मंत्रालय: 
विधि एवं न्याय
  • प्रस्तावित
    राज्यसभा
    फ़रवरी 19, 2014
    Gray
  • रेफर
    स्टैंडिंग कमिटी
    फ़रवरी 26, 2014
    Gray
  • रिपोर्ट
    स्टैंडिंग कमिटी
    फ़रवरी 26, 2015
    Gray
  • वापस लिए गए
    राज्यसभा
    अप्रैल 11, 2017
    Gray

बिल की मुख्य विशेषताएँ

  • ट्रिब्यूनल, अपीलीय ट्रिब्यूनल व अन्य प्राधिकरण (सेवा की शर्तें) बिल, 2014, 26 ट्रिब्यूनलों व प्राधिकारणों के अध्यक्षों व सदस्यों के लिए सेवा की एकसमान शर्तों को स्थापित करने का प्रयास करता है।
  • सेवा की इन शर्तों में बिल द्वारा ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों व सदस्यों के लिए कार्यकाल, पुनर्नियुक्ति, सेवानिवृत्ति की आयु, भत्ता, व छुट्टी की हकदारी शामिल हैं।
     
  • यह बिल उन अध्यक्षों व सदस्यों के लिए सेवानिवृत्ति आयु तय करता है जो: (i) 70 वर्ष की आयु वाले सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व जज हों; (ii) 67 वर्ष की आयु वाले भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश या हाई कोर्ट के जज हों; और (iii) 65 वर्ष की आयु वाले अन्य व्यक्ति।
     
  • यह बिल सदस्यों को ट्रिब्यूनल में नियुक्ति की अवधि समाप्त होने पर उसके समक्ष पेश होने से रोकता है।
  • अगर अध्यक्ष या सदस्य के रूप में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज ट्रिब्यूनल में शामिल हों तो बिल के दायरे में अन्य ट्रिब्यूनलों को शामिल किया जा सकता है।

प्रमुख मुद्दे व विश्लेषण

  • यह बिल सदस्यों की पुनर्नियुक्ति की अनुमति देता है। ऐसा करने से ट्रिब्यूनल की स्वतंत्रता उन मामलों में प्रभावित हो सकती है जहां सरकार उसके समक्ष वादी हो, तथा उसके सदस्यों की पुनर्नियुक्ति का अधिकार भी उसके पास हो।
     
  • मंत्री अध्यक्ष की छुट्टी की व अध्यक्ष तथा सदस्यों की विदेश यात्रा की मंजूरी देंगे। ऐसे प्रशासनिक मसलों में सरकार की भागीदारी सदस्यों की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है।
     
  • यह बिल ट्रिब्यूनल के सदस्यों के लिए अतीत में उनकी नियुक्ति के आधार पर सेवानिवृत्ति की अलग-अलग आयु का उल्लेख करता है। एक ही ट्रिब्यूनल पर सेवा के योग्य सदस्यों के बीच ऐसे अंतर के पीछे का मूल कारण असपष्ट है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन भी कर सकता है।
     
  • बिल के भीतर अन्य ट्रिब्यूनल शामिल करने के लिए, उनके अध्यक्ष या सदस्य उच्च न्यायालयों के जज होने चाहिए। हालांकि, वर्तमान में बिल के दायरे में आने वाले कुछ ट्रिब्यूनल इस शर्त को पूरा नहीं करते हैं।
     
  • यह बिल निम्न मुद्दों पर ध्यान नहीं देता है: क) ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत हुए एंटरप्राइज़ के साथ ट्रिब्यूनल के सदस्य के रूप में अवधि समाप्त होने के बाद नौकरी पर रोक; ख) सदस्यों को हटाने के कारण; और ग) उपाध्यक्ष की सेवा की शर्तें।

भाग अ: बिल की मुख्य विशेषताएँ[1]

संदर्भ

ट्रिब्यूनल अर्ध न्यायिक निकाय होते हैं, जिनकी स्थापना कानून के तहत उस कानून या प्रशासनिक कानून के अंतर्गत मामलों से उत्पन्न होने वाले विवादों पर निर्णय लेने के लिए आमतौर पर की जाती है। ट्रिब्यूनलों को विशेष मामलों पर शीघ्र न्याय प्राप्त करने के उद्देश्य से बनाया गया था।[2] उदाहरण के लिए, केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के सेवा संबंधित मामलों से जुड़े विवादों का निपटारा करने के लिए की गई थी। आयकर जैसे कुछ विशेष मामलों से उत्पन्न होने वाले विवादों पर आयकर अपीलीय प्राधिकरण द्वारा निर्णय लिया जाता है। 

