मंत्रालय: 
वित्त, कॉरपोरेट मामले और सूचना एवं प्रसारण
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    अगस्त 10, 2017
    Gray
  • रेफर
    संयुक्त कमिटी
    अगस्त 10, 2017
    Gray
  • रिपोर्ट
    संयुक्त कमिटी
    अगस्त 01, 2018
    Gray
  • वापस लिए गए
    लोकसभा
    अगस्त 07, 2018
    Gray

बिल की मुख्‍य विशेषताएं

  • बिल रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन की स्थापना करता है, जिससे वित्तीय फर्मों का निरीक्षण किया जा सके, दिवालिया होने के जोखिम का पूर्वानुमान लगाया जा सके, सुधार संबंधी कार्रवाई की जा सके और दिवालिया होने की स्थिति में फर्म को रिजॉल्व किया जा सके। यह कॉरपोरेशन बैंक के दिवालिया होने की स्थिति में एक सीमा तक डिपॉजिट इंश्योरेंस भी प्रदान करेगी। 
     
  • रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन या वित्तीय क्षेत्र का संबंधित रेगुलेटर वित्तीय फर्मों को उनके दिवालिया होने के जोखिम के आधार पर पांच श्रेणियों में बांटेगा। बढ़ते हुए जोखिम के आधार पर ये श्रेणियां इस प्रकार हैं: (i) लो, (ii) मॉडरेट, (iii) मैटीरियल, (iv) इमिनेंट, और (v) क्रिटिकल।
     
  • वित्तीय फर्म के ‘क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल होने के बाद रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन उसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लेगी। कॉरपोरेशन एक वर्ष के भीतर फर्म को रिज़ॉल्व करेगी (इस समय सीमा को एक साल के लिए और बढ़ाया जा सकता है)।
     
  • रेज़ोल्यूशन निम्नलिखित तरीकों के जरिए किया जा सकता है: (i) विलय (मर्जर) या अधिग्रहण, (ii) एसेट्स, देनदारियों और प्रबंधन को किसी अस्थायी फर्म में हस्तांतरित करना, या (iii) लिक्विडेशन। अगर दो वर्ष की अधिकतम अवधि में रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया पूरी नहीं होती तो फर्म को लिक्विडेट कर दिया जाएगा। बिल लिक्विडेशन से होने वाली प्राप्तियों को वितरित करने का क्रम भी स्पष्ट करता है।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन कुछ शक्तियों का उपयोग करेगी, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) जोखिम के आधार पर फर्मों का वर्गीकरण, और (ii) फर्म के प्रबंधन को प्रदर्शन आधारित इनसेंटिव लौटाने का निर्देश देना। लेकिन बिल यह स्पष्ट नहीं करता कि कोई पीड़ित व्यक्ति रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन के ऐसे फैसले को चुनौती देने के लिए समीक्षा या अपील की किस प्रणाली का उपयोग कर सकता है।
     
  • ‘क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल होने के दो वर्ष के भीतर वित्तीय फर्म को रिज़ॉल्व करना पड़ेगा। हालांकि बिल में यह स्पष्ट नहीं है कि रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया कब समाप्त होगी।
     
  • बिल के अंतर्गत, वित्तीय फर्म के ‘क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल होने के बाद रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन उसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लेगी। हालांकि वह फर्म को रिज़ॉल्व कर सकती है। यह अस्पष्ट है कि कॉरपोरेशन को यह विकल्प क्यों दिया गया है।
     
  • बिल स्पष्ट करता है कि ‘क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल होने के बाद रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन फर्म का प्रबंधन संभाल लेगी और निदेशक बोर्ड की शक्तियों का उपयोग करेगी। हालांकि बिल इस स्थिति में बोर्ड को हटाने की अनुमति भी देता है। यह प्रावधान अनावश्यक है।
     
  • बिल अपेक्षा करता है कि वित्तीय फर्म रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन को फीस चुकाए जिसमें क्लॉज 33 में विनिर्दिष्ट फीस भी शामिल हैं। हालांकि क्लॉज 33 में ऐसी किसी फीस को विनिर्दिष्ट नहीं किया गया है, जिसे इन फर्मों द्वारा चुकाए जाने की अपेक्षा की जाती है।

भाग क : बिल की मुख्य विशेषताएं [1]

संदर्भ

रेखाचित्र 1: भारत में वित्तीय एसेट्स का वितरण

Sources: Report of the Working Group on Resolution Regime for Financial Institutions; PRS.

