिए। संशोधन में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह स्विचिंग कैसी होगी और एक सप्लायर से दूसरे सप्लायर की ओर ट्रांजिशन के दौरान क्या होगा। इसके अतिरिक्त संशोधन में ऐसा कोई नियम नहीं है जोकि रेगुलेटरों (सीईआरसी, एसईआरसीज़) को इस संबंध में सूचना देने के लिए अधिकृत करते हों। 

2014 के बिल की समीक्षा के दौरान ऊर्जा संबंधी स्टैंडिंग कमिटी ने कहा था कि बिल में सप्लाई लाइसेंसी के बीच स्विचिंग से संबंधित प्रावधान अधिक स्पष्ट और विवरणपूर्ण होने चाहिए।6 इसमें निम्नलिखित विवरण होने चाहिए: (i) उपभोक्ता को सप्लाई लाइसेंसी के बीच चुनने का विकल्प प्रदान करने वाली व्यवस्था, और (ii) अपनी मर्जी के आधार पर उपभोक्ता द्वारा दूसरे सप्लायर को चुनना और उस ट्रांसफर की लागत।

पावर परचेज़ एग्रीमेंट्स और पावर ट्रेडिंग

सप्लाई लाइसेंसी के पास अल्पावधि की ट्रेडिंग का विकल्प नहीं

वर्तमान में बिजली की खरीद पावर परचेज़ एग्रीमेंट्स (पीपीएज़) के जरिए की जाती है। यह एग्रीमेंट पावर प्लांट (उत्पादन कंपनी) और बिजली वितरण कंपनी (डिस्कॉम) के बीच किया जाता है। संशोधन में कहा गया है कि किसी क्षेत्र में बिजली की वार्षिक औसत मांग को पूरा करने के लिए बिजली की खरीद या बिक्री दीर्घ/मध्यम/अल्प अवधि के पीपीएज़ के जरिए की जाएगी। इसका अर्थ यह है कि डिस्कॉम्स/सप्लाई कंपनियों को पीपीएज़ के जरिए ही बिजली की खरीद (रीटेल सप्लाई के लिए) करनी होगी। चूंकि डिस्कॉम्स/सप्लाई कंपनियों को अपने सभी उपभोक्ताओं को 24X7 बिजली सप्लाई करनी होती है, इसलिए यह सवाल किया जा सकता है कि अप्रत्याशित मांग को देखते हुए उन्हें पीपीएज़ के अतिरिक्त दूसरे तरीकों (जैसे अल्पावधि की ट्रेडिंग) से बिजली खरीदने की अनुमति क्यों नहीं है।

संशोधन के अंतर्गत बिजली की औसत मांग के आधार पर पीपीएज़ को डिजाइन किया जाएगा। वार्षिक औसत मांग को पूरा करने के लिए सप्लाई कंपनी दीर्घ और मध्यम अवधि के एग्रीमेंट्स कर सकती हैं। औसत मांग में कुछ उतार-चढ़ाव होने पर (किसी खास मौसम में या दिन के किसी खास समय में) अल्पावधि के एग्रीमेंट्स किए जा सकते हैं। लेकिन मांग में कुछ और उतार-चढ़ाव भी हो सकते हैं। अगर अल्पावधि की ट्रेडिंग को मंजूरी दी जाए तो सप्लाई लाइसेंसी उस अप्रत्याशित मांग को पूरा कर सकता है।[8] अगर मांग कुछ कम होती है तो अल्पावधि की ट्रेडिंग से सप्लाई कंपनियां अतिरिक्त बिजली बेच भी सकती हैं।8 

वर्तमान में पावर ट्रेडिंग पावर एक्सचेंजेज़ पर की जाती है। पावर एक्सचेंजेज़ वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जहां मांग और आपूर्ति की प्रणाली के आधार पर उत्पादक और उपभोक्ता पारदर्शी तरीके से बिजली बेच और खरीद सकते हैं।[9]  इन एक्सचेंजेज़ पर कीमतें बाजार निर्धारित होती हैं। ये पावर एक्सचेंजेज़ चौबीसों घंटे बिजली बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराते हैं। नीति आयोग (2015) ने कहा था कि पावर एक्सचेंजेज़ बिजली की खरीद और बिक्री करने वालों की अल्पावधि की जरूरतों को पूरा करते हैं।8 यह भी कहा गया था कि एक्सचेंज में ट्रेडिंग से डिस्कॉम्स की उन अल्पावधि की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है, जोकि मांग और आपूर्ति की अनिश्चितताओं से उत्पन्न होती हैं।