आमतौर पर, ट्रिब्यूनल बनाने वाला अधिनियम उसके संयोजन, उसके सदस्यों की योग्यता, कार्य, हटाने के कारण आदि का उल्लेख भी करता है। अधिनियम या उसके नियमों में उस ट्रिब्यूनल के सदस्यों की सेवा की शर्तों का निर्धारण किया जाता है। वर्तमान में, सेवा की शर्तें अलग-अलग ट्रिब्यूनल में भिन्न हैं।6

2009 में, लॉ कमीशन की 232वीं रिपोर्ट ने सभी ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों व सदस्यों के लिए सेवानिवृत्ति आयु में समानता लाने का सुझाव दिया था।[3] 2012 में, राजीव गर्ग मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विभिन्न ट्रिब्यूनलों के सदस्यों की विभिन्न सेवा की शर्तों की अनुमति का प्रश्न लाया गया था। सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया था कि ट्रिब्यूनलों के सदस्यों की एकसमान सेवा की शर्तों के मामले का निपटारा सरकार के सर्वोच्च स्तर पर किया जाएगा।[4]

ट्रिब्यूनल, अपीलीय ट्रिब्यूनल व अन्य प्राधिकरण (सेवा की शर्तें) बिल, 2014 को फरवरी 2014 में संसद में पेश किया गया था। उसे सितंबर 2014 में स्थायी समिति के पास विचारार्थ भेजा गया था। यह बिल राष्ट्रीय ट्रिब्यूनलों व अन्य प्राधिकारणों के अध्यक्षों व सदस्यों के लिए सेवा की एकसमान शर्तों को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। 

मुख्य विशेषताएँ

यह बिल ट्रिब्यूनलों, अपीलीय ट्रिब्यूनलों व प्राधिकारणों के अध्यक्षों व सदस्यों के लिए सेवानिवृत्ति आयु, नियुक्ति अवधि, पुनर्नियुक्ति, व भत्ते से संबंधित सेवा की एकसमान शर्तों को प्रदान करने का प्रयास करता है। 

बिल का दायरा

  • इस बिल के दायरे में पहली अनुसूची में निर्दिष्ट 26 ट्रिब्यूनल, अपीलीय ट्रिब्यूनल व अन्य प्राधिकारण आते हैं।
     
  • इनमें कंपनी लॉं बोर्ड, केंद्रीय/राज्य/संयुक्त प्रशासनिक ट्रिब्यूनल, आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल, सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल व बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड जैसे ट्रिब्यूनल व अपीलीय ट्रिब्यूनल शामिल हैं।
     
  • बिल में शामिल अन्य प्राधिकारणों में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, अग्रिम विनिर्णय प्राधिकरण, व तटीय जलकृषि प्राधिकरण शामिल हैं।
     
  • केंद्र सरकार ऐसे ट्रिब्यूनलों को शामिल करने के लिए पहली अनुसूची में संशोधन कर सकती है जिसमें अध्यक्ष या सदस्य के रूप में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के सेवारत या सेवानिवृत्त जज शामिल हो।

कार्यकाल

  • प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल पाँच वर्ष होगा और वह एक और कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्ति के योग्य होगा, अगर वह सेवानिवृत्ति की आयु तक नहीं पहुंचा हो।
     
  • ट्रिब्यूनल के सदस्यों की सेवानिवृत्ति की आयु : (क) भूतपूर्व सुप्रीम कोर्ट जज के लिए 70 वर्ष है, (ख) हाई कोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश या जज के लिए 67 वर्ष है, और (ग) अन्य व्यक्ति के लिए 65 वर्ष है।

मध्यस्थता व प्रैक्टिस करने की मनाही

  • किसी भी सदस्य के लिए किसी भी मामले में मध्यस्थ के रूप में काम करने की मनाही होगी।
     
  • कोई भी सदस्य किसी ऐसे ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत या विनती नहीं करेगा जिसका वह भूतपूर्व अध्यक्ष या सदस्य हो।

भत्ता, अन्य लाभ, छुट्टी व मंज़ूर करने का अधिकार

  • यह बिल अध्यक्षों व सदस्यों के लिए पेंशन, छुट्टी, भत्ते व चिकित्सा लाभ का मानकीकरण करता है। दूसरी व तीसरी अनुसूची में क्रमशः भत्ते व यात्रा भत्ते का उल्लेख किया गया है।
     
  • अध्यक्ष अपने ट्रिब्यूनल के सदस्यों की छुट्टी को मंजूरी देगा। संबंधित मंत्रालय के मंत्री निम्न की मंजूरी देंगे: क) अध्यक्ष की छुट्टी; ख) अध्यक्ष की अनुपस्थिति में सदस्यों की छुट्टी; व ग) अध्यक्ष व सदस्यों की विदेश यात्रा।