वित्तीय फर्मों में बैंक, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां, बीमा कंपनियां, पेंशन फंड्स, स्टॉक एक्सचेंज और डिपॉजिटरीज़ शामिल हैं। ये फर्म ग्राहकों के डिपॉजिट जमा करती हैं, उनके फंड़्स को निवेश करती हैं और ऋण प्रदान करती हैं। अक्सर ये कंपनियां एक दूसरे से उधार लेती हैं। किसी एक फर्म के दिवालिया होने से दूसरी वित्तीय फर्मों पर प्रतिकूल असर हो सकता है और पूरी वित्तीय व्यवस्था में अस्थिरता आ सकती है। किसी फर्म के रेज़ोल्यूशन के लिए उसका विलय दूसरी फर्म में किया जा सकता है। एसेट्स और देनदारियों को हस्तांतरित किया जा सकता है या उसका उधार कम किया जा सकता है। अगर रेज़ोल्यूशन व्यावहारिक नहीं होता, तो फर्म को लिक्विडेट किया जा सकता है और उसके एसेट्स को बेचकर लेनदारों के बकाया देय को चुकाया जा सकता है।

2008 में बड़ी वित्तीय फर्मों के दिवालिया होने का असर विश्व के कई देशों पर पड़ा था और विश्वव्यापी वित्तीय संकट पैदा हो गया था।[2] फिर अमेरिका सहित यूरोप के विभिन्न देशों ने इस स्थिति से निपटने के लिए अनेक विशिष्ट क्षमताएं विकसित की थीं2,[3],[4]

वर्तमान में भारत में वित्तीय फर्मों के रेज़ोल्यूशन के लिए कोई विशेष कानून नहीं है। फर्मों के निरीक्षण और रेज़ोल्यूशन की जिम्मेदारी संबंधित रेगुलेटरों की है। पिछले कुछ वर्षो के दौरान, एक्सपर्ट कमिटियों ने मौजूदा संरचना की कुछ सीमाओं की ओर इशारा किया है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) अनेक रेगुलेटरों के हस्तक्षेप के कारण समूचे वित्तीय क्षेत्र के लिए रेज़ोल्यूशन की विशिष्ट क्षमताएं विकसित नहीं हो पातीं, (ii) फर्मों के फिर से चालू होने की उम्मीद में रेगुलेटर सहनशील बने रहते हैं और रेज़ोल्यूशन में देरी करते हैं, और (iii) फर्मों को रिज़ॉल्व करने के सीमित तरीके ही उपलब्ध हैं।2,5कमिटियों ने यह टिप्पणी भी की है कि वर्तमान में कुछ वित्तीय फर्मों, जैसे म्यूचुअल फंड्स का प्रबंधन करने वाली कंपनियों या सिक्योरिटी फर्म्स को रिज़ॉल्व करने के कोई प्रावधान नहीं हैं। अलग-अलग रेगुलेटरों के पास एक जैसी फर्मों को रिज़ॉल्व करने की शक्तियां भी अलग-अलग हैं (जैसे आरबीआई के पास अधिसूचित कमर्शियल बैंकों को वाइंड अप या विलय करने की शक्तियां हैं, पर कोऑपरेटिव बैंकों के मामले में ये शक्तियां उपलब्ध नहीं हैं)।2,[5]  

इस संबंध में 10 अगस्त, 2017 को लोकसभा में फाइनांशियल रेज़ोल्यूशन और डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल, 2017 को पेश किया गया।1  बिल वित्तीय फर्मों का निरीक्षण करने के लिए (रेगुलेटरों के साथ) रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन की स्थापना करता है और दिवालिया होने की स्थिति में उन्हें रिज़ॉल्व करता है। उल्लेखनीय है कि 2016 में लागू इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता गैर वित्तीय फर्मों, जैसे कंपनियों और पार्टनरशिप फर्मों के दिवालियेपन से निपटने का प्रयास करती है।[6]

प्रमुख विशेषताएं

बिल वित्तीय फर्मों का निरीक्षण करने और दिवालिया होने की स्थिति में उन्हें रिज़ॉल्व करने के लिए रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन की स्थापना करता है। यह डिपॉजिट इंश्योरेंस और क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन एक्ट, 1962 को रद्द और अन्य 22 कानूनों में संशोधन करता है।1

  • कवरेज: बिल बैंकों, बीमा कंपनियों, स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरीज़, पेमेंट सिस्टम, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों और उनकी पेरेंट कंपनियों पर लागू होगा। केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए दूसरी फर्मों या फंड्स को बिल के दायरे में ला सकती है।

रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन

  • बिल रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन की स्थापना करता है जिसके 11 सदस्य होंगे: (i) चेयरपर्सन, (ii) वित्तीय क्षेत्र के प्रत्येक रेगुलेटर (जैसे आरबीआई, सेबी, इरडा और पीएफआरडीए) का एक प्रतिनिधि, (iii) वित्त मंत्रालय का एक प्रतिनिधि, (iv) केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त तीन सदस्य, और (v) दो स्वतंत्र सदस्य। चेयरपर्सन और सदस्य वित्त, अर्थशास्त्र और रेज़ोल्यूशन जैसे विषयों में विशेषज्ञ होंगे।
     
