मंत्रालय: 
गृह मामले
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    नवंबर 26, 2019
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    नवंबर 27, 2019
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    दिसंबर 03, 2019
    Gray
  • गृह मामलों के मंत्री अमित शाह ने 26 नवंबर, 2019 को लोकसभा में दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव (केंद्र शासित प्रदेशों का विलय) बिल, 2019 पेश किया। बिल दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव केंद्र शासित प्रदेशों (यूटीज़) का एक केंद्र शासित प्रदेश में विलय करने का प्रावधान करता है। बिल की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • संविधान में संशोधन: संविधान की पहली अनुसूची विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को निर्दिष्ट करती है। बिल दो केंद्र शासित प्रदेशों () दादरा और नगर हवेली, तथा () दमन और दीव के क्षेत्रों के विलय के लिए पहली अनुसूची में संशोधन करता है। विलय होने वाले क्षेत्र दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव केंद्र शासित प्रदेश बनेंगे। यह केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित तारीख से प्रभावी होगा।
     
  • संविधान के अनुच्छेद 240(1) में राष्ट्रपति को कुछ केंद्र शासित प्रदेशों के लिए रेगुलेशन बनाने की अनुमति है। इनमें दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, दोनों शामिल हैं। बिल इन दो यूटीज़ के स्थान पर एक यूटी (विलय होने वाले यूटी) को लाने के लिए इस अनुच्छेद में संशोधन करता है
     
  • लोकसभा में प्रतिनिधित्व: जन प्रतिनिधित्व एक्ट, 1950 की पहली अनुसूची में दोनों यूटीज़ में एक-एक लोकसभा सीट का प्रावधान है। बिल विलय होने वाले यूटी में दो लोकसभा सीटों के आबंटन के लिए इस अनुसूची में संशोधन करता है।
     
  • यूटीज़ के अंतर्गत आने वाली सेवाएं: मौजूदा यूटीज़ से संबंधित कार्यों में सेवारत व्यक्ति अस्थायी रूप से विलय होने वाले यूटी के लिए कार्य करेंगे। केंद्र सरकार यह निर्धारित करेगी कि क्या ऐसे सभी व्यक्तियों को विलय होने वाले यूटी में कार्य करने का जिम्मा दिया जाएगा।
     
  • विलय होने वाला यूटी अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली सेवाओं में कर्मचारियों को शामिल करने हेतु कदम उठाएगा। केंद्र सरकार इस संबंध में विलय होने वाले यूटी को आदेश और निर्देश दे सकती है।
     
  • केंद्र सरकार एडवाइजरी कमिटी की स्थापना कर सकती है ताकि इन प्रावधानों से प्रभावित होने वाले व्यक्तियों के साथ उचित व्यवहार सुनिश्चित हो और उनके अभिवेदनों (रिप्रेजेंटेशन) पर विचार किया जा सके। सेवा आदेश के खिलाफ अभिवेदन, उस आदेश के प्रकाशन या आदेश के नोटिस- जो भी पहले हो- की तारीख से तीन महीने के भीतर दिया जाना चाहिए।
     
  • ये प्रावधान ऑल इंडिया सर्विसेज़ (जैसे भारतीय प्रशासनिक सेवाओं, भारतीय पुलिस सेवाओं और भारतीय वन सेवाओं) तथा किसी अन्य राज्य से डेलिगेशन पर आए व्यक्तियों पर लागू नहीं होंगे।
     
  • उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार: बिल में प्रावधान है कि विलय होने वाला यूटी मुंबई उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आएगा।

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।