मंत्रालय: 
महिला एवं बाल कल्याण
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    अगस्त 12, 2014
    Gray
  • रेफर
    स्टैंडिंग कमिटी
    सितंबर 19, 2014
    Gray
  • रिपोर्ट
    स्टैंडिंग कमिटी
    फ़रवरी 25, 2015
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    मई 07, 2015
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    मई 07, 2015
    Gray

बिल की मुख्य विशेषताएँ

  • यह बिल जुवेनाइल जस्टिस  केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन एक्ट  2000 का स्थान लेता है।  यह बिल उन बच्चों से संबंधित है जिन्होने कानूनन कोई अपराध किया हो और जिन्हें देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता हो। 
     
  • यह बिल जघन्य (हेनस) अपराधों में लिप्त 16-18 वर्ष की आयु के बीच के किशोरों (जुवेनाइल) के ऊपर बालिगों के समान मुकदमा चलाने की अनुमति देता है। साथ ही, कोई भी 16-18 वर्षीय जुवेनाइल, जिसने कम जघन्य (हेनस) अर्थात गंभीर (सीरियस) अपराध किया हो, उसके ऊपर बालिग के समान केवल तभी मुकदमा चलाया जा सकता है जब उसे 21 वर्ष की आयु के बाद पकड़ा गया हो।
     
  • प्रत्येक जिले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) और बाल कल्याण समितियों (सीडब्ल्यूसी) का गठन किया जाएगा। जेजेबी एक प्रारंभिक जाँच क बाद यह निर्धारित करेगाि जुवेनाइल अपराधी को पुनर्वास के लिए भेजा जाए या एक बालिग के रूप मुकदमा चलाया जाए। सीडब्ल्यूसी देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए संस्थागत देखभाल का निर्धारण करेगी।
     
  • बिल में गोद लेने के लिए माता-पिता क योग्यता और गोद लेने क पद्धति को शामिल किया गया है।
     
  • बच्चे के विरुद्ध अत्याचार, बच्चे को नशीला पदार्थ देना, और बच्चे का अपहरण या उसे बेचने के बारे में दंड निर्धारित किया गया है।

प्रमुख मुद्दे व विश्लेषण

  • जुवेनाइल के ऊपर बालिगों के समान मुकदमा चलाया जाना चाहिए इसे लेकर विभिन्न मत हैं। कुछ लोगों का तर्क है कि मौजूदा कानून जघन्य (हेनस) अपराध करने वाले जुवेनाइल को हतोत्साहित नहीं करता है। एक अन्य मत यह है कि सुधारात्मक दृष्टिकोण अपराध दोहराने की संभावना को कम करेगा।
     
  • एक सीरियस या जघन्य (हेनस) अपराध करने वाले जुवेनाइल के ऊपर पकड़े जाने की तिथि के आधार पर बालिग के रूप में मुकदमा चलाने का प्रावधान अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (यह आवश्यकता कि कानून और पद्धतियाँ निष्पक्ष और उचित हों) का उल्लंघन कर सकता है। 21 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति को पकड़ने पर एक ही अपराध के लिए ज़्यादा दंड दे कर, यह प्रावधान अनुच्छेद 20(1) की भावना का विरोध भी करता है। 
     
  • बाल अधिकारों के ऊपर यूएन सम्मेलन सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों के लिए 18 वर्ष की आयु से कम के प्रत्येक बच्चे को समान मानने की आवश्यकता रखता है। एक बालिग के रूप में जुवेनाइल पर मुकदमा चलाना सम्मेलन का उल्लंघन करता है।
     
  • बिल में दिए गए कुछ दंड अपराध की गंभीरता के अनुपात में नहीं हैं। उदाहरण के लिए, बच्चा बेचने के लिए दिये जाने वाल दंड बच्चे को नशीले या मादक पदार्थ देने के लिए दिये जाने वाले दंड की तुलना में कम है।
     
  • बिल की जाँच कर रही स्थायी समिति ने कहा है कि बिल जुवेनाइल से संबंधित अपराधों से जुड़े गलत आँकड़ों पर आधारित था और संविधान के कुछ विशेष प्रावधानों का उल्लंघन करता है।

भाग अ: बिल की मुख्य विशेषताएँ[1]

संदर्भ

तालिका 1 : आईपीसी के तहत पकड़े गए 16-18 वर्ष की आयु के जुवेनाइल

अपराध

2003

2013

चोरी

1,160

2,117

बलात्कार

293

1,388

अपहरण

156

933

डकैती

165

880

हत्या

328

845

अन्य अपराध

11,839

19,641

कुल

13,941

25,804

नोट: अन्य अपराधों में धोखाधड़ी, दंगा, आदि शामिल हैं। स्रोत: बाल अपराधी, भारत में अपराध 2013, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो।

