मंत्रालय: 
वित्त
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    दिसंबर 20, 2018
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    जनवरी 04, 2019
    Gray
  • कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने 20 दिसंबर, 2018 को लोकसभा में कंपनी (संशोधन) बिल, 2018 को पेश किया। यह बिल 2 नवंबर, 2018 को जारी अध्यादेश का स्थान लेता है। यह बिल कंपनी एक्ट, 2013 के अनेक दंडात्मक प्रावधानों में संशोधन करता है।
     
  • कुछ अपराधों का पुनर्वर्गीकरण: 2013 के एक्ट में ऐसे 81 कंपाउंडिंग अपराध हैं जिनके लिए जुर्माना या जुर्माना या कैद, या दोनों की सजा है। इन अपराधों की सुनवाई अदालतों द्वारा की जाती है। बिल इनमें से 16 अपराधों को सिविल डीफॉल्ट में वर्गीकृत करता है, जिनमें अब एडजुडिकेटिंग ऑफिसर्स जुर्माना वसूल सकते हैं। इन अपराधों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) डिस्काउंट पर शेयर जारी करना, और (ii) सालाना रिटर्न फाइल न करना।
     
  • डिस्काउंट पर शेयर जारी करना: एक्ट किसी कंपनी को डिस्काउंट पर शेयर जारी करने से प्रतिबंधित करता है, सिवाय कुछ मामलों को छोड़कर। ऐसा न करने पर कंपनी को एक लाख रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ता है। इसके अतिरिक्त डीफॉल्ट करने वाले प्रत्येक अधिकारी को छह माह तक के कारावास की सजा भुगतनी पड़ती है या एक लाख रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक के बीच की राशि का जुर्माना भरना पड़ता है। बिल अधिकारियों के कारावास की सजा को हटाता है।
     
  • इसके अतिरिक्त कंपनी और डीफॉल्ट करने वाले प्रत्येक अधिकारी को डिस्काउंट पर शेयर जारी करने से प्राप्त राशि के बराबर की राशि या पांच लाख रुपए की राशि जुर्माने के तौर पर भरनी पड़ेगी (इनमें से जो भी कम होगी)। कंपनी को प्राप्त राशि को भी लौटाना होगा, जिसमें सालाना 12% की दर से ब्याज जुड़ा होगा। यह ब्याज शेयर जारी होने की तारीख से दिया जाएगा।
     
  • व्यवसाय शुरू करना: बिल के अनुसार कोई कंपनी तभी अपना व्यवसाय शुरू कर सकती है, (i) जब वह अपने संस्थापन के 180 दिनों के अंदर इस बात की पुष्टि करेगी कि कंपनी के मेमोरेंडम के प्रत्येक सबस्क्राइबर ने अपने सभी शेयर्स का मूल्य चुका दिया है, और (ii) जब वह अपने संस्थापन के 30 दिनों के अंदर कंपनी रजिस्ट्रार में पंजीकृत अपने कार्यालय के पते का वैरिफिकेशन फाइल कर देगी। अगर कंपनी ऐसा नहीं करती और पाया जाता है कि उसने अपना व्यवसाय शुरू नहीं किया है तो कंपनी का नाम, कंपनी रजिस्ट्रार से हटाया जा सकता है।
     
  • चार्जेज़ का रजिस्ट्रेशन: एक्ट यह अपेक्षा करता है कि कंपनियां अपनी प्रॉपर्टी से संबंधित चार्जेज़ (जैसे मॉर्टगेज) का पंजीकरण, चार्ज के क्रिएशन के 30 दिन के अंदर करें। रजिस्ट्रार इस अवधि को 300 दिन कर सकता है। अगर पंजीकरण 300 दिनों के अंदर पूरा नहीं होता तो कंपनी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह केंद्र सरकार से समय की छूट मांगे।
     
  • बिल इसमें परिवर्तन करता है और निम्नलिखित की अनुमति देता है: (i) अगर बिल से पहले चार्ज क्रिएट किया जाता है तो चार्जेज़ का पंजीकरण 300 दिनों तक किया जाए, या (ii) अगर बिल के बाद चार्ज क्रिएट किया जाता है तो पंजीकरण 60 दिनों के अंदर किया जाए। अगर पहली श्रेणी के अंतर्गत चार्ज 300 दिनों में पंजीकृत नहीं होता तो उसे बिल की तारीख से छह महीने के अंदर पूरा होना चाहिए। अगर दूसरी श्रेणी के अंतर्गत चार्ज 60 दिनों में पंजीकृत नहीं होता तो रजिस्ट्रार पंजीकरण के लिए 60 दिन और दे सकता है। अगर कोई व्यक्ति जान-बूझकर झूठे या गलत दस्तावेज जमा कराता है या ऐसी सूचनाओं को छिपाता है, जिन्हें इस प्रावधान के अंतर्गत पंजीकृत करना जरूरी है, तो एक्ट के अंतर्गत वह फ्रॉड के लिए उत्तरदायी होगा।
     
  • मंजूरी देने वाली अथॉरिटी में परिवर्तन: एक्ट के अंतर्गत किसी विदेशी कंपनी से जुड़ी किसी कंपनी के वित्तीय वर्ष की अवधि में परिवर्तन को राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल द्वारा मंजूरी दी जाती है। इसी प्रकार अगर कोई पब्लिक कंपनी अपने संस्थापन संबंधी दस्तावेज में कोई ऐसा बदलाव करती है जिससे कंपनी प्राइवेट कंपनी में बदल जाए, तो इसके लिए भी ट्रिब्यूनल से मंजूरी की जरूरत होती है। बिल के अंतर्गत इन अधिकारों को केंद्र सरकार को हस्तांतरित कर दिया गया है।
     
  • बेनेफिशियल ओनरशिप की घोषणा: अगर किसी व्यक्ति का किसी कंपनी के कम से कम 25% शेयरों पर बेनेफिशियल इंटरेस्ट है या वह कंपनी पर महत्वपूर्ण प्रभाव या नियंत्रण रखता है तो उसे इस इंटरेस्ट की घोषणा करनी होती है। एक्ट के अंतर्गत इस इंटरेस्ट की घोषणा न करने पर एक लाख रुपए से लेकर दस लाख रुपए तक के बीच की राशि का जुर्माना भरना पड़ता है, साथ ही डीफॉल्ट पर हर दिन जुर्माना भरना पड़ता है। बिल में यह प्रावधान है कि ऐसे व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जा सकता है या उसे एक वर्ष तक के कारावास की सजा भुगतनी पड़ सकती है या इन दोनों का सामना करना पड़ सकता है।
     
  • कंपाउंडिंग: एक्ट के अंतर्गत एक क्षेत्रीय निदेशक पांच लाख रुपए तक की सजा वाले अपराधों को कंपाउंड (सेटल) कर सकता है। बिल इस सीमा को बढ़ाकर 25 लाख रुपए करता है।

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।