मंत्रालय: 
वित्त
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    जुलाई 25, 2019
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    जुलाई 26, 2019
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    जुलाई 30, 2019
    Gray
  • वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने लोकसभा में 25 जुलाई, 2019 को कंपनी (संशोधन) बिल, 2019 पेश किया। बिल कंपनी एक्ट, 2013 में संशोधन करता है
     
  • डीमैटीरियलाइज्ड शेयर जारी करना: एक्ट के अंतर्गत पब्लिक कंपनियों की कुछ श्रेणियों से केवल डीमैटीरियलाइज्ड प्रारूप में शेयर जारी करने की अपेक्षा की जाती है। बिल कहता है कि यह गैर सूचीबद्ध कंपनियों की अन्य श्रेणियों के लिए भी विनिर्दिष्ट किया जा सकता है।
     
  • कुछ अपराधों का पुनर्वर्गीकरण: 2013 के एक्ट में ऐसे 81 कंपाउंडिंग अपराध दिए गए हैं जिनके लिए जुर्माना या जुर्माना या कैद, या दोनों की सजा है। इन अपराधों की सुनवाई अदालतों द्वारा की जाती है। बिल इनमें से 16 अपराधों को सिविल डीफॉल्ट्स में वर्गीकृत करता है, जिनमें अब एडजुडिकेटिंग ऑफिसर्स (केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त) जुर्माना वसूल सकते हैं। इन अपराधों में निम्न शामिल हैं: (i) डिस्काउंट पर शेयर जारी करना, और (ii) सालाना रिटर्न फाइल न करना। बिल कुछ अन्य अपराधों में दंड में संशोधन करता है।
     
  • निगम सामाजिक दायित्व (सीएसआर): एक्ट के अंतर्गत जिन कंपनियों में सीएसआर का प्रावधान है, अगर वे सीआरएस की पूरी धनराशि का उपयोग नहीं करतीं तो उन्हें अपनी वार्षिक रिपोर्ट में इसका खुलासा करना होगा। बिल के अंतर्गत सीएसआर की हर साल खर्च न होने वाली धनराशि वित्तीय वर्ष के छह महीनों के अंदर एक्ट की अनुसूची 7 के अंतर्गत आने वाली निधियों (जैसे प्रधानमंत्री राहत कोष) में से किसी एक में हस्तांतरित हो जाएगी।
     
  • हालांकि अगर सीएसआर की धनराशि कुछ चालू परियोजनाओं के लिए हैं तो खर्च न होने वाली राशि वित्तीय वर्ष के समाप्त होने के 30 दिनों के अंदर एक अनस्पेंड सीएसआर खाते में हस्तांतरित हो जाएगी जिसे तीन वर्षों में खर्च करना होगा। तीन वर्ष के बाद बची राशि एक्ट की अनुसूची 7 में उल्लिखित निधियों में से किसी एक में हस्तांतरित हो जाएगी। किसी प्रकार का उल्लंघन करने पर 50,000 रुपए से लेकर 25,00,000 रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। उल्लंघन करने वाले प्रत्येक अधिकारी को तीन वर्ष के कारावास की सजा भुगतनी पड़ सकती है तथा 50,000 और 25,00,000 के बीच जुर्माना भरना पड़ सकता है या दोनों सजा भुगतनी पड़ सकती है।
     
  • ऑडिटर्स को प्रतिबंधित करना: एक्ट के अंतर्गत दोष साबित होने पर नेशनल फाइनांशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी किसी सदस्य या फर्म को छह महीने से लेकर 10 वर्ष के बीच चार्टर्ड एकाउंटेंट के तौर पर प्रैक्टिस करने से प्रतिबंधित कर सकती है। बिल सजा में संशोधन करता है और कहता है कि उसे कंपनी के ऑडिटर या इंटरनल ऑडिटर के तौर पर नियुक्त नहीं किया जाएगा या छह महीने से लेकर 10 वर्षों की अवधि के बीच वह कंपनी के वैल्यूएशन का काम नहीं कर सकता।
     