एक जुवेनाइल या बच्चा वह व्यक्ति होता है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम होती है। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 82 के तहत, सात वर्ष वह न्यूनतम आयु है जब किसी व्यक्ति पर अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकता है। जुवेनाइल जस्टिस  केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन एक्ट, 2000 उन बच्चों से  संबंधित है जिन्होने कानूनन अपराध किया हो और वे बच्चे जिन्हें देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता हो[2]। इस एक्ट को बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीआरसी) पालन करने के लिए लाया गया था जिसक 1992 में भारत ने माना । एक हस्ताक्षरकर्ता के रूप में, भारत को जुवेनाइल जस्टिस, देखभाल और संरक्षण, गोद लेने, आदि के संबंध में बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए सभी उपयुक्त उपाय करने की आवश्यकता है।

2011 के जनसंख्या आँकड़ों के अनुसार, सात से 18 वर्ष की आयु के बीच के जुवेनाइल कुल जनसंख्या का लगभग 25% थे[3]। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2003 से 2013[4] तक कुल अपराधों के अनुपात में बाल अपराध 1% से बढ़कर 1.2% हो गए हैं। इसी अवधि के दौरान, सभी अपराधों में आरोपित जुवेनाइल के प्रतिशत के रूप में अपराधों के आरोपित 16-18 वर्ष जुवेनाइल का प्रतिशत 54% से बढ़कर 66% हो गया था। 16-18 वर्ष की आयु के समूह में जुवेनाइल द्वारा किए गए अपराधों की किस्में तालिका 1 में दिखाए अनुसार भिन्न हैं।    

वर्षों से ही, न्यायालयों ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000 के तहत अपराध करने वाले जुवेनाइल से संबंधित मामलों को देखा है और एक्ट के कार्यान्वयन, कठोर दंड, आदि से जुड़े मामलों के संबंध में एक्ट की समीक्षा का सुझाव दिया है।[5],10

जुवेनाइल द्वारा किए जाने वाले अपराधों, संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों, उनके पुनर्वास और गोद लेने प्रक्रिया, आदि क तय करने के लिए जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन) बिल 2014 को 12 अगस्त 2014 को लोक सभा में पेश किया गया था ।

मुख्य विशेषताएँ

  • इस बिल द्वारा जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) एक्ट, 2000 को बदलने का प्रयास किया गया है।

बाल अपराधी

  • बाल अपराधियों से निपटने के लिए प्रत्येक जिले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) का गठन किया जाएगा। उनमें एक मेट्रोपॉलिटन या ज्यूडिशियल (न्यायिक) मजिस्ट्रेट और एक महिला सहित दो सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होंगे।
  • जुवेनाइल द्वारा किए गए अपराधों को निम्न में वर्गीकृत किया जाता है: (i) जघन्य (हेनस) अपराध (जिनमें आईपीसी या अन्य किसी कानून के तहत सात वर्ष के कारावास की न्यूनतम सज़ा मिलती है), (ii) सीरियस अपराध (तीन से सात वर्ष का कारावास), और (iii) मामूली अपराध (तीन वर्ष से कम का कारावास)। किसी जुवेनाइल को छोड़ देने या मृत्युदंड की संभावना के बिना आजीवन कारावास नहीं दिया जा सकता।
  • बिल के तहत, बाल अपराधी को किसी विशेष घर या उचित सुविधा में अधिकतम तीन वर्ष बिताने की ज़रूरत हो सकती है। हालाँकि, 16-18 वर्ष के आयु समूह में आने वाले जुवेनाइल के ऊपर कुछ विशेष मामलों में बालिगों के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति जिसकी आयु 16-18 वर्ष के बीच हो और जिसने जघन्य (हेनस) अपराध किया हो उसके ऊपर एक बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है, पकड़े जाने की तिथि पर ध्यान दिये बिना। साथ ही, 16-18 वर्ष की आयु के बीच का कोई जुवेनाइल जिसने जघन्य अपराध किया हो और जिसे 21 वर्ष की आयु के पश्चात पकड़ा गया हो, उसके ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है।    
  • अन्य सभी मामलों में जुवेनाइल को, जेजेबी द्वारा निर्धारित, संस्थागत देखभाल में तीन वर्ष की अधिकतम सज़ा होगी।
  • जघन्य (हेनस) अपराधों के मामले में, यदि किसी जुवेनाइल को 21 वर्ष की आयु से पहले पकड़ा जाता हो जेजेबी आरंभिक जाँच करेगा। इसके द्वारा अपराध करने और उसके परिणामों की समझ के बारे में उसकी मानसिक/शारीरिक क्षमता का निर्धारण किया जाएगा। जेजेबी तब एक आदेश पारित करेगा जो निम्न का सुझाव देगा: (i) परामर्श या समुदाय सेवा जैसे उपचार; (ii) अस्थायी या लंबे समय के लिए किसी निगरानी घर में रहना; या (iii) जुवेनाइल के ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जाए या नहीं इसका निर्धारण करने के लिए उसे बाल न्यायालय के पास विचारार्थ भेजना।
  • बाल न्यायालय एक सेशंस न्यायालय है जिसे बाल अधिकार संरक्षण के लिए कमीशन एक्ट, 2005 के तहत अधिसूचित किया जाता है। बिल के अनुसार, जेजेबी द्वारा जुवेनाइल को बाल न्यायालय भेजने पर वह निर्धारित करेगा कि उसके ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जाए या उसके लिए परामर्श, निगरानी घर में रहने, आदि का सुझाव दिया जाए।

देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे

  • देखभाल और संरक्षण की ज़रूरत वाले बच्चों के लिए प्रत्येक जिले में सीडब्ल्यूसी का गठन किया जाएगा। उनमें एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य शामिल होंगे जो बच्चों से संबंधित मामलों पर विशेषज्ञ होंगे। चार सदस्यों में से कम से कम एक सदस्य महिला होगी।
  • एक ऐसा बच्च जिसे देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता हो उसे 24 घंटों के अंदर सीडब्ल्यूसी के समक्ष लाया जाएगा। उसके बाद, 15 दिनों के अंदर सामाजिक जाँच रिपोर्ट तैयार करने की आवश्यकता है। रिपोर्ट का आकलन करने के पश्चात, सीडब्ल्यूसी सुझाव दे सकती है कि बच्चे को लंबे समय या अस्थायी देखभाल के लिए बाल घर या अन्य सुविधा में भेजा जाए, या बच्चे को गोद लेने या पालन-पोषण संबंधी देखभाल के लिए दिया जाए।

अपराध और दंड

  • हमला करने, बहिष्कार करने, अभद्रता करने, या जानबूझकर बच्चे के प्रति लापरवाही करने के अपराध के लिए तीन वर्ष तक के कारावास की सज़ा मिलेगी और/या एक लाख रुपये का जुर्माना देना होगा। भीख मंगाने के उद्देश्य के लिए बच्चे को रखने के लिए पाँच वर्ष तक के कारावास और एक लाख रुपये के जुर्माने का दंड दिया जाएगा।
  • एक व्यक्ति जो किसी बच्चे को नशीला या मादक पदार्थ देता है उसे दंड के रूप में सात वर्ष तक का कारावास और एक लाख रुपये तक का जुर्माना देना होगा। किसी उद्देश्य के लिए बच्चे को बेचने या खरीदने के लिए पाँच वर्ष तक का कारावास और एक लाख रुपये का जुर्माना दंड के रूप में दिया जाएगा।

अन्य प्रावधान

  • गोद लेना: केंद्रीय दत्तक-ग्रहण संसाधन एजेंसी गोद लेने पर नियम तैयार करेगी। इन नियमों का कार्यान्वयन राज्य और जिला एजेंसियों द्वारा किया जाएगा। गोद लेने वाले संभावित माता-पिता शारीरिक और वित्तीय रूप से अच्छे होने चाहिए। तलाक़शुदा या अकेला व्यक्ति बच्चे क गोद ले सकता है। अकेला पुरुष बालिका क गोद नहीं ले सकता। बिल में अंतर्देशीय गोद लेने के लिए भी प्रावधान है।
  • संस्थाओं का पंजीकरण: 2000 एक्ट के तहत वैध पंजीकृत बच्चों की देखभाल वाली संस्थाओं क मान्यता जारी रहेगी। अन्य संस्थाओं के लिए इस बिल के लागू होने के छह माह के अंदर पंजीकृत होने की आवश्यकता है। पंजीकरण पाँच वर्ष के लिए वैध है जिसे दोबारा नया करने की आवश्यकता है। जाँच समितियां इन संस्थाओं की जाँच करेंगी और यदि वे निर्धारित मानदंड को पूरा नहीं करत हों तो उनका पंजीकरण रद्द भी किया जा सकता है।  

 

भाग ब: प्रमुख मुद्दे व विश्लेषण

कुछ विशेष प्रकार के अपराधों के आरोपी 16-18 वर्षीय जुवेनाइल के ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है।

