मंत्रालय: 
सूचना प्रौद्योगिकी

नियमों की मुख्‍य विशेषताएं

  • इंटरमीडियरीज़ के लिए मार्गदर्शक नियम, 2011 में इंटरमीडियरीज़ से यह अपेक्षा की गई है कि वे यूजर्स को अपने प्लेटफॉर्म पर कुछ कंटेंट होस्ट करने से प्रतिबंधित करेंगे (जैसे अश्लील कंटेंट)। ड्राफ्ट नियम इनफॉरमेशन यानी कंटेंट की उस नई श्रेणी को प्रतिबंधित करते हैं जोकि ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा पहुंचाता है।’
     
  • इंटरमीडियरीज़ को 72 घंटे के अंदर सरकारी एजेंसी की मदद करनी होगी। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने प्लेटफॉर्म पर इनफॉरमेशन के ऑरिजिनेटर की ट्रेसिंग को एनेबल करना होगा।
     
  • इंटरमीडियरीज़ को टेक्नोलॉजी बेस्ड ऑटोमेटेड टूल्स लगाने होंगे ताकि गैरकानूनी इनफॉरमेशन को चिन्हित और पब्लिक एक्सेस से हटाया जा सके। इसके अतिरिक्त 50 लाख से ज्यादा यूजर्स वाले इंटरमीडियरीज़ को भारत में कंपनी बनानी होगी।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण  

  • इंटरमीडियरीज़ से अपेक्षा की गई है कि वे उस कंटेट के पब्लिकेशन को प्रतिबंधित करें जोकि सार्वजनिक स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा पहुंचाता है। इससे अनुच्छेद 19 (1) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हो सकता है।
     
  • इंटरमीडियरीज़ से अपेक्षा की गई है कि गैरकानूनी कंटेंट के एक्सेस को हटाने के लिए वे ऑटोमेटेड टूल्स का इस्तेमाल करें। यह हाल के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विरोधाभासी है।
     
  • 50 लाख से ज्यादा यूजर्स वाले इंटरमीडियरीज़ को भारत में कंपनी बनानी होगी। लेकिन यह अस्पष्ट है कि इस संख्या को कैसे कैलकुलेट किया जाएगा। इसलिए इंटरमीडियरी के लिए यह पता लगाना मुश्किल होगा कि इस प्रावधान के अंतर्गत क्या उसके लिए भारत में कंपनी बनाना जरूरी है।

 

इंटरमीडियरीज़ वह एंटिटीज़ होती हैं जोकि दूसरे व्यक्तियों की ओर से डेटा स्टोर या ट्रांसमिट करती है। इनमें इंटरनेट या टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स, और ऑनलाइन मार्केट प्लेस शामिल हैं। 2008 में इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट में संशोधन किया गया था ताकि इंटरमीडियरीज़ को थर्ड पार्टी इनफॉरमेशन आदि की जवाबदेही से छूट दी जा सके। इसके बाद एक्ट के सेक्शन 79 (2) के अंतर्गत आईटी (इंटरमीडियरीज़ के लिए मार्गदर्शक) नियम, 2011 बनाए गए थे। इनमें यह बताया गया था कि इस छूट को हासिल करने के लिए इंटरमीडियरीज़ को किन नियमों का पालन करना जरूरी है।[1]  

2018 में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के दुरुपयोग के कारण भड़की हिंसा पर संसद में चर्चा हुई।[2] तब इलेक्ट्रॉनिक्स और इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने कहा था कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए वह इंटरमीडियरीज़ के मार्गदर्शक नियमों में संशोधन की योजना बना रहा है। मंत्रालय ने अब 2011 के नियमों पर संशोधन मसौदे को जारी किया है। यह इंटरमीडियरीज़ के लिए जरूरी नियमों के अनुपालन में संशोधन करता है।[3]

प्रमुख विशेषताएं

  • प्रतिबंधित श्रेणियां: नियमों में प्रत्येक इंटरमीडियरी से अपेक्षा की गई है कि वह प्रयोग की शर्तों को पब्लिश करेगा। इन शर्तों में यूजर्स को कुछ खास किस्म के कंटेंट की होस्टिंग करने से प्रतिबंधित किया गया है जिसमें ऐसा कंटेंट भी शामिल है जोकि बहुत अधिक हानिकारक या अश्लील है। मसौदा इनफॉरमेशन की एक नई श्रेणी को प्रतिबंधित करता है जोकि सार्वजनिक स्वास्थ्य या सुरक्षा’ को खतरा पहुंचता है और इसमें सिगरेट या तंबाकू उत्पादों का प्रमोशन या अल्कोहल और निकोटिन सहित मादक पदार्थों का उपभोग शामिल है।
     
  • कंटेंट को हटाना: इंटरमीडियरी को अदालत का आदेश मिलने पर या सरकार की अधिसूचना पर गैरकानूनी कंटेंट को हटाना होगा। ये कार्रवाई भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और देश की व्यवस्था, इत्यादि से संबंधित हैं। इंटरमीडियरी को 24 घंटे के अंदर इस कंटेंट को हटाना होगा। इसके अतिरिक्त इंटरमीडियरी को टेक्नोलॉजी बेस्ड ऑटोमेटेड टूल्स लगाने होंगे ताकि गैरकानूनी कंटेंट को चिन्हित किया जा सके और उसे पब्लिक एक्सेस से हटाया जा सके।
     
  • सहायता: इंटरमीडियरीज़ को 72 घंटे के अंदर सरकारी एजेंसी (कानूनी आदेश के आधार पर) की मदद करनी होगी। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने प्लेटफॉर्म पर इनफॉरमेशन के ऑरिजिनेटर की ट्रेसिंग को एनेबल करना होगा।
     