भाग ब: प्रमुख मुद्दे व विश्लेषण

ट्रिब्यूनलों के कामकाज में कार्यपालिका की भूमिका

एक और कार्यकाल के लिए अध्यक्षों व सदस्यों की पुनर्नियुक्ति

इस बिल में ट्रिब्यूनलों के सदस्यों के लिए पाँच वर्ष के कार्यकाल का प्रावधान है। आगे, यह एक और कार्यकाल के लिए उनकी पुनर्नियुक्ति की अनुमति देता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि पुनर्नियुक्ति का प्रावधान पहले कार्यकाल के दौरान सदस्यों के कामकाज की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।

ट्रिब्यूनल अर्ध न्यायिक निकाय होते हैं, जबकि सरकार कार्यपालिका का हिस्सा होती है। ऐसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं जहां सरकार केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) या आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल (ITAT) जैसे ट्रिब्यूनल के समक्ष एक वादी हो। अगर सरकार के ट्रिब्यूनल के समक्ष वादी होने के साथ-साथ उसके पास उसके सदस्यों की पुनर्नियुक्ति का निर्धारण करने का अधिकार हो तो हितों में टकराव होगा।

सितंबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल टैक्स ट्रिब्यूनल (NTT) के सदस्यों की पुनर्नियुक्तियों के मुद्दे की जांच की थी। उसने यह माना था कि पुनर्नियुक्ति का प्रावधान सदस्यों की स्वतंत्रता को समाप्त कर देगा। उसने यह तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल का सदस्य ऐसे मामलों पर निर्णय लेने में विवश महसूस करेगा जो उसकी पुनर्नियुक्ति को प्रभावित करते हों। [5]

ट्रिब्यूनलों या अन्य प्राधिकारणों के अध्यक्षों की छुट्टी के लिए मंज़ूरी का अधिकार

यह बिल स्पष्ट करता है कि ट्रिब्यूनलों के अध्यक्ष के लिए छुट्टी की मंजूरी का अधिकार संबंधित मंत्रालय के पास रहेगा। वह मंत्री ट्रिब्यूनलों के अध्यक्ष व सदस्यों की विदेश यात्रा की मंज़ूरी भी देगा। छुट्टी की मंजूरी व विदेश यात्रा जैसे प्रशासनिक मामलों में कार्यपालिका के शामिल होने से ट्रिब्यूनलों के सदस्यों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

NTT पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने NTT के कामकाज में कार्यपालिका की भूमिका की जांच की थी। उसने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार का NTT या उसके सदस्यों के साथ किसी प्रकार प्रशासनिक संपर्क सही नहीं होगा क्योंकि ऐसा करने से NTT की स्वतंत्रता व सदस्यों की निष्पक्षता पर अतिक्रमण होगा।5

वर्तमान में, भारत के राष्ट्रपति के पास CAT, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), व दूरसंचार विवाद निपटान व अपीलीय ट्रिब्यूनल (TDSAT) सहित कुछ अन्य ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों की छुट्टी की मंज़ूरी का अधिकार है।[6] हालांकि, आमतौर पर ऐसा प्रचालन में नहीं है, उदाहरण के लिए, प्रतिस्पर्धा अपीलीय ट्रिब्यूनल (CompAT) का मामला जहां कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री अध्यक्ष की छुट्टी की मंज़ूरी देते हैं।[7]

ट्रिब्यूनलों या अन्य प्राधिकारणों के सदस्यों की सेवानिवृत्ति की आयु

यह बिल ट्रिब्यूनल के सदस्यों के लिए उनकी पूर्व नियुक्ति के आधार पर सेवानिवृत्ति की अलग-अलग आयु का उल्लेख करता है।  एक सदस्य के लिए सेवानिवृत्ति की आयु जो: क) भूतपूर्व SC जज हो, 70 वर्ष होगी, ख) HC के मुख्य न्यायाधीश या जज हों, 67 वर्ष होगी, व ग) अन्य किसी व्यक्ति के लिए 65 वर्ष होगी। यह स्पष्ट नहीं है क्यों यह बिल ट्रिब्यूनल के सदस्यों की अतीत की नियुक्ति के आधार पर उनमें अंतर करता है।

साथ ही, यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन कर सकता है। वह अनुच्छेद व्यक्तियों के बीच असामान्य बर्ताव की अनुमति केवल तभी देता है जब ऐसा करना लोक हित में हो। हालांकि, अतीत में उनकी नियुक्ति के आधार पर उनके बीच अंतर करने से किसी प्रकार के लोक हित का कोई उदाहरण मौजूद नहीं है।