कुछ विशेष प्रकार के अपराधों के आरोपी 16-18 वर्षीय जुवेनाइल के ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है। जुवेनाइल के ऊपर बालिगों के समान मुकदमा चला जान को लेकर विभिन्न मत हैं। हाल ही में, बाल अपराध से संबंधित मामले की सुनवाई के समय सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि जुवेनाइल द्वारा किए जाने वाले जघन्य (हेनस) अपराधों में बढ़ोत्तरी के कारण 2000 एक्ट की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है। कानून द्वारा जघन्य (हेनस) अपराध करने से जुवेनाइल को रोकने और पीड़ितों के अधिकारों को सुरक्षित करने की आवश्यकता है। बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों के लिए यह मानना कठिन होता है कि जुवेनाइल को उसके परिणामों के बारे में मालूम नहीं था।[6] हालाँकि, प्रस्तावित बिल की जाँच कर रही स्थायी समिति ने गौर किया कि 16-18 वर्ष की आयु संवेदनशील और महत्वपूर्ण होती है जब अधिक संरक्षण की आवश्यकता होती है।[7] अन्य विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि एक ऐसा आपराधिक न्याय तंत्र जिसका दृष्टिकोण जुवेनाइल अपराधियों के प्रति सुधारात्मक हो और पुनर्वास से संबंध रखता हो बार-बार किए जाने वाले अपराधों के मामले में कमी ला सकता है। वे कहते हैं कि मौजूदा कानून के तहत, पिछले कुछ वर्षों में बाल अपराध में मामूली वृद्धि आई है।[8]

16-18 वर्ष के आयु समूह के साथ व्यवहार में यूएनसीआरसी के साथ गैर-अनुपालन

बिल के अनुसार 16-18 वर्ष की  आयु के बीच कुछ निश्चित जुवेनाइल के ऊपर विशेष अपराधों के संबंध में बालिगों के रूप में मुकदमा चलाने की आवश्यकता है। जैसा भारत ने माना है, और बिल के तर्कों और कारणों के कथन में उल्लिखित है, यह प्रावधान यूएनसीआरसी के साथ अनुरूपता में नहीं है। स्थायी समिति ने गौर किया कि यह बिल यूएनसीआरसी का उल्लंघन करता है क्योंकि यह 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के बीच भेदभाव करता है।7 यूएनसीआरसी कहता है कि हस्ताक्षर करने वाले देशों को 18 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के साथ एक जैसा व्यवहार करना चाहिए और उनके ऊपर बालिगों के समान मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए। इसका सुझाव है कि वे देश जो 16-18 वर्ष की आयु के जुवेनाइल के साथ बालिग अपराधियों के रूप में व्यवहार करते हैं या ऐसा करने का प्रस्ताव रखते हैं, उन्हें बच्चों के प्रति गैर-भेदभाव के सिद्धांत की अनुरूपता में अपने कानून बदलने चाहिए। 

2000 एक्ट को भारत के संदर्भ में यूएनसीआरसी के दिशानिर्देशों क लागू करने के लिए अधिनियमित किया गया था। बिल के विपरीत, 2000 एक्ट यूएनसीआरसी के दिशानिर्देशों का अनुपालन करता है और 18 वर्ष की आयु से नीचे के व्यक्तियों के बीच भेदभाव नहीं करता है।  हालाँकि, कुछ विशेष अपराधों के मामले में, कई अन्य देश जुवेनाइल के ऊपर बालिगों के समान मुकदमा चलाते हैं। अमेरिका के सिवाय, इन सभी देशों ने, यूएनसीआरसी क मंजूरी दी है। अंतिम पेज पर एनेक्सचर में हम बालिगों के रूप में बाल अपराधियों से व्यवहार करने के संबंध में इन देशों में आपराधिक क़ानूनों की तुलना करते हैं।

सीरियस/जघन्य (हेनस) अपराधों के लिए 21 वर्ष की आयु के बाद पकड़ा गया जुवेनाइल

संविधान की धारा 14, 21 और 20(1) का संभावित उल्लंघन

बिल का क्लॉज़ 7 कहता है कि कोई व्यक्ति जिसकी आयु 16-18 वर्ष के बीच हो और जिसने सीरियस (तीन से सात वर्ष के बीच का कारावास) या जघन्य (हेनस) अपराध (न्यूनतम सात वर्ष का कारावास) किया हो, उसके ऊपर एक बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जाएगा यदि उसे 21 वर्ष की आयु के बाद पकड़ा गया हो (बिल के अन्य प्रावधानों के अधीन रहते हुए)। यह प्रावधान संविधान द्वारा गारंटी किए गए कुछ बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है।