  • क्रियाकलाप: रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन जोखिम के आधार पर वित्तीय फर्मों को वर्गीकृत करेगी, दिवालिया होने पर वित्तीय फर्मों का रेज़ोल्यूशन या लिक्विडेशन करेगी, उपभोक्ताओं को डिपॉजिट इंश्योरेंस देगी और प्रणालीबद्ध महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों (systemically important financial institutions) का निरीक्षण करेगी। कॉरपोरेशन वित्तीय फर्मों की गतिविधियों की जांच कर सकती है और अगर बिल के प्रावधानों का उल्लंघन होता है तो जांच और तलाशी की कार्रवाई कर सकती है।
     
  • जोखिम आधारित वर्गीकरण: दिवालिया होने के जोखिम के आधार पर वित्तीय फर्मों को रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन या रेगुलेटर (जैसे बैंकों के लिए आरबीआई, बीमा कंपनियों के लिए इरडा और स्टॉक एक्सचेंजों के लिए सेबी) द्वारा पांच श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। ये श्रेणियां हैं: (i) लो (low), (ii) मॉडरेट (moderate), (iii) मैटीरियल (material), (iv) इमिनेंट (imminent) और (v) क्रिटिकल (critical)। कॉरपोरेशन इन पांच में से तीन श्रेणियों में फर्मों को वर्गीकृत कर सकती है, जबकि रेगुलेटर पांच में से किसी एक श्रेणी में फर्मों को वर्गीकृत कर सकता है (देखें रेखाचित्र 2)। यह वर्गीकरण वस्तुनिष्ठ आधार पर किया जाएगा, जैसे पूंजी की कमी या उधार। विचारों में मतभेद होने की स्थिति में कॉरपोरेशन और रेगुलेटर परस्पर सलाह लेंगे। सलाह के बाद कॉरपोरेशन का आदेश अंतिम और वित्तीय फर्म के लिए बाध्यकारी होगा।
  • निरीक्षण: कॉरपोरेशन और रेगुलेटर जोखिम के आधार पर वित्तीय फर्मों का निरीक्षण करेंगे। जोखिम के स्वीकार्य स्तर से ऊपर होने पर (मैटीरियल या इमिनेंट श्रेणियों के अंतर्गत), कॉरपोरेशन या रेगुलेटर फर्म को निर्देश दे सकते हैं कि वे दिवालिया होने के जोखिम को कम करने के लिए कुछ निश्चित कदम उठाएं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) फर्म को डिपॉजिट जमा करने से रोकना, (ii) उसे दूसरे व्यवसाय करने से रोकना, अथवा (iii) अपनी पूंजी में वृद्धि करना। इसके अतिरिक्त मैटीरियल या इमिनेंट श्रेणियों में शामिल फर्मों को रेज़ोल्यूशन और रेस्टोरेशन योजना बनानी होगी। अगर फर्म इमिनेंट या क्रिटिकल की श्रेणी में शामिल है तो कॉरपोरेशन अधिकतम दो वर्षों की अवधि के लिए फर्म के बोर्ड को हटा सकती है।

रेखाचित्र 2: वित्तीय फर्मों का निरीक्षण और रेज़ोल्यूशन

Sources: The Financial Resolution and Deposit Insurance Bill, 2017; PRS.

  • डिपॉजिट इंश्योरेंस: रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन एक निश्चित सीमा तक (जिसे अधिसूचित किया जाएगा) बैंकों को डिपॉजिट इंश्योरेंस देगा। इसका अर्थ यह है कि अगर बैंक का दिवाला निकलता है तो प्रत्येक डिपॉजिटर की एक निश्चित जमा राशि को चुकाने की गारंटी कॉरपोरेशन द्वारा दी जाएगी। कॉरपोरेशन, डिपॉजिट इंश्योरेंस और क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन का काम करेगी, जोकि वर्तमान में एक लाख रुपए तक का डिपॉजिट इंश्योरेंस देती है।

रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया

  • रेज़ोल्यूशन: किसी वित्तीय फर्म के क्रिटिकल की श्रेणी में शामिल होने की तिथि से रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन उसका प्रबंधन संभाल लेगी। फिर बिल में विनिर्दिष्ट विभिन्न तरीकों से एक वर्ष के भीतर कॉरपोरेशन उस फर्म को रिज़ॉल्व करेगी। इस अवधि को एक और वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है (यानी दो वर्ष की अधिकतम सीमा)। इस अवधि के दौरान फर्म के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती।

रेखाचित्र 3: एसेट्स के वितरण का वरीयता क्रम

Sources: The Financial Resolution and Deposit Insurance Bill, 2017; PRS.