  • पंजीकृत भौतिक उपस्थिति: कुछ इंटरमीडियरीज़ को कंपनी एक्ट, 2013 के अंतर्गत भारत में कंपनी बनानी होगी। ये वे इंटरमीडियरीज़ हैं, जिनके यूजर्स 50 लाख से ज्यादा हों या जैसा सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए। भारत में उन्हें स्थायी कार्यालय भी बनाना होगा और ऐसे अधिकारियों का नाम निर्दिष्ट करना होगा जो सरकारी एजेंसियों से समन्वय स्थापित करेंगे।  

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा पहुंचाने वाले कंटेंट पर प्रतिबंध से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन संभव

नियमों में प्रावधान है कि इंटरमीडियरी को अपने यूजर एग्रीमेंट में कुछ विशेष प्रकार के कंटेंट के पब्लिकेशन पर प्रतिबंध लगाना होगा। मसौदा नियम ऐसी इनफॉरमेशन की नई श्रेणी को प्रतिबंधित करता है जो ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा पहुंचाती हो। इससे संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन हो सकता है जोकि स्वतंत्र होकर बोलने और अभिव्यक्ति के अधिकार की गारंटी देता है। अनुच्छेद 19 (2) में उन छह विषयों का उल्लेख है जिनके आधार पर इस स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा सकती है। इसमें सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा शामिल है।

इनफॉरमेशन की नई श्रेणी, जो ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा पहुंचाती है, अनुच्छेद 19 (2) की शर्तों का पूरा नहीं करती। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा (जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के तौर पर पढ़ा गया है) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का आधार नहीं हो सकता। न्यायालय ने कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक को अनुच्छेद 19 (2) के अंतर्गत निर्दिष्ट विषयों से संबंधित होना चाहिए।[4]  एक दूसरे फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अभिव्यक्ति पर रोक से संबंधित कानून को इस प्रकार तैयार किया जाना चाहिए (नैरोली टेलर्ड) कि वह सिर्फ उसी पर प्रतिबंध लगाए जो बहुत जरूरी हो। तभी यह तर्कसंगत होगा।5 

इंटरमीडियरीज़ से कंटेट को चिन्हित करने और हटाने की अपेक्षा करना अनुचित

मसौदा नियमों में यह प्रावधान है कि इंटरमीडियरीज़ को टेक्नोलॉजी बेस्ड ऑटोमेटेड टूल्स लगाने होंगे ताकि गैरकानूनी इनफॉरमेशन या कंटेंट को चिन्हित और पब्लिक एक्सेस से हटाया जा सके। यह प्रावधान हाल के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विरोधाभासी है।5

2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 के सेक्शन 73 (3) (बी) की जांच की थी। इस प्रावधान में इंटरमीडियरीज़ से यह अपेक्षा की गई थी कि वे यूजर्स के आग्रह पर कुछ किस्म के कंटेंट को हटाए या उसके एक्सेस को डिसेबल कर दे। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि कंटेंट की मात्रा को देखते हुए इंटरमीडियरीज़ के लिए यह मुश्किल होगा कि वे प्रत्येक आइटम की वैधता पर फैसला करें। उसने इस प्रावधान की व्याख्या इस तरह की थी कि कंटेंट को तभी हटाया या डिसेबल किया जाए, अगर: (i) न्यायालय या सरकार का आदेश हो, और (ii) आदेश संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के अंतर्गत उल्लिखित रोक (जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था) से संबंधित हो।[5] 

नियमों के मसौदे में इंटरमीडियरीज़ से यह अपेक्षा की गई है कि वे ‘गैरकानूनी कंटेंट’ को चिन्हित करने और उसके एक्सेस को हटाने के लिए ऑटोमेटेड टूल्स विकसित करेंगे। यह शर्त उपरिलिखित प्रावधान के समान है जिसकी व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय ने की थी।

50 लाख से ज्यादा यूजर्स वाले इंटरमीडियरीज़ से पंजीकरण की अपेक्षा

मसौदा नियमों में यह प्रावधान है कि इंटरमीडियरीज़ कंपनी एक्ट, 2013 के अंतर्गत भारत में कंपनी बनाएं। ये वे इंटरमीडियरीज़ हैं, जिनके यूजर्स 50 लाख से ज्यादा हों या जैसा सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए। नियमों में यह अस्पष्ट है कि यूजर्स की संख्या को कैसे कैलकुलेट किया जाएगा। उदाहरण के लिए यूजर्स को अलग-अलग तरीकों से कैलकुलेट किया जा सकता है, जैसे इंटरमीडियरी के प्लेटफॉर्म पर पंजीकृत यूजर्स की संख्या, रोजाना एक्टिव यूजर्स की संख्या या इंस्टॉलेशंस की संख्या। यूजर्स की संख्या को निर्धारित करने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया न होने पर इंटरमीडियरी के लिए यह पता लगाना मुश्किल होगा कि क्या उसने 50 लाख की सीमा पार कर ली है और इसलिए उसके लिए भारत में कंपनी बनाना जरूरी है।

 

[1].  G.S.R. 314(E)., The Gazette of India, April 11, 2011, http://meity.gov.in/writereaddata/files/GSR314E_10511%281%29_0.pdf

[2].  Official Debates, Rajya Sabha, July 26, 2018, http://164.100.47.5/official_debate_hindi/Floor/246/F26.07.2018.pdf.   

[3].  The draft IT (Intermediary Guidelines (Amendment) Rules) dated December 24, 2018, http://meity.gov.in/writereaddata/files/Draft_Intermediary_Amendment_24122018.pdf.  

[4].  Secy., Ministry of Information & Broadcasting, Govt. of India v. Cricket Assn. of Bengal 1995 AIR 1236.

[5].  Shreya Singhal vs. Union of India AIR 2015 SC 1523.

 

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