अनुच्छेद 14 कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ कानून के सामने समान व्यवहार किया जाना चाहिए। ऐसा माना गया है कि विभिन्न समूह के लोगों के बीच असमान व्यवहार की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है जब ऐसे असमान व्यवहार द्वारा स्पष्ट सार्वजनिक उद्देश्य प्राप्त किया जाना हो। यह बिल पकड़े जाने की तिथि के आधार पर एक जैसे अपराध करने वाले दो बाल अपराधियों के बीच अंतर पैदा करता है। यह स्पष्ट नहीं है पकड़े जाने की तिथि के आधार पर, एक जैसे अपराध करने वाले, दो व्यक्तियों के बीच अंतर कर किस सार्वजनिक उद्देश्य को प्राप्त किया जा रहा है। जानकारी के लिए तालिका 2  देखें:

तालिका 2: सीरियस और जघन्य (हेनस) अपराधों के लिए पकड़े जाने की तिथि के आधार पर अंतर

बाल अपराधी

अपराध की किस्म

आयु जब अपराध किया गया था

पकड़े जाने की तिथि पर आयु

दंड

सीरियस अपराध

17 वर्ष

21 वर्ष से नीचे

विशेष घर में परामर्श या जुर्माना या अधितम 3 वर्ष

सीरियस अपराध

17 वर्ष

21 वर्ष से ऊपर

बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जाएगा; 3-7 वर्ष का कारावास

जघन्य (हेनस) अपराध

17 वर्ष

21 वर्ष से नीचे

मानसिक क्षमता, आदि के आकलन के आधार पर, बच्चे (अधिकतम 3 वर्ष) या बालिग (7 वर्ष से अधिक) के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है

जघन्य (हेनस) अपराध

17 वर्ष

21 वर्ष से ऊपर

बालिग के रूप मे मुकदमा चलाया जाएगा; 7 वर्ष और अधिक का कारावास

स्रोत: जुवेनाइल जस्टिस बिल, 2014; पीआरएस।

जैसा कि देखा जा सकता है, एक ही प्रकार के सीरियस अपराध के मामले में, जुवेनाइल क और ख को पकड़े जाने की तिथि के आधार पर अलग तरह से मुकदमा चलाया जाएगा।  जुवेनाइल क पर बच्चे के रूप में मुकदमा चलाया जाएगा और जुवेनाइल ख के ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जाएगा।  जघन्य (हेनस) अपराधों के मामले में, प्रारंभिक जाँच के अधीन रहते हुए ग के ऊपर एक बालिग के अनुसार मुकदमा चलाया जाएगा, जो उस जुवेनाइल की मानसिक/शारीरिक क्षमता और उस अपराध, आदि के परिणामों को समझने की क्षमता का निर्धारण करती है।  दूसरी ओर, उसी अपराध के लिए, जुवेनाइल घ के ऊपर बिना प्रारम्भिक जाँच की प्रक्रिया के एक बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जाएगा।  प्रश्न यह है कि क्या क और ख जुवेनाइल के बीच, और ग और घ जुवेनाइल के बीच केवल पकड़े जाने की तिथि के आधार पर अंतर, संविधान की धारा 14 की आवश्यकताओं को संतुष्ट करेगा।

अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि कानून द्वारा स्थापित पद्धति के सिवाय किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या निजी स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता है । न्यायालयों ने व्याख्या करके कहा है कि कोई भी स्थापित कानून या पद्धति निष्पक्ष और उचित होनी चाहिए।[9] पकड़े जाने की तिथि पर आधारित यह अंतर इसका उल्लंघन  हो सकता है।

जुवेनाइल की आयु और परिणामस्वरूप दंड का निर्धारण करते समय (2000 एक्ट और पहले के 1986 एक्ट के तहत) सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने 2005 में निर्णय लिया कि अपराध करने की तिथि महत्वपूर्ण होती है, पकड़े जाने की तिथि नहीं।[10]  बिल का ऊपर उल्लिखित प्रावधान संविधान बेंच के इस निर्णय से विपरीत है, और जुवेनाइल को देने वाले दंड पर निर्णय लेते समय पकड़े जाने की तिथि पर विचार करता है।   

संविधान क अनुच्छेद 20(1) कहता है कि व्यक्ति को दिया जाने वाला दंड, अपराध करने के समय पर लागू कानून के तहत दिये जाने वाले दंड से अधिक नहीं हो सकता। बिल के तहत, यदि 16-18 वर्ष की आयु के बीच का जुवेनाइल अपराध करता है और बाद की तिथि पर पकड़ा जाता है, उसे दिया जाने वाला दंड अधिक हो सकता है उस परिस्थिति की तुलना में यदि अपराध करने के समय उसे पकड़ लिया गया होता।  यह प्रावधान अनुच्छेद 20(1) से प्रत्यक्ष रूप से विपरीत नहीं है क्योकि बिल का प्रावधान पूर्वव्यापी नहीं होता।  हालाँकि, यदि अनुच्छेद 20(1) की भावना यह है कि किसी व्यक्ति को अपराध करने के समय दिये जाने वाले दंड से अधिक दंड नहीं दिया जाना चाहिए, तब बिल द्वारा यह लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा रहा है।   