  • रेज़ोल्यूशन के तरीके: रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन निम्नलिखित तरीकों से वित्तीय फर्म को रिज़ॉल्व कर सकती है: (i) फर्म के एसेट्स और देनदारियों का हस्तांतरण, (ii) फर्म का विलय, अधिग्रहण या एकीकरण, (iii) ब्रिज वित्तीय फर्म बनाकर (जिसमें फर्म के एसेट्स, देनदारियों और प्रबंधन संभालने के लिए नई कंपनी बनाई जाती है), (iv) बेल-इन (फर्म के उधार को आंतरिक रूप से हस्तांतरित करना या उसे कनवर्ट करना), अथवा (v) लिक्विडेशन (जोकि राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल की स्वीकृति के अधीन है)।

अगर रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन दो वर्ष के भीतर फर्म को रिज़ॉल्व करने में सफल नहीं होती तो उधार चुकाने के लिए फर्म को लिक्विडेट कर दिया जाएगा। लिक्विडेशन से प्राप्त होने वाली राशि को वरीयता क्रम के अनुसार वितरित किया जाएगा, जोकि रेखाचित्र 3 में प्रदर्शित किया गया है। 

अन्य प्रावधान

  • प्रणालीबद्ध महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थान (एसआईएफआईज़) (SIFIs): केंद्र किसी वित्तीय फर्म को एसआईएफआई नामित कर सकता है। इसमें ऐसी वित्तीय फर्में शामिल होंगी जिनके दिवालिया होने से वित्तीय व्यवस्था की स्थिरता पर उल्लेखनीय असर पड़ सकता है। जो फर्में इस बिल के अंतर्गत नहीं आतीं, उन्हें अगर एसआईएफआई के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा, तो उन पर भी बिल के प्रावधान लागू होंगे।
  • अपराध: वित्तीय फर्म के सदस्यों द्वारा किए गए अपराधों के लिए बिल में सजा का प्रावधान है। इन अपराधों में संपत्ति को छिपाना और सबूतों को नष्ट करना या उनका फर्जीवाड़ा करना शामिल है। अपराध की प्रकृति के आधार पर सजा अलग-अलग हो सकती है जिसमें अधिकतम सजा जुर्माने के साथ पांच वर्ष की कैद है।
  • फंड्स: कॉरपोरेशन तीन फंड बनाएगी: (i) डिपॉजिट इंश्योरेंस के लिए कॉरपोरेशन फंड, (ii) रेज़ोल्यूशन के खर्चे के लिए कॉरपोरेशन रेज़ोल्यूशन  फंड, और (iii) अन्य सभी कामों के लिए कॉरपोरेशन जनरल फंड।
  • अधिकारिता का अपवर्जन (बार ऑन ज्यूरिस्डिक्शन): बिल किसी अदालत या ट्रिब्यूनल को रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन या रेगुलेटर के निर्णय से संबंधित मामलों पर विचार करने से प्रतिबंधित करता है, जब तक इस संबंध में बिल में विनिर्देश न हों।

भाग ख:  प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

कॉरपोरेशन की कुछ शक्तियों की समीक्षा की व्यवस्था नहीं

बिल वित्तीय फर्मों (जैसे बैंक, बीमा कंपनियों, स्टॉक एक्सचेंज और डिपॉजिटरीज़) के निरीक्षण, उन्हें दिवालिया होने से रोकने और दिवालिया होने की स्थिति में उन्हें रिज़ॉल्व या लिक्विडेट करने के लिए रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन की स्थापना करता है। इन वित्तीय फर्मों के दिवालिया होने का असर वित्तीय स्थिरता पर पड़ सकता है क्योंकि इनमें उपभोक्ताओं का धन जमा होता है, ये ऋण देते हैं, अर्थव्यवस्था में निवेश करते हैं और एक दूसरे से उधार लेते हैं। इसलिए रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन को अपनी शक्तियों का तत्काल उपयोग करना पड़ सकता है और वित्तीय व्यवस्था को किसी संभावित जोखिम से बचाने की कार्रवाई करनी पड़ सकती है। बिल में ऐसे फैसलों की समीक्षा करने या उनके खिलाफ अपील करने की किसी व्यवस्था का उल्लेख नहीं है।   