सप्लाई लाइसेंसी की ट्रेडिंग से संबंधित प्रावधान अस्पष्ट हैं

संशोधन में यह प्रावधान भी है कि सप्लाई कंपनियों को बिजली की ट्रेडिंग के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं होगी। अगर बिजली की खरीद या बिक्री पीपीएज़ के जरिए होनी है तो यह अस्पष्ट है कि लाइसेंस के बिना सप्लाई लाइसेंसी को पावर ट्रेडिंग की अनुमति देने का उद्देश्य क्या है।

एसईआरसीज़ के लिए सिलेक्शन कमिटी

एसईआरसी सिलेक्शन कमिटी में बदलाव का तर्क स्पष्ट नहीं

एक्ट के अंतर्गत राज्य सरकार एक सिलेक्शन कमिटी बनाएगी जोकि राज्य बिजली रेगुलेटरी कमीशन (एसईआरसी) के सदस्यों को चुनेगी। इस सिलेक्शन कमिटी की अध्यक्षता ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाएगी, जो उस राज्य के उच्च न्यायालय का जज हो। अन्य सदस्यों में निम्न शामिल हैं: (i) संबंधित राज्य का मुख्य सचिव, और (ii) केंद्रीय बिजली अथॉरिटी (सीईए) का चेयरपर्सन, या केंद्रीय बिजली रेगुलेटरी कमीशन (सीईआरसी) का चेयरपर्सन। संशोधन मसौदा सिलेक्शन कमिटी के संयोजन में परिवर्तन करता है और उसके सदस्यों की संख्या तीन से छह करता है। निम्नलिखित तालिका में एसईआरसी सिलेक्शन कमिटी का मौजूदा और प्रस्तावित संयोजन प्रदर्शित है।

तालिका 1: एसईआरसी सिलेक्शन कमिटी का संयोजन

बिजली एक्ट, 2003

बिजली एक्ट का संशोधन मसौदा (2018)

राज्य

·    उच्च न्यायालय का जज (अध्यक्ष)

·    राज्य का चीफ सेक्रेटरी या पावर सेक्रेटरी

·    संबंधित राज्य का चीफ सेक्रेटरी

 

केंद्र

·    केंद्रीय बिजली अथॉरिटी (सीईए) का चेयरपर्सन, या केंद्रीय बिजली रेगुलेटरी कमीशन (सीईआरसी) का चेयरपर्सन

·    सर्वोच्च न्यायालय का सेवारत जज (अध्यक्ष)

·    केंद्रीय विद्युत सचिव

·    केंद्रीय नवीन और अक्षय ऊर्जा सचिव

 

·    सीईए के चेयरपर्सन

 

·    सीईआरसी के चेयरपर्सन

Sources: Electricity Act, 2003; Draft amendments to Electricity Act, 2003; PRS.

प्रस्तावित एसईआरसी सिलेक्शन कमिटी में राज्य का केवल एक प्रतिनिधि है और पांच प्रतिनिधि केंद्र के हैं। इससे कुछ सवाल खड़े होते हैं। पहला यह कि राज्य के रेगुलेटर की सिलेक्शन कमिटी में राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या घटाने और केंद्र के प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने का औचित्य क्या है। दूसरा यह भी अस्पष्ट है कि राज्यों की सिलेक्शन कमिटी में एक समान पांच सदस्यों की क्या जरूरत है।  

सिलेक्शन कमिटी में ज्यूडिशियल सदस्य होने का तर्क भी स्पष्ट नहीं है

वर्तमान में एसईआरसीज़ की सिलेक्शन कमिटी के सदस्यों में से एक उच्च न्यायालय का जज है। संशोधन में प्रावधान है कि सिलेक्शन कमिटी की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत जज द्वारा की जाएगी। एसईआरसीज़ कार्यकारी निकाय होते हैं जोकि बिजली के शुल्क को रेगुलेट करते हैं और बिजली के उत्पादन, ट्रांसमिशन, ट्रेडिंग और वितरण से संबंधित अंतर-राज्यीय और राज्यों के भीतर के मामलों को रेगुलेट करते हैं। सवाल यह है कि किसी रेगुलेटरी निकाय की सिलेक्शन कमिटी में ज्यूडिशियल सदस्यों की क्या जरूरत है। उल्लेखनीय है कि एक्ट के अंतर्गत सीईआरसी की सिलेक्शन कमिटी में ज्यूडिशियल सदस्य नहीं है।

इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत जज देश के सभी 27 एसईआरसीज़ की सिलेक्शन कमिटी में होंगे। एक साल में एसईआरसीज़ के कई सदस्य रिटायर हो सकते हैं और हर साल ऐसा हो सकता है। यह जजों का मुख्य काम नहीं है और इससे उन पर काम का अतिरिक्त बोझ भी पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि मई 2018 में सर्वोच्च न्यायालय में लगभग 54,000 मामले लंबित थे और 2006 से 2018 के बीच अदालत में 36% मामले लंबित थे।[10]  ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के जज के कार्यों में एक कार्य अतिरिक्त जोड़ने से सर्वोच्च संवैधानिक अदालत की उनकी मुख्य भूमिका प्रभावित हो सकती है।  

क्रॉस सबसिडी हटाने से सरकारी खजाने पर सबसिडी का बोझ बढ़ सकता है

वर्तमान में उपभोग की श्रेणी के आधार पर उपभोक्ताओं से अलग-अलग शुल्क वसूला जाता है। राज्य सरकारें अधिकतर डिस्कॉम्स को सबसिडी देती हैं जिससे वे अलग-अलग शुल्क ले सकें (निम्न शुल्क चुकाने वाले उपभोक्ताओं से)। राज्य सरकारों की प्रत्यक्ष सबसिडी के अतिरिक्त निम्न शुल्क चुकाने वाले उपभोक्ताओं (कृषि और आवासीय) को उच्च शुल्क चुकाने वाले उपभोक्ताओं (वाणिज्यिक और औद्योगिक) द्वारा क्रॉस सबसिडी भी दी जाती है। यह क्रॉस सबसिडी शुल्क में ही शामिल होती है। ज्यादा कीमत चुकाने और क्रॉस सबसिडी से मैन्यूफैक्चरर और सेवा क्षेत्रों की इनपुट लागत बढ़ती है।

संशोधन में प्रावधान है कि उपभोक्ता की किसी भी श्रेणी को किसी भी प्रकार की सबसिडी राज्य या केंद्र सरकार द्वारा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के जरिए दी जाएगी। इसके अतिरिक्त वितरण क्षेत्र में क्रॉस सबसिडी 20% से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त ऐसी क्रॉस सबसिडी धीरे-धीरे कम की जाएगी और तीन वर्षों के अंदर पूरी तरह से समाप्त कर दी जाएगी। सीईआरसी/एसईआरसी यह सुनिश्चित करेंगे कि हर साल क्रॉस सबसिडी में छह प्रतिशत से कम कटौती नहीं की गई है।

उपभोक्ता की किसी श्रेणी को सेवा प्रदान करने की लागत और उनसे वसूले जाने वाले औसत शुल्क के बीच का अंतर क्रॉस सबसिडी कहलाता है।[11]  ऐसी क्रॉस सबसिडी को हटाने से दो संभावनाएं बनती हैं। पहला यह कि इस समय सबसिडी प्राप्त और कम कीमत चुकाने वाले उपभोक्ताओं (कृषि और आवासीय) को अधिक शुल्क चुकाना पड़ेगा। दूसरा, राज्य या केंद्र सरकार स्पष्ट सबसिडी प्रदान करते हुए बढ़े हुए शुल्क को डीबीटी के जरिए कम करने का फैसला करें। इससे सरकारी खजाने पर सबसिडी का बोझ बढ़ सकता है (केंद्रीय बजट या राज्य बजट या दोनों के जरिए)।