अपराधों का वर्गीकरण और उनके लिए नियत दंडों का अनुपात

बिल में विभिन्न अपराधों के लिए दंडों के बारे में बताया गया है जैसे बच्चे को नशीला पदार्थ देना, बच्चे को भीख मांगने के लिए नौकरी पर रखना, आदि। ऐसा तर्क दिया जा सकता है कि बिल के तहत निर्धारित दंड अपराधों के वर्गीकरण के अनुपात में नहीं हैं।  उदाहरण के लिए, किसी बच्चे को तंबाकू उत्पाद या शराब देने के लिए व्यक्ति को दी जाने वाले सज़ा और जुर्माना बच्चे की तस्करी में लिप्त व्यक्ति को दी जाने वाली सज़ा और जुर्माने से अधिक है। जानकारी के लिए तालिका 3 देखें:

तालिका 3: 2014 बिल के तहत अपराधों के लिए नियत दंडों की तुलना

अपराध

2014 बिल में निर्धारित दंड

बच्चे को कोई मादक शराब/ नशीली ड्रग/ तंबाकू/ नशीले पदार्थ देना

कारावास: सात वर्ष तक; जुर्माना: एक लाख रुपये तक

बच्चे को बेचना या खरीदना

कारावास: पाँच वर्ष तक; जुर्माना: एक लाख रुपये

बच्चे को अत्याचार के अधीन करना

कारावास: तीन वर्ष तक; जुर्माना: और/या एक लाख रुपये

बच्चे से भीख मँगवाने के लिए नौकरी पर रखना

कारावास: पाँच वर्ष तक; जुर्माना: एक लाख रुपये

स्थायी समिति की मुख्य टिप्पणियाँ और सुझाव

मानव संसाधन पर स्थायी समिति ने 25 फरवरी, 2015 को बिल पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। मुख्य विशेषताओं में निम्न शामिल हैं7:

  • संविधानात्मक प्रावधान: समिति ने ध्यान दिया कि 2000 एक्ट 16-18 वर्ष के व्यक्तियों की संवेदनशील आयु को मान्यता देता है और प्रकृति में यह सुधारात्मक और पुनर्वास से संबंध रखता है। जुवेनाइल को बालिग न्यायिक तंत्र के अधीन करना संविधान के अनुच्छेद 14 (16-18 वर्षीय व्यक्तियों से असमान व्यवहार) और 15(3) (बच्चों को संरक्षण देने के उद्देश्य के विरुद्ध) के सिद्धांतों के विरुद्ध जाना होगा। यह भी कहा गया है कि यह बिल संविधान के अनुच्छेद 20(1) और 21 के उल्लंघन में था।
  • एनसीआरबी आँकड़े: बिल पेश करने के उद्देश्यों में से एक है 16-18 वर्षीय व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले जघन्य (हेनस) अपराधों में वृद्धि। समिति ने बताया कि एनसीआरबी द्वारा संकलित ये आँकड़े भ्रामक हैं क्योंकि ये दर्ज की एफआईआर पर आधारित हैं वास्तविक दोषसिद्धि पर नहीं।
  • कार्यान्वयन: समिति ने गौर किया कि एक्ट का कार्यान्वयन सही से नहीं किया जा रहा है। यह सुझाव दिया गया है कि सभी एजेंसियों द्वारा तंत्रों और पद्धतियों का बेहतर कार्यान्वयन और एकसमान स्थापन हो। 

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000 और प्रस्तावित बिल की तुलना

तालिका 4: जुवेनाइल जस्टिस बिल, 2014 के साथ जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000 की तुलना

प्रावधान

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000

जुवेनाइल जस्टिस बिल, 2014

जुवेनाइल के साथ व्यवहार

18 वर्ष से कम आयु के बच्चों से समान रूप से व्यवहार किया जाए। जुवेनाइल द्वारा अपराध के लिए अधिकतम दंड तीन वर्ष है।

सीरियस या जघन्य (हेनस) अपराध करने वाले 16-18 वर्ष के बीच की आयु के जुवेनाइल के ऊपर बालिगों के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है।  हालाँकि, कोई मृत्यु दंड या आजीवन कारावास नहीं दिया जाएगा।