अपील की अनुमति न देने के पीछे एक तर्क यह हो सकता है कि रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन के कुछ फैसलों पर तत्काल कार्रवाई करने की जरूरत पड़ सकती है ताकि वित्तीय फर्म को दिवालिया होने से बचाया जा सके। पर इससे पीड़ित व्यक्ति के पास, अगर वह असंतुष्ट है, तो कॉरपोरेशन के फैसले को चुनौती देने का रास्ता नहीं बचता। यह देखते हुए कि बिल के क्लॉज 133 के अंतर्गत अदालतों को रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन के फैसलों से संबंधित किसी मामले पर विचार करने से रोका गया है, पीड़ित व्यक्ति के पास केवल यह उपाय बचता है कि वह संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर करे।[7]  रेज़ोल्यूशन रेजीम फॉर फाइनांशियल इंस्टीट्यूशंस (2014) पर आरबीआई वर्किंग ग्रुप ने यह सुझाव दिया था कि स्टेकहोल्डर्स के पास ऐसा कोई अपील एवं शिकायत निवारण तंत्र उपलब्ध होना चाहिए जिससे वे कॉरपोरेशन के अनुचित फैसलों को चुनौती दे सकें।2  हम यहां ऐसे दो मामलों पर चर्चा कर रहे हैं, जहां अपील की कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है:

दिवालिया होने के जोखिम के आधार पर वित्तीय फर्मों का वर्गीकरण

रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन किसी वित्तीय फर्म कोमैटीरियल’, इमिनेंट’ या क्रिटिकल’ श्रेणियों के अंतर्गत वर्गीकृत कर सकती है। ऐसे वर्गीकरण से पहले वित्तीय फर्म को अपनी बात कहने का अवसर दिया जाएगा। हालांकि रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन का अंतिम निर्णय फर्म के लिए बाध्यकारी होगा, और उसे उसका अनुपालन करना होगा।

वर्गीकरण के आधार पर फर्म सुधारात्मक कार्रवाई या रेज़ोल्यूशन के अधीन हो सकती है, जिनमें निम्नलिखित कदम शामिल हैं: (i) उन्हें डिपॉजिट स्वीकार करने से रोकना, (ii) उन्हें दूसरे व्यवसायों का अधिग्रहण करने से प्रतिबंधित करना, अथवा (iii) उन्हें सिक्योरिटीज़ जारी करके या एसेट्स बेचकर अतिरिक्त पूंजी जुटाने को कहना। रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन क्रिटिकल’ की श्रेणी में आने वाली फर्म का प्रबंधन संभालेगी और उसे रिज़ॉल्व करेगी। बिल पीड़ित फर्म के लिए ऐसी किसी व्यवस्था को विनिर्दिष्ट नहीं करता, जिससे वह रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन के वर्गीकरण क्रम के खिलाफ अपील कर सके।

वित्तीय फर्मो के सदस्यों को प्रदर्शन के आधार पर प्राप्त होने वाले इनसेंटिव्स लौटाने का आदेश

बिल के अंतर्गत रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन मैटीरियल’ या इमिनेंट’ श्रेणी की वित्तीय फर्मों के चेयरपर्सन, चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (सीईओ) या निदेशक के पारिश्रमिक के उस अनुपात को निश्चित कर सकती है जिसे उनके प्रदर्शन से लिंक किया जाए। परिणामस्वरूप अगर वह वित्तीय फर्म क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल कर दी जाती है तो रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन चेयरपर्सन, सीईओ या निदेशक को सुनवाई का अवसर देने के बाद यह आदेश दे सकती है कि वे प्रदर्शन आधारित इनसेंटिव को लौटा दें। इन अधिकारियों को ऐसे निर्देश दिए जा सकते हैं, अगर उनके कार्यों या चूक के कारण वित्तीय फर्म क्रिटिकल’ जोखिम के अंतर्गत वर्गीकृत की गई है।

बिल पीड़ित व्यक्ति के लिए किसी ऐसी व्यवस्था को विनिर्दिष्ट नहीं करता कि वह रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन के आदेश को चुनौती दे सके। किसी व्यक्ति को प्रदर्शन आधारित इनसेंटिव लौटाने का आदेश अंतिम होगा, और अगर उसका अनुपालन नहीं किया जाएगा तो परिणाम के तौर पर, आयकर एक्ट, 1961 में विनिर्दिष्ट तरीके से उसकी रिकवरी की जाएगी।    

वर्गीकरण और रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया के कुछ हिस्सों में स्पष्टता का अभाव

बिल के अंतर्गत रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन या रेगुलेटर जोखिम के आधार पर वित्तीय फर्मों को पांच श्रेणियों में से किसी एक में वर्गीकृत कर सकती है: (i) लो, (ii) मॉडरेट, (iii) मैटीरियल, (iv) इमिनेंट और (v) क्रिटिकल। इस संबंध में हम बिल में उल्लिखित कुछ प्रक्रियाओं की जांच कर रहे हैं, जो अस्पष्ट हो सकती हैं।