वर्तमान में, NGT व सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल (AFT) इस बिल के समान ही अपने सदस्यों के लिए उनके द्वारा अतीत में उनकी नियुक्ति के आधार पर सेवानिवृत्ति की भिन्न आयु का उल्लेख करते हैं।[8] 

अपनी 232वीं रिपोर्ट में, विधि आयोग, भारत (2009) ने सुझाव दिया था कि सभी ट्रिब्यूनलों के : (i) अध्यक्षों की सेवानिवृत्ति आयु को एकसमान 70 वर्ष, व (ii) सदस्यों की सेवानिवृत्ति आयु को एकसमान 65 वर्ष कर दिया जाए।3 2013 में, वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग द्वारा पेश किए गए भारतीय वित्तीय संहिता मसौदे (IFC) में सुझाव दिया गया था कि IFC के तहत अपीलीय ट्रिब्यूनल के अध्यक्षों व सदस्यों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु को एकसमान 70 वर्ष कर दिया जाए।[9]

बिल के दायरे के अंदर कुछ विशेष ट्रिब्यूनलों का शामिल किया जाना

यह बिल स्पष्ट करता है कि केंद्र सरकार बिल की पहली अनुसूची में एक ट्रिब्यूनल, अपीलीय ट्रिब्यूनल या प्राधिकरण केवल तभी जोड़ सकती है अगर उसमें अध्यक्ष या सदस्य के रूप में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट का कोई सेवारत या सेवानिवृत्त जज शामिल हो। हालांकि, बिल की पहली अनुसूची में शामिल 26 ट्रिब्यूनलों में से, कुछ निकाय इन मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। 

उदाहरण के लिए, CAT, जो 26 ट्रिब्यूनलों में से एक है, दो वर्ष का अनुभव प्राप्त उपाध्यक्ष को अध्यक्ष बनने की अनुमति देता है। इसके अलावा, उस पद की योग्यता के लिए उपाध्यक्ष क केवल एक निश्चित अवधि तक सरकारी कर्मचारी होना आवश्यक है। कुछ अन्य ट्रिब्यूनल जैसे साइबर अपीलीय ट्रिब्यूनल (CbAT) व ऋण वसूली अपीलीय ट्रिब्यूनल (DRAT)  हाई कोर्ट जज के रूप में योग्यता प्राप्त व्यक्ति को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने की अनुमति देते हैं। इन सभी मामलों में, बिल में लिखित मानदंड लागू नहीं होते हैं।

वे मामले जिनका उल्लेख बिल में नहीं किया गया है

यह बिल सभी 26 ट्रिब्यूनलों में सेवा की एकसमान शर्तों के प्रावधान का प्रयास करता है। इसमें कार्यकाल, सेवानिवृत्ति की आयु, छुट्टी, भत्ता आदि शामिल हैं। हालांकि, इसमें नीचे बताए कुछ विशेष मामलों का उल्लेख नहीं किया गया है। 

  • रोज़गार पर कार्यकाल की समाप्ति के बाद वे प्रतिबंध जिनके कारण हितों के टकराव की संभावना हो: यह बिल सदस्यों को ऐसे ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत होने या प्रैक्टिस करने से प्रतिबंधित करता है जहां उनकी नियुक्ति का कार्यकाल समाप्त हो चुका हो। हालांकि, बिल में यह स्पष्ट नहीं है कि क्या किसी ट्रिब्यूनल के सदस्य ऐसे किसी एंटरप्राइज़ में अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद नौकरी कर सकते हैं जो उनकी नियुक्ति के दौरान उस ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश हुआ हो। ट्रिब्यूनल में काम करने के तुरंत बाद ऐसे किसी एंटरप्राइज़ में सेवानिवृति पश्चात नौकरी करने देने की अनुमति उनके कार्यकाल के दौरान सदस्यों की निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।  
  • वर्तमान में, NGT CompAT के सदस्यों के लिए ट्रिब्यूनल में काम करने के बाद दो वर्ष के लिए ऐसी किसी कंपनी या संस्थान से जुड़े किसी व्यक्ति द्वारा नियुक्त करने की मनाही है जो उसके समक्ष पेश हुआ हो। AFT CAT के अध्यक्ष आगे किसी सरकारी नौकरी को करने के अयोग्य होते हैं।[10] 
  • अध्यक्षों व सदस्यों को हटाने के कारण: इस बिल में ऐसे किसी कारण का प्रावधान नहीं है जिसके तहत सदस्यों को पद से हटाया जा सके। वर्तमान में, अलग-अलग ट्रिब्यूनलों में सदस्यों को हटाने के कारण भिन्न हैं। कुछ विशेष ट्रिब्यूनल जैसे CAT, SAT, AFT IPAB स्पष्ट करते हैं कि सदस्यों को दुर्व्यवहार या अक्षमता सिद्ध होने पर हटाया जा सकता है।[11] हालांकि, कुछ अन्य जैसे NGT TDSAT में हटाने के लिए पाँच कारण तय किए गए हैं: (i) दिवालियापन; (ii) नैतिक अधमता के लिए सजा; (iii) शारीरिक या मानसिक अक्षमता; (iv) ऐसे हितों को धारण करना जो उसके कामकाज के प्रतिकूल हों; या (v) लोक हित के विरुद्ध अपने ओहदे का दुरुपयोग।
  • उपाध्यक्ष की सेवा की शर्तें: कुछ विशेष ट्रिब्यूनल जैसे CLB, AFT, CAT, ITAT आदि में उपाध्यक्ष के पद का प्रावधान होता है, जिनकी योग्यता अन्य सदस्यों से अलग हो।[12] बिल में इस पद के लिए सेवा की एकसमान शर्तों का प्रावधान नहीं है।

