मंत्रालय: 
विधि एवं न्याय
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    जुलाई 23, 2018
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    अगस्त 01, 2018
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    अगस्त 10, 2018
    Gray
  • विधि और न्याय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने 23 जुलाई, 2018 को लोकसभा में कमर्शियल अदालतें, उच्च न्यायालयों की कमर्शियल डिविजन और कमर्शियल अपीलीय डिविजन (संशोधन) बिल, 2018 पेश किया। बिल कमर्शियल अदालतें, उच्च न्यायालयों की कमर्शियल डिविजन और कमर्शियल अपीलीय डिविजन एक्ट, 2015 में संशोधन करता है और कमर्शियल अदालतें, उच्च न्यायालयों की कमर्शियल डिविजन और कमर्शियल अपीलीय डिविजन (संशोधन) अध्यादेश, 2018 का स्थान लेता है।
     
  • एक्ट कमर्शियल विवादों (जैसे निर्माण संबंधी कॉन्ट्रैक्ट्स और वस्तुओं एवं सेवाओं के लेनदेन से संबंधित कॉन्ट्रैक्ट्स) पर न्यायिक फैसले लेने के लिए उच्च न्यायालयों में कमर्शियल डिविजन्स और जिला स्तर पर कमर्शियल अदालतों की स्थापना का प्रयास करता है।
     
  • आर्थिक क्षेत्राधिकार में कटौती : एक्ट के अंतर्गत कमर्शियल अदालतें और उच्च न्यायालयों की कमर्शियल डिविजन्स न्यूनतम एक करोड़ रुपए मूल्य के विवादों पर फैसले ले सकती हैं। बिल कहता है कि यह सीमा कम से कम तीन लाख रुपए हो सकती है। इसकी अधिकतम सीमा को निर्धारित करने के लिए केंद्र सरकार अधिसूचना जारी कर सकती है।
     
  • कुछ कमर्शियल अदालतों की स्थापना : एक्ट के अंतर्गत राज्य सरकारें संबंधित उच्च न्यायालय की सलाह से जिला जज वाली कमर्शियल अदालतों की स्थापना कर सकती हैं। एक्ट उन स्थितियों में कमर्शियल अदालतों की स्थापना को प्रतिबंधित करता है जहां उच्च न्यायालयों के पास कमर्शियल मामलों की सुनवाई का मूल न्यायाधिकार (ओरिजनल ज्यूरिस्डिक्शन) है (मूल न्यायाधिकार का अर्थ यह है कि किसी अदालत को नए मामलों की सुनवाई की शक्ति प्राप्त है)। बिल इस प्रतिबंध को हटाता है और राज्यों को उस स्थिति में कमर्शियल अदालतों को स्थापित करने की अनुमति देता है जहां उच्च न्यायालय का मूल न्यायाधिकार है।
     
  • कमर्शियल अपीलीय अदालतें : जिन क्षेत्रों में उच्च न्यायालयों को सामान्य मूल दीवानी क्षेत्राधिकार (ऑर्डिनरी ओरिजनल सिविल ज्यूरिस्डिक्शन) नहीं हैं, वहां राज्य सरकारें जिला जज के स्तर पर कमर्शियल अपीलीय अदालतों को अधिसूचित कर सकती हैं। कमर्शियल अदालतों (जिला जज के स्तर से नीचे) के आदेश के खिलाफ अपीलीय अदालत में अपील की जा सकती है।
     
  • मध्यस्थता : अनिवार्य मध्यस्थता का एक प्रावधान उन मामलों में प्रदान किया गया है जहां विवाद से जुड़े पक्षों द्वारा तत्काल राहत (जैसे निषेधाज्ञा) की मांग नहीं की जाती। यह मध्यस्थता लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज़ एक्ट, 1987 के अंतर्गत स्थापित अथॉरिटीज (जैसे राष्ट्रीय और जिला लीगल सर्विसेज अथॉरिटी) द्वारा की जा सकती है। मध्यस्थता की प्रक्रिया तीन महीने की अवधि के अंदर पूरी होनी चाहिए (जिसे दो अन्य महीनों तक और बढ़ाया जा सकता है)। विवाद से जुड़े पक्षों के बीच हस्ताक्षरित समझौता उसी प्रकार लागू होगा, जैसा मध्यस्थता और सुलह एक्ट, 1996 के अंतर्गत मध्यस्थता पंचाट (आरबिट्रल अवॉर्ड) लागू होता है।
     
  • प्रतिदावे (काउंटर क्लेम्स) ट्रांसफर नहीं होंगे : एक्ट के अंतर्गत अगर एक सिविल अदालत में कमर्शियल विवाद का न्यूनतम एक करोड़ रुपए मूल्य का प्रतिदावा दायर किया जाता है तो सिविल अदालत उस मुकदमे को कमर्शियल अदालत में ट्रांसफर कर सकती है। अध्यादेश मुकदमों को ट्रांसफर करने से संबंधित इस प्रावधान को हटाता है।

 

 

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