कुछ मामलों में रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया का समाप्त होना अस्पष्ट

बिल स्पष्ट करता है कि अगर वित्तीय फर्म को क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल किया जाता है तो रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन उसका प्रबंधन संभाल लेगी। इसके बाद रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन निम्नलिखित तरीकों से वित्तीय फर्म को रिज़ॉल्व कर सकती है: (i) एसेट्स और देनदारियों का किसी अन्य फर्म में हस्तांतरण, (ii) फर्म का विलय या अधिग्रहण, (iii) ब्रिज वित्तीय फर्म नामक एक अस्थायी फर्म में एसेट्स और देनदारियों का हस्तांतरण, (iv) बेल-इन (देनदारियों का आंतरिक पुनर्गठन जिसमें उधार को इक्विटी में बदलना शामिल है) अथवा (v) लिक्विडेशन। हालांकि बिल यह संकेत नहीं देता कि रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया को किस समय बिंदु पर समाप्त माना जाएगा।

इनमें से कुछ तरीकों, जैसे हस्तांतरण या विलय, के मामले में यह माना जा सकता है कि नए प्रबंधन के फर्म का प्रबंधन संभालने के समय रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया के समाप्त होने का संकेत मिल सकता है। लिक्विडेशन की स्थिति में, बिल स्पष्ट करता है कि किसी वित्तीय फर्म के सभी एसेट्स बिकने के बाद राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल फर्म के विघटन की मंजूरी दे देगा। हालांकि बेल-इन जैसे कुछ मामलों में यह बताना मुश्किल है कि रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया कब पूरी हुई है।  

उल्लेखनीय है कि इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के अंतर्गत किसी डिफॉल्टिंग कंपनी की रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया तब समाप्त होती है जब राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल द्वारा बहाली योजना मंजूर की जाती है। इसके अतिरिक्त ट्रिब्यूनल द्वारा कंपनी के खिलाफ किसी भी मुकदमे पर रोक हटाने का आदेश पारित किया जाता है।6

रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन वित्तीय फर्मों का अधिग्रहण करती है लेकिन उसे रिज़ॉल्व करना चुन सकती है

बिल वित्तीय फर्मों का निरीक्षण करने, उनके वित्तीय स्वास्थ्य पर होने वाले जोखिम को रोकने और दिवालिया होने की स्थिति में उन्हें रिज़ॉल्व करने के लिए रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन की स्थापना करता है। बिल का क्लॉज 58 स्पष्ट करता है कि क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल होने के बाद रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन वित्तीय फर्मों के कामकाज को जारी रखने के लिए उसका प्रबंधन संभाल लेगी। हालांकि बिल का क्लॉज 48 कहता है कि रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन वित्तीय फर्म को रिज़ॉल्व करना चुन सकती है। चूंकि वित्तीय फर्म का प्रबंधन संभालने का उद्देश्य उसे रिज़ॉल्व करना है, इसीलिए यह अस्पष्ट है कि रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन को फर्म को रिज़ॉल्व करने का विकल्प क्यों दिया जा रहा है।

कॉरपोरेशन द्वारा ‘क्रिटिकल’ फर्म के बोर्ड को हटाना अनावश्यक

बिल के क्लॉज 58 के अंतर्गत किसी वित्तीय फर्म के क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल होने के बाद रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन उसका प्रबंधन संभाल लेगी। एक प्रशासक के तौर पर रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन निम्नलिखित कार्य करेगी : (i) वित्तीय फर्म के कामकाज का प्रबंधन करेगी, और (ii) निदेशक बोर्ड की शक्तियों का उपयोग करेगी, इत्यादि। हालांकि बिल का क्लॉज 62 (1) रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन को अनुमति देता है कि अगर कोई वित्तीय फर्म क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल होती है तो वह उसके निदेशक बोर्ड को हटा सकती है।

यह देखते हुए कि क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल होने के बाद वित्तीय फर्म के निदेशक बोर्ड की शक्तियां रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन में निहित हो जाएंगी, कॉरपोरेशन को फर्म के बोर्ड को हटाने, जब वह क्रिटिकल’ की श्रेणी में शामिल हो जाए, की अनुमति देने का प्रावधान अनावश्यक हो सकता है।

वित्तीय फर्मों द्वारा चुकाई जाने वाली फीस को क्लॉज 33 में स्पष्ट नहीं किया गया है

