मंत्रालय: 
वित्त
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    मार्च 17, 2020
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    सितंबर 19, 2020
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    सितंबर 22, 2020
    Gray
  • कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमन ने लोकसभा में 17 मार्च, 2020 को कंपनी (संशोधन) बिल, 2020 पेश किया। बिल कंपनी एक्ट, 2013 में संशोधन करता है
     
  • उत्पादक कंपनियां: 2013 के एक्ट के अंतर्गत, कंपनी एक्ट, 1956 के कुछ प्रावधान उत्पादक कंपनियों पर लागू होते हैं। इनमें उनकी सदस्यता, बैठकों के संचालन और एकाउंट्स के रखरखाव से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। उत्पादक कंपनियों में ऐसी कंपनियां शामिल हैं जोकि कृषि उत्पादों का उत्पादन, मार्केटिंग और बिक्री करती हैं और कुटीर उद्योगों के उत्पादों की बिक्री करती हैं। बिल इन प्रावधानों को हटाता है और एक्ट में उत्पादक कंपनियों के ऐसे ही प्रावधानों वाला नया अध्याय जोड़ता है। 
     
  • अपराधों में परिवर्तन: बिल तीन परिवर्तन करता है। पहला, वह कुछ अपराधों के लिए जुर्माने को हटाता है। उदाहरण के लिए वह एक्ट का उल्लंघन करते हुए एक श्रेणी के शेयरहोल्डर्स के अधिकारों में बदलाव करने पर लगने वाले जुर्माने को हटाता है। उल्लेखनीय है कि जहां किसी निर्दिष्ट जुर्माने का उल्लेख नहीं है, वहां एक्ट 10,000 रुपए तक के जुर्माने को निर्दिष्ट करता है जोकि डीफॉल्ट जारी रखने तक प्रति दिन 1,000 रुपए तक बढ़ाया जा सकता है। दूसरा, वह कुछ अपराधों पर कैद की सजा को हटाता है। उदाहरण के लिए बिल उन कंपनियों पर लागू होने वाले तीन साल के कारावास को हटाता है जोकि एक्ट का अनुपालन किए बिना अपने शेयर्स को बाय बैक करती हैं। तीसरा, वह कुछ अपराधों में देय जुर्माने की राशि को कम करता है। उदाहरण के लिए अब रजिस्ट्रार ऑफ कंपनियों में वार्षिक रिटर्न फाइल न करने पर पांच लाख रुपए की बजाय दो लाख रुपए का जुर्माना भरना होगा।
     
  • एक्ट के अंतर्गत वन पर्सन कंपनी (यानी सिर्फ एक सदस्य वाली कंपनी) या छोटी कंपनियों (यानी निम्न पेड अप शेयर कैपिटल और टर्नओवर सीमा वाली) को कुछ अपराधों (जैसे वार्षिक रिटर्न न फाइल करना) पर सिर्फ अधिकतम 50% तक जुर्माना भरना होगा। बिल: (i) इस प्रावधान को सभी उत्पादक कंपनियों और स्टार्ट अप कंपनियों पर लागू करता है, (ii) इसे एक्ट के किसी भी प्रावधान के उल्लंघन पर लागू करता है, और (iii) कंपनी के लिए अधिकतम जुर्माने को दो लाख रुपए तक और डीफॉल्टिंग अधिकारी के लिए एक लाख रुपए तक सीमित करता है।
     
  • विदेशी क्षेत्राधिकारों में प्रत्यक्ष लिस्टिंग: बिल केंद्र सरकार को इस बात का अधिकार देता है कि वह पब्लिक कंपनियों की कुछ श्रेणियों को विदेशी क्षेत्राधिकारों में सिक्योरिटीज़ की श्रेणियों को लिस्ट करने की अनुमति दे सकती है (जैसा निर्दिष्ट किया गया हो)।
     
  • लिस्टेड कंपनियों की परिभाषा से बाहर करना: बिल केंद्र सरकार को इस बात का अधिकार देता है कि वह सिक्योरिटीज़ और एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया की सलाह से, विशेष श्रेणियों की सिक्योरिटीज़ को जारी करने वाली कंपनियों को लिस्टेड कंपनियों की परिभाषा से बाहर कर सकती है।
     