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड

जाँच का आयोजन करता है और जुवेनाइल को अधिक से अधिक तीन वर्ष की अवधि के लिए किसी उचित संस्था में जुवेनाइल को रखने का निर्देश देता है।

जेजेबी द्वारा एक प्रारंभिक जाँच जोड़ता है, कुछ विशेष मामलों में यह निर्धारित करने के लिए कि बच्चे को घर में रखा जाए या बालिग के रूप में मुकदमा चलाने के लिए बाल न्यायालय भेजा जाए

बाल कल्याण समिति

देखभाल और संरक्षण की ज़रूरत में बच्चों के मामलों का निपटान; बैठकों की संख्या  के बारे में नहीं बताया गया है।

कार्य एक्ट में बताए समान हैं; बिल के कानून बनने के दो माह के अंदर सदस्यों को प्रशिक्षण दिया जाना है; समिति को माह में कम से कम 20 दिन बैठक करनी है।

अपील

जेजेबी आदेश के 30 दिनों के अंदर सेशन कोर्ट के पास अपील; हाई कोर्ट के पास आगे अपील की जा सकती है।

जेजेबी/ सीडब्ल्यूसी के आदेश की अपील 30 दिन के अंदर बाल न्यायालय को, ज़रूरी होने पर आगे हाई कोर्ट को (पालन पोषण संबंधी देखभाल आदि के लिए जिला मजिस्ट्रेट)

गोद लेने

एक्ट में अंतर्देशीय गोद लेने के लिए कोई प्रावधान नहीं है; बच्चों के गोद लेने पर नियंत्रण करने वाले दिशानिर्देश, 2011 में अंतर्देशीय गोद लेने का प्रावधान है।

यदि देश के अंदर गोद लेना नहीं किया जा सकता तो गोद लेने के लिए कानूनी रूप से मुक्त घोषित बच्चे की 30 दिन के अंदर अंतर्देशीय गोद लेने की अनुमति है।

पालन पोषण संबंधी देखभाल

थोड़े/अधिक समय के लिए परिवार के पास गोद लेने के लिए बच्चे को अस्थायी तौर पर दिया जाए; असली परिवार को मिलने की अनुमति दी जा सकती है।

एक्ट के समान। सीडब्ल्यूसी द्वारा गोद लेने वाले परिवार पर मासिक निगरानी के लिए नए प्रावधान जोड़ता है।

बाद की देखभाल

बच्चों के विशेष या बाल घर छोड़ने पर तीन वर्ष तक या 21 वर्ष की आयु तक पैसे संबंधी और आगे की सहायता।

18 वर्ष की आयु के बाद बाल देखभाल संस्थाओं को छोड़ने वाले बच्चों को एक समय का वित्तीय समर्थन।

स्रोत: जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000; जुवेनाइल जस्टिस बिल, 2014; पीआरएस।

एनेक्सचर: आपराधिक क़ानूनों की अंतर्राष्ट्रीय तुलना

कुछ विशेष अपराधों के मामले में, कुछ देशों में बाल अपराधियों के ऊपर बालिगों के रूप में मुकदमा करने की अनुमति है।  तालिका 5 आयु के आधार पर विभिन्न देशों के आपराधिक क़ानूनों की तुलना करती है जब विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए, जुवेनाइल के ऊपर बालिगों के समान मुकदमा चलाया जा सकता है।

तालिका 5: बाल अपराधियों से व्यवहार करने का संबोधन करने वाले विभिन्न देशों में आपराधिक क़ानूनों की तुलना

देश

संयुक्त राज्य अमेरिका

युनाइटेड किंग्डम

दक्षिण अफ्रीका

फ्रांस

कनाडा

जर्मनी

भारत

(जेजे एक्ट, 2000)

भारत (प्रस्तावित बिल, 2014)

न्यूनतम आयु जब जुवेनाइल के ऊपर एक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकता है

6-10 वर्ष के बीच1

10 वर्ष

10 वर्ष

मामले के आधार पर4

12 वर्ष

14 वर्ष

7 वर्ष

(आईपीसी के तहत)

7 वर्ष

(आईपीसी के तहत)

वह आयु जब जुवेनाइल के ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है

13 वर्ष2

इंगलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में 17 वर्ष, स्कॉटलैंड में 16 वर्ष (विशेष परिस्थितियों में कम हो सकती है)

16 वर्ष

16 वर्ष

14 वर्ष

14 वर्ष

जुवेनाइल के ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता

16 वर्ष

अपराध की किस्म जिसके लिए जुवेनाइल के ऊपर बालिग के रूप में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता

हमला, हत्या,

डकैती, संगीन यौन शोषण, शस्त्र संबंधी अपराध, ड्रग संबंधी अपराध3

हत्या, बलात्कार,

जीवन या संपत्ति को संभावित खतरे में डालने वाला कोई विस्फोट

हत्या, बलात्कार,

डकैती

हत्या, सशस्त्र डकैती, ड्रग संबंधी सीरियस अपराध, बलात्कार

हत्या, संगीन यौन शोषण, अन्य व्यक्ति को सीरियस शारीरिक नुकसान

यौन शोषण,

बाल शोषण जो मृत्यु का कारण बने, ऐसे व्यक्तियों का शोषण जो प्रतिरोध करने में असमर्थ हो

लागू नहीं

सीरियस अपराध (3-7 वर्ष की सजा उदाहरण धोखाधड़ी, जालसाजी) या जघन्य (हेनस) अपराध, (7 वर्ष से अधिक की सजा उदाहरण हत्या, बलात्कार, डकैती)

बालिगों के रूप में माने गए जुवेनाइल के लिए दंड

बालिगों के समान।  आजीवन कारावास नहीं; मृत्युदंड नहीं

बालिगों के समान। आजीवन कारावास की अनुमति; मृत्युदंड नहीं

बालिगों के समान।

आजीवन कारावास नहीं; मृत्युदंड नहीं

बालिगों के समान, मामले के आधार पर; आजीवन कारावास की अनुमति

हत्या: 7-10 वर्ष; अन्य अपराधों के लिए अधिकतम दंड तीन वर्ष है; कोई आजीवन कारावास नहीं; कोई मृत्युदंड नहीं

10 वर्ष; आजीवन कारावास या मृत्युदंड नहीं

लागू नहीं

बालिगों के समान। छोड़ने की संभावना के साथ आजीवन कारावास की अनुमति; मृत्युदंड नहीं

Note: 1varies across different states;  2according to Federal law, may vary across different states;  3United States Attorneys Manual, Criminal Resource Manual 54, http://www.justice.gov/usao/eousa/foia_reading_room/usam/title9/crm00054... 4minors over the age of 13 years are criminally responsible for their offences if they are able to understand their actions: French Penal Code, www.legifrance.gouv.fr/content/download/1957/13715/.../Code_33.pdf.  Sources: United States: U.S. Code Chapter 403- Juvenile Delinquency,  http://www.law.cornell.edu/uscode/text/18/part-IV/chapter-403;  United Kingdom: Children and Young Persons Act, 1933,  http://www.legislation.gov.uk/ukpga/Geo5/23-24/12/contents;  South Africa: Child Justice Act, 2008,  http://www.justice.gov.za/legislation/regulations/childjustice-reg-amend... Criminal Law Amendment Act, 1997, http://www.saflii.org/za/legis/num_act/claa1997205.pdf;  France: Children’s Rights- August 2007, The Library of Congress, http://www.loc.gov/law/help/child-rights/pdfs/Children's%20Rights-France.pdf;  Canada: Youth Criminal Justice Act, 2002, http://laws.justice.gc.ca/PDF/Y-1.5.pdf;  Germany: Youth Courts Law, 1974, http://www.gesetze-im-internet.de/englisch_jgg/englisch_jgg.html#p0097; German Criminal Code, http://www.gesetze-im-internet.de/englisch_stgb/englisch_stgb.html;  India: Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2000, http://wcd.nic.in/childprot/jjact2000.pdf; Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Bill, 2014, http://www.prsindia.org/uploads/media/Juvenile%20Justice/Juvenile%20just...

 

 

[1]    This Brief has been written on the basis of the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Bill, 2014, introduced in the Lok Sabha on August 12, 2014.

[2].  The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2000, Ministry of Women and Child Development.

[3].  Single year age data, Population Enumeration Data (Final Population), 2011 Census of India.

[4].  Juveniles in Conflict with Law, Crime in India 2013, National Crime Records Bureau, Ministry of Home Affairs.

[5].  Bachpan Bachao Andolan vs Union of India and others, Case no. 51 of 2006, April 18, 2011, Ram Singh and Ors. Vs State of NCT of Delhi, Crl. Rev. P. 124 of 2013.

[6].  Gaurav Kumar vs. State of Haryana, Petition for Special Leave to Appeal, 2366-2368/ 2015.

[7].  The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Bill, 2014, Standing Committee on Human Resource Development, February 25, 2015.

[8]. “Rough Justice”, Faizan Mustafa, Vice Chancellor, NALSAR University of Law, The Indian Express, November 27, 2014.

[9].   Maneka Gandhi vs Union of India, AIR 1978 SC 597.

[10]. Pratap Singh vs. State of Jharkhand & Anr., Appeal (Crl.) 210 of 2005.

 

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