बिल के क्लॉज 22 (1) में वित्तीय फर्म से यह अपेक्षा की जाती है कि वह रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन को निम्नलिखित की अदायगी करे: (i) रेज़ोल्यूशन की फीस, और (ii) प्रशासनिक व्यय की फीस, जिसमें क्लॉज 33 के अंतर्गत उल्लिखित फीस भी शामिल है। हालांकि क्लॉज 33 में उस फीस का कोई उल्लेख नहीं है जिसे वित्तीय फर्मो को रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन को चुकाने की अपेक्षा की जाती है।

 

परिशिष्ट: प्रस्तावित बिल से अंतरराष्ट्रीय कानूनों की तुलना

तालिका 1 में फाइनांशियल रेज़ोल्यूशन और डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल, 2017 के प्रावधानों की तुलना अन्य देशों के कानूनों से की गई है।

तालिका 1: रेज़ोल्यूशन कानूनों की अंतरराष्ट्रीय तुलना

कार्य

यूनाइडेट स्टेट्स

युनाइटेड किंगडम

ऑस्ट्रेलिया

भारत (प्रस्तावित बिल)

अथॉरिटीज़

·   रेगुलेटर: फेडरल रिजर्व बोर्ड सहित बैंकों के लिए चार रेगुलेटर। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ब्रोकर्स और स्टॉक एक्सचेंज का रेगुलेटर।

 

 

·   रेज़ोल्यूशन अथॉरिटी: फेडरल डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (एफडीआईसी)

·   रेगुलेटर: प्रूडेंशियल रेगुलेशन अथॉरिटी (पीआरए) और फाइनांशियल कंडक्ट अथॉरिटी (एफसीए) वित्तीय क्षेत्र का रेगुलेटर

 

·   रेज़ोल्यूशन अथॉरिटी:  बैंक ऑफ इंग्लैंड या हर मेजिस्टीज़ ट्रेजरी (वित्त मंत्रालय के समान)

·   रेगुलेटर:  सिक्योरिटीज़ और इनवेस्टमेंट्स कमीशन सिक्योरिटीज़ का रेगुलेटर। ऑस्ट्रेलियन प्रूडेंशियल रेगुलेशन अथॉरिटी (एपीआरए) और रिजर्व बैंक वित्तीय क्षेत्र का निरीक्षक।

·   रेज़ोल्यूशन अथॉरिटी:  एपीआरए

·   रेगुलेटर: आरबीआई (बैंक और एनबीएफसीज़), सेबी (सिक्योरिटी मार्केट), इरडा (बीमा) और पीएफआरडीए (पेंशन)।

 

 

 

 

·   रेज़ोल्यूशन अथॉरिटी:  रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन

कवरेज

·   बैंक और नॉन बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसीज़)

·   अन्य संस्थान जैसे होल्डिंग कंपनियां (वित्तीय फर्मों की पेरेंट कंपनी)

·   बैंक

 

·   अन्य संस्थान जैसे निवेश फर्म (सिक्योरिटी एवं म्यूचुअल फंड्स की देखरेख), होल्डिंग कंपनियां

·   बैंक

·   बीमा कंपनियां

·   अन्य संस्थान जैसे होल्डिंग कंपनियां

·   बैंक और एनबीएफसीज़

·   बीमा कंपनियां

·   अन्य संस्थान जैसे स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरीज़ और होल्डिंग कंपनियां

·   केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित संस्थान

निरीक्षण

·   पूंजी के आधार पर एफडीआईसी फर्मों को जोखिम की पांच श्रेणियों में बांटती है

·   फर्म एफडीआईसी को रेज़ोल्यूशन, बहाली योजना सौंपती हैं

·   रेगुलेटर फर्मों को जोखिम से दिवालिया के पांच सूत्री मानक के आधार पर वर्गीकृत करते हैं

·   फर्म पीआरए को रेज़ोल्यूशन योजना सौंपती हैं

·   पूंजी, एसेट्स और प्रबंधन इत्यादि के अधार पर एपीआरए फर्मों को जोखिम की विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत और उनका निरीक्षण करती हैं

·   कॉरपोरेशन, रेगुलेटर फर्मों को जोखिम से दिवालिया के पांच सूत्री मानक के आधार पर वर्गीकृत करते हैं

·   फर्म रेज़ोल्यूशन और बहाली योजना सौंपती हैं

कार्यवाही शुरू करना

·   किसी भी शर्त का उल्लंघन (जैसे पूंजी का पर्याप्त होना)

·   रेगुलेटर या लाइसेंसिंग अथॉरिटी द्वारा एफडीआईसी को लिक्विडेटर नियुक्त करना। एफडीआईसी स्वयं को नियुक्त कर सकता है

·   एफडीआईसी प्रशासन संभाल सकता है

·   दो स्थितियों में, जिनमें फर्म के दिवालिया होने की उच्च आशंका शामिल है

·   रेगुलेटरों और बैंक ऑफ इंग्लैंड का आकलन

·   बैंक ऑफ इंग्लैंड प्रशासन संभाल सकता है

 