स्टैंडिंग कमिटी के सुझाव

ऊर्जा संबंधी स्टैंडिंग कमिटी ने बिजली (संशोधन) बिल, 2014 की समीक्षा की और 7 मई, 2015 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।6  कमिटी के जिन सुझावों को संशोधन में शामिल नहीं किया गया, उनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • वितरण और सप्लाई को अलग-अलग करने से संबंधित विवरण: कमिटी ने सुझाव दिया था कि उपभोक्ताओं की जरूरतों को देखते हुए कानून को वितरण और सप्लाई को अलग-अलग करने के संबंध में अधिक विवरण देने चाहिए। इन विवरणों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) क्या वितरण और सप्लाई के लिए एक मीटर होगा, (ii) एक सप्लायर से दूसरे सप्लायर को स्विच करना, और उसकी लागत, और (iii) कनेक्शन हटाना (डिस्कनेक्शंस)।
  • फ्रेंचाइज़ी: एक्ट के अनुसार फ्रेंचाइज़ी वह व्यक्ति होता है जिसे वितरण लाइसेंसी अपने सप्लाई क्षेत्र में उसकी तरफ से बिजली वितरित करने का अधिकार देता है। संशोधन मसौदा इस परिभाषा में संशोधन करता है और कहता है कि फ्रेंचाइज़ी वह व्यक्ति होता है जिसे वितरण या सप्लाई लाइसेंसी अपने वितरण या सप्लाई क्षेत्र में उनकी तरफ से बिजली वितरित या सप्लाई करने का अधिकार देता है। फ्रेंचाइज़ी को अलग से लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी। फ्रेंचाइज़ी की नियुक्ति की शर्तें को सीईआरसी/एसईआरसी द्वारा मंजूर किया जाएगा। इसके अतिरिक्त अगर फ्रेंचाइज़ी कानून या नियमों या रेगुलेशंस का अनुपालन नहीं करता, तो इसके लिए वितरण लाइसेंसी या सप्लाई लाइसेंसी को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। स्टैंडिंग कमिटी ने कहा था कि फ्रेंचाइज़ी को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि उपभोक्ताओं से उसका सीधा संपर्क होता है। साथ ही फ्रेंचाइज़ी को रेगुलेटरी कमीशंस से लाइसेंस लेना चाहिए।
  • रीन्यूएबल जनरेशन ऑब्लिगेशन (आरजीओ) : संशोधन मसौदे में आरजीओ अक्षय ऊर्जा की वह क्षमता है जिसे कोयला या लिग्नाइट बेस्ड जनरेशन स्टेशन द्वारा इंस्टॉल किया जाएगा या उसकी खरीद की जाएगी। उतनी क्षमता को अक्षय ऊर्जा स्रोतों या उन्हें रीप्रेजेंट करने वाले किसी इंस्ट्रूमेंट (जैसे अक्षय ऊर्जा सर्टिफिकेट्स) से खरीदा जा सकता है। 2014 के बिल में यह कहा गया था कि थर्मल जनरेटिंग स्टेशन में कम से कम 10% अक्षय ऊर्जा क्षमता होनी चाहिए। स्टैंडिंग कमिटी ने कहा था कि हालांकि यह अधिक हो सकती है लेकिन आरजीओ की न्यूनतम मात्रा निर्धारित होनी चाहिए। उसने सुझाव दिया था कि आरजीओ को 5% पर फिक्स किया जाए और सभी संबंधित कारकों के आधार पर इसे बाद में बढ़ा दिया जाए।

 

[1]Power Sector Reforms in Odisha: Major Issues and Challenges, Government of Odisha, April 2012, http://odisha.gov.in/e-magazine/Orissareview/2012/April/engpdf/53-62.pdf

[2]Introducing competition in retail electricity supply in India, Forum of Regulators, July 2013, http://forumofregulators.gov.in/Data/Reports/6_9_13.pdf.

[3]All India Installed Capacity (in MW) of Power Stations, Central Electricity Authority, November 30, 2018, http://www.cea.nic.in/reports/monthly/installedcapacity/2018/installed_capacity-11.pdf.

[4]Growth in transmission sector, Ministry of Power, last accessed on September 30, 2015, http://powermin.nic.in/growth-transmission-sector.

[5]Statement of Objects and Reasons, Electricity (Amendment) Bill, 2014.

[6].  4th Report: The Electricity (Amendment) Bill, 2014, Standing Committee on Energy, May 7, 2015

[7]Draft amendments to Electricity Act, 2003 for stakeholder consultation, September 7, 2018, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Draft%20Electricity%20Bill%202018.pdf.

[8].  “Report on Indias Renewable Electricity Roadmap 2030, NITI Aayog, February 2015, http://niti.gov.in/writereaddata/files/document_publication/Report_on_India%27s_RE_Roadmap_2030-full_report-web.pdf.

[9]14th Report: Evaluation of role, performance and functioning of the Power Exchanges, Standing Committee on Energy, April 27, 2016.

[10]Court News, 2006-2016, Supreme Court of India; Pendency of matters in Supreme Court of India, last accessed on October 22, 2018, https://www.supremecourtofindia.nic.in/statistics; Lok Sabha Starred Question 521, April 4, 2018, Lok Sabha

[11].  “Report on Road Map for Reduction in Cross-Subsidy, Forum of Regulators, April 2015, http://www.forumofregulators.gov.in/data/whatsnew/report.pdf

 

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