  • गैर कार्यकारी निदेशकों का पारिश्रमिक: एक्ट कंपनी के कार्यकारी निदेशकों (प्रबंधन निदेशक और दूसरे पूर्णकालिक निदेशकों) के पारिश्रमिक के भुगतान के लिए विशेष प्रावधान करता है, अगर कंपनी को एक वर्ष में अपर्याप्त या कोई लाभ नहीं हुआ। उदाहरण के लिए अगर कंपनी की पूंजी पांच करोड़ रुपए तक है तो कार्यकारी निदेशकों का वार्षिक पारिश्रमिक 60 लाख रुपए से अधिक नहीं हो सकता। बिल इस प्रावधान को स्वतंत्र निदेशकों सहित गैर कार्यकारी निदेशकों पर भी लागू करता है।
     
  • बेनेफिशियल शेयरहोल्डिंग: एक्ट के अंतर्गत, अगर किसी व्यक्ति का किसी कंपनी के कम से कम 10% शेयरों पर बेनेफिशियल इंटरेस्ट है या वह कंपनी पर महत्वपूर्ण प्रभाव या नियंत्रण रखता है तो उसे इस इंटरेस्ट की घोषणा करनी होती है। कंपनी से अलग रजिस्टर में घोषणा करने की अपेक्षा की जाती है। बिल केंद्र सरकार को इस बात का अधिकार देता है कि वह किसी व्यक्ति वर्ग को इन शर्तों के अनुपालन से छूट दे, अगर ऐसा करना जनहित में जरूरी हो।
     
  • रेज़ोल्यूशन को फाइल करने से छूट: एक्ट में कंपनियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे रजिस्ट्रार ऑफ कंपनियों में कुछ रेज़ोल्यूशन्स को फाइल करेंगी। इनमें कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के धन उधार लेने या लोन देने से जुड़े रेज़ोल्यूशन शामिल हैं। हालांकि बैंकिंग कंपनियों को लोन पास करने या लोन की गारंटी या सिक्योरिटी देने से संबंधित रेज़ोल्यूशन को फाइल करने से छूट दी गई है। अब पंजीकृत गैर बैंकिंग फाइनांशियल कंपनियों और हाउसिंग फाइनांस कंपनियों को भी यह छूट दी गई है।
     
  • निगम सामाजिक दायित्व (सीएसआर): एक्ट के अंतर्गत एक निर्दिष्ट राशि के मूल्य, टर्नओवर या लाभ कमाने वाली कंपनियों से सीएसआर कमिटी बनाने और पिछले तीन वित्तीय वर्षों में अपने औसत शुद्ध लाभ का 2% अपनी सीएसआर नीति पर खर्च करने की अपेक्षा की जाती है। बिल उन कंपनियों को सीएसआर कमिटियां बनाने से छूट देता है जिनकी सीएसआर देनदारी प्रति वर्ष अधिकतम 50 लाख रुपए है। इसके अतिरिक्त किसी वित्तीय वर्ष में अपनी सीएसआर बाध्यता से अधिक धनराशि खर्च करने पर अगले वित्तीय वर्ष की सीएसआर बाध्यता में अतिरिक्त राशि जुड़ सकती है।
     
  • अनलिस्टेड कंपनियों के लिए पीरिऑडिटक फाइनांशियल नतीजे: बिल केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह कुछ अनलिस्टेड कंपनियों की श्रेणियों (जैसा कि निर्दिष्ट किया जाए) को पीरिऑडिक फाइनांशियल रिजल्ट्स तैयार करने और फाइल करने तथा इन रिजल्ट्स के ऑडिट पूरे करने या उनकी समीक्षा करने को कह सकती है।
     
  • एनसीएलएटी की न्यायपीठ: बिल राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय ट्रिब्यूनल की न्यायपीठ बनाने का प्रयास करता है। ये नई दिल्ली या ऐसे किसी अन्य स्थान, जैसा अधिसूचित किया जाए, पर स्थित हो सकती हैं।

 

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