·   एपीआरए द्वारा स्टेट्यूटरी मैनेजर की नियुक्ति

·   बीमा कंपनियों के मामले में अदालत फर्म का नियंत्रण संभालने के लिए ज्यूडीशियल मैनेजर नियुक्त करती है

·   ज्यूडीशियल मैनेजर प्रशासन संभालता है

·   क्रिटिकल की श्रेणी में वर्गीकृत होने पर

·   रेज़ोल्यूशन कॉरपेरोशन

·   (क्रिटिकल के स्तर पर प्रबंधन और इमिनेंट या क्रिटिकल के स्तर पर निदेशक बोर्ड को हटाना)

समय सीमा

·   90 दिन

·   कोई समय सीमा तय नहीं

·   कोई समय सीमा तय नहीं

·   एक वर्ष (एक वर्ष और बढ़ाया जा सकता है)

रेज़ोल्यूशन के तरीके

·   पर्चेज़ एंड एसंप्शन ट्रांजेक्शन (एसेट्स और देनदारियों को पूरा या उसका एक हिस्सा हस्तांतरित करना)

·   ब्रिज सर्विस प्रोवाइडर (फर्म चलाने के लिए अस्थायी कंपनी)

·   डिपॉजिटरों को भुगतान

·   स्टेबलाइजिंग टूल्स:

1.    एसेट्स और देनदारियों का हस्तांतरण

2.    ब्रिज सर्विस प्रोवाइडर

3.    बेल-इन(आंतरिक रूप से उधार कम करना)

·   बैंक की इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया

·   बैंक की प्रशासनिक प्रक्रिया

·   अस्थायी सार्वजनिक स्वामित्व

·   एसेट्स और देनदारियों का हस्तांतरण

·   ब्रिज सर्विस प्रोवाइडर

·   विलय या अधिग्रहण

 

·   एसेट्स और देनदारियों का हस्तांतरण

·   ब्रिज सर्विस प्रोवाइडर

·   विलय या अधिग्रहण

·   बेल-इन

·   लिक्विडेशन

·   बीमा कंपनी का रन-ऑफ (नए व्यवसाय किए बिना मौजूदा बीमा पॉलिसीज़ को फिलहाल चालू रखना)

डिपॉजिट इंश्योरेंस

·   एफडीआईसी द्वारा प्रदान

·   2,50,000 अमेरिकी डॉलर तक के बैंक डिपॉजिट

·   फाइनांशियल सर्विसेज़ कंपनसेशन स्कीम द्वारा प्रदान

 

·   850,000 पाउंड तक के बैक डिपॉजिट

·   एपीआरए द्वारा फाइनांशियल क्लेम स्कीम

·   2,50,000 ऑस्ट्रेलियन डॉलर तक के बैंक डिपॉजिट

·   रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन द्वारा प्रदान

·   रेगुलेटर द्वारा सीमा तय की जाएगी (वर्तमान में डीआईसीजीसी 1 लाख रुपए तक का बीमा देता है)

Note: Bank Insolvency Procedure is used when the failing firm is put into liquidation and depositors are paid off; Bank Administration Procedure is used to put a part of a failed firm (that has not been transferred to a bridge service provider or private sector purchaser) into administration.

Sources:  United Kingdom Banking Act, 2009, United Kingdom Insolvency Act, 1986, United States Code Title 11-Bankruptcy, United States Federal Deposit Insurance Act, 1950, Report of the Working Group on Resolution of Regime for Financial Institutions, RBI, January 2014, The Bank of England’s Approach to Resolution, 2014; The Australia Financial Sector Legislation Amendment (Prudential Refinements and Other Measures) Act 2010; The Australia Banking Act 1959; Report on Strengthening APRA’s Crisis Management Powers, 2012; The Deposit Insurance and Credit Guarantee Resolution Corporation Act, 1961; The Financial Resolution and Deposit Insurance Bill, 2017; PRS.

 

[1]The Financial Resolution and Deposit Insurance Bill, 2017.

[2]Report of the Working Group on Resolution Regime for Financial Institutions, Reserve Bank of India, January 2014.

[3]Banking Resolution and Recovery Directive, European Union, Directive 2014/59/EU of the European Parliament and of the Council, May 15, 2014

[4]Key Attributes of Effective Resolution Regimes for Financial Institutions, FSB, 2014

[5]Report of the Committee to Draft Code on Resolution of Financial Firms, September 2016

[6]The Insolvency and Bankruptcy Code, 2016.  

[7].  Writ is an extraordinary remedy available to all persons for enforcing their constitutional and legal rights, or to compel public authorities to discharge their relevant duties

 

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