 

Notes

[1].  This Brief has been written on the basis of the Tribunals, Appellate Tribunals and other Authorities (Conditions of Service) Bill, 2014 which was introduced in the Rajya Sabha on February 19, 2014. 

[2].  Union of India vs. R. Gandhi, President, Madras Bar Association, (2010) 11 SCC 1.

[3].  “Retirement age of Chairpersons and Members of Tribunals – Need for uniformity” Report No. 232, Law Commission of India, August 22, 2009, http://lawcommissionofindia.nic.in/reports/report232.pdf.

[4].  Rajiv Garg vs. Union of India, (Civil Writ Petition No. 120 of 2012), February 8, 2013.

[5].  Madras Bar Association vs. Union of India, Transfer Case No. 150 of 2006, Supreme Court of India, September 25, 2014.

[6]CAT: S. 7, The CAT (Salaries & Conditions of service) Rules, 1985; NGT: S. 8 (5), NGT (Conditions of Service and Procedure for Inquiry) Rules, 2010; TDSAT: S. 4, TDSAT (Salaries and other Conditions of Service) Rules, 2000.

[7].  S. 8, Competition Appellate Tribunal (Salaries and Allowances and Other Terms and Conditions of Service) Rules, 2009.

[8]CLB: S. 8, CLB (Qualifications and other conditions of service of members) Rules, 1993; NGT: S. 7, The National Green Tribunal Act, 2010; AFT: S.8, Armed Forces Tribunal Act, 2007.

[9].  S. 423 (1), Indian Financial Code: Draft Law, Report of the Financial Sector Legislative Reforms Code, Vol. 2, 2013, http://finmin.nic.in/fslrc/fslrc_report_vol2.pdf.

[10]CAT: S. 6, The Administrative Tribunals Act, 1985; CbAT: S. 50, The Information Technology Act, 2000; DRAT: S.10, The Recovery of Debts due to Banks and Financial Institutions Act, 1993.

[11]CAT: S. 9, The Administrative Tribunals Act, 1985; SAT: S.15Q (2), The Securities and Exchange Board of India Act, 1992; AFT: S. 9, Armed Forces Tribunal Act, 2007; IPAB: S. 89 (2), The Trade Marks Act, 1999.

[12]NGT: S. 5(4), The National Green Tribunal Act, 2010; CompAT: S. 53L, Competition Act, 2002; AFT: S. 11 (a), Armed Forces Tribunal Act, 2007; CAT: S. 11, The Administrative Tribunals Act, 1985.

  1. 12. CAT: S. 9, The Administrative Tribunals Act, 1985; SAT: S.15Q (2), The Securities and Exchange Board of India Act, 1992; AFT: S. 9, Armed Forces Tribunal Act, 2007; IPAB: S. 89 (2), The Trade Marks Act, 1999.
  2. 13. NGT: 10, The NGT Act, 2010; TDSAT: S. 14 G, TRAI Act, 1997.
  3. 14. CLB: S.8, Company Law Board (Qualifications, and other conditions of service of members) Rules, 1993; CAT: S.6, The Administrative Tribunals Act, 1985; ITAT: S. 252 (4), The Income Tax Act, 1961.

 

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेज़ी में तैयार की गयी थी। हिन्दी में इसका अनुवाद किया गया है। हिन्दी रूपान्तर में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेज़ी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है