  • व्यवसाय शुरू करना: बिल के अनुसार कोई कंपनी तभी अपना व्यवसाय शुरू कर सकती है, (i) जब वह अपने संस्थापन के 180 दिनों के अंदर इस बात की पुष्टि करेगी कि कंपनी के मेमोरेंडम के प्रत्येक सबस्क्राइबर ने अपने उन सभी शेयर्स का मूल्य चुका दिया है, जिन्हें लेने की उन्होंने सहमति जताई है, और (ii) जब वह अपने संस्थापन के 30 दिनों के अंदर कंपनी रजिस्ट्रार में पंजीकृत अपने कार्यालय के पते का वैरिफिकेशन फाइल कर देगी। अगर कंपनी ऐसा नहीं करती और पाया जाता है कि उसने अपना व्यवसाय शुरू नहीं किया है तो कंपनी का नाम, कंपनी रजिस्ट्रार से हटाया जा सकता है।
     
  • चार्जेज़ का रजिस्ट्रेशन: एक्ट यह अपेक्षा करता है कि कंपनियां अपनी प्रॉपर्टी से संबंधित चार्जेज़ (जैसे मॉर्टगेज) का पंजीकरण, चार्ज के क्रिएशन के 30 दिन के अंदर करें। रजिस्ट्रार इस अवधि को 300 दिन कर सकता है। बिल इस समयसीमा को 60 दिन करता है (जिसे 60 दिन और बढ़ाया जा सकता है)।
     
  • मंजूरी देने वाली अथॉरिटी में परिवर्तन: एक्ट के अंतर्गत अगर किसी विदेशी कंपनी से जुड़ी कोई कंपनी अपने वित्तीय वर्ष की अवधि में परिवर्तन करती है तो उसे इस संबंध में राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल से मंजूरी लेनी होती है। इसी प्रकार अगर कोई पब्लिक कंपनी अपने संस्थापन संबंधी दस्तावेज में कोई ऐसा बदलाव करती है जिससे कंपनी प्राइवेट कंपनी में बदल जाए, तो इसके लिए भी ट्रिब्यूनल से मंजूरी की जरूरत होती है। बिल के अंतर्गत इन अधिकारों को केंद्र सरकार को हस्तांतरित किया गया है।
     
  • कंपाउंडिंग: एक्ट के अंतर्गत एक क्षेत्रीय निदेशक पांच लाख रुपए तक के जुर्माने वाले अपराधों को कंपाउंड (सेटल) कर सकता है। बिल इस सीमा को बढ़ाकर 25 लाख रुपए करता है।
     
  • पद पर बने रहने पर प्रतिबंध: एक्ट के अंतर्गत केंद्र सरकार या कुछ स्टेकहोल्डर्स कंपनी के मामलों के कुप्रबंधन के खिलाफ एनसीएलटी में राहत के लिए आवेदन कर सकते हैं। बिल कहता है कि ऐसी शिकायत पर सरकार कंपनी के किसी अधिकारी के खिलाफ इस आधार पर मामला दायर कर सकती है कि धोखाधड़ी या लापरवाही के कारण वह कंपनी में बने रहने योग्य नहीं है। अगर एनसीएलटी अधिकारी के खिलाफ आदेश जारी करती है तो पांच वर्षों के लिए वह किसी भी कंपनी में किसी पद पर नहीं रह सकता।  
     
  • बेनेफिशियल ओनरशिप: अगर किसी व्यक्ति का किसी कंपनी के कम से कम 25% शेयरों पर बेनेफिशियल इंटरेस्ट है या वह कंपनी पर महत्वपूर्ण प्रभाव या नियंत्रण रखता है तो उसे इस इंटरेस्ट की घोषणा करनी होती है। बिल प्रत्येक कंपनी से यह अपेक्षा करता है कि वह बेनेफिशियल ओनर को चिन्हित करने के लिए कदम उठाए और उनसे एक्ट के अनुपालन की अपेक्षा करता है।

 

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