मंत्रालय: 
श्रम एवं रोजगार
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    नवंबर 28, 2019
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  • श्रम और रोजगार मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने 28 नवंबर, 2019 को औद्योगिक संबंध संहिता, 2019 को पेश किया। यह संहिता तीन श्रम कानूनों (i) औद्योगिक विवाद एक्ट, 1947, (ii) ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 और (iii) औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) एक्ट, 1946 का स्थान लेती है।
     
  • ट्रेड यूनियन्स: संहिता के अंतर्गत, ट्रेड यूनियन के सात या उससे अधिक सदस्य उसे रजिस्टर करने का आवेदन कर सकते हैं। कम से कम 10% सदस्यों वाली या 100 श्रमिकों वाली (इनमें से जो भी कम हो) ट्रेड यूनियन्स रजिस्टर की जाएंगी। इसके अतिरिक्त रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन्स में कम से कम सात सदस्य, जोकि इस्टैबलिशमेंट या संबंधित उद्योग में काम करते हों, उसके सदस्य के रूप में हमेशा बरकरार रहने चाहिए। केंद्र और राज्य सरकार ट्रेड यूनियन या ट्रेड यूनियन्स के परिसंघ को क्रमशः केंद्रीय या राज्य ट्रेड यूनियन्स के रूप में मान्यता दे सकती है।
     
  • नेगोसिएटिंग यूनियन्स: संहिता किसी औद्योगिक इस्टैबलिशमेंट में नियोक्ता से बातचीत करने के लिए नेगोसिएशन यूनिट का प्रावधान करती है। अगर किसी औद्योगिक इस्टैबलिशमेंट में सिर्फ एक ट्रेड यूनियन है तो नियोक्ता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस ट्रेड यूनियन को श्रमिकों की एकमात्र नेगोसिएटिंग यूनियन के रूप में मान्यता देगा। अगर कई ट्रेड यूनियन्स हैं तो कम से कम 75% श्रमिकों वाली ट्रेड यूनियन को केंद्र या राज्य सरकार द्वारा नेगोसिएटिंग यूनियन के रूप में मान्यता दी जाएगी।
     
  • अनुचित व्यवहार: संहिता नियोक्ताओं, श्रमिकों और ट्रेड यूनियन्स को अनुसूची में सूचीबद्ध अनुचित व्यवहार करने से प्रतिबंधित करती है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) श्रमिकों को ट्रेड यूनियन्स बनाने से रोकना, (ii) श्रमिकों के लिए नियोक्ता द्वारा प्रायोजित ट्रेड यूनियन बनाना, और (iii) श्रमिकों को ट्रेड यूनियन्स में शामिल होने के लिए जबदस्ती करना।
     
  • स्थायी आदेश: कम से कम 100 श्रमिकों वाली सभी औद्योगिक इस्टैबलिशमंट्स को संहिता की अनुसूची में सूचीबद्ध मामलों पर स्थायी आदेश तैयार करने चाहिए। केंद्र सरकार ऐसे मामलों पर मॉडल स्थायी आदेश तैयार करेगी जिसके आधार पर औद्योगिक इस्टैबलिशमेंट्स से अपने स्थायी आदेश तैयार करने की अपेक्षा की जाएगी। ये मामले निम्नलिखित से संबंधित हैं: (i) श्रमिकों का वर्गीकरण, (ii) काम के घंटों, छुट्टी, वेतन के दिन और वेतन की दरों के बारे में श्रमिकों को जानकारी देने का तरीका, (iii) रोजगार की समाप्ति, (iv) दुर्व्यवहार के लिए सस्पेंशन, और (v) श्रमिकों के लिए शिकायत निवारण प्रणाली।
     
  • परिवर्तन संबंधी नोटिस: सेवा शर्तों में परिवर्तन का प्रस्ताव रखने वाले नियोक्ताओं को श्रमिकों को इस संबंध में नोटिस देना होगा। जिन सेवा शर्तों का नोटिस देने की अपेक्षा की जाती है, वे संहिता की अनुसूची में सूचीबद्ध हैं और इनमें वेतन, अंशदान और अवकाश शामिल हैं।
     
  • कामबंदी और छंटनी: संहिता के अनुसार कामबंदी कोयले, बिजली की कमी या मशीनरी के ब्रेकडाउन के कारण नियोक्ता द्वारा श्रमिक को रोजगार न दे पाने की असमर्थता को कहते हैं। बिल में नियोक्ताओं द्वारा श्रमिकों की सेवाओं को समाप्त करने, यानी छंटनी का भी प्रावधान है। कम से कम 100 श्रमिकों वाले औद्योगिक इस्टैबलिशमेंट्स जैसे खदानों, कारखानों और बागानों से यह अपेक्षा की गई है कि उन्हें कामबंदी, छंटनी या उपक्रम बंद करने से पहले केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी। केंद्र या राज्य सरकार अधिसूचना के जरिए श्रमिकों की संख्या की सीमा में परिवर्तन कर सकती है। इस प्रावधान का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को एक लाख रुपए से लेकर 10 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना होगा।
     
  • 50 से 100 श्रमिकों वाले औद्योगिक इस्टैबलिशमेंट्स से निम्नलिखित की अपेक्षा की जाती है: (i) वह छंटनी का शिकार श्रमिकों को 50% मजदूरी और महंगाई भत्ते का भुगतान करेगा, और (ii) छंटनी का शिकार श्रमिक को एक महीने का नोटिस देगा और उस अवधि की मजदूरी देगा। इस प्रावधान का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को 50,000 रुपए से लेकर दो लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त अगर नियोक्ता छंटनी का शिकार श्रमिकों को दोबारा रोजगार देने का प्रस्ताव रखता है तो उन श्रमिकों को अन्य लोगों की तुलना में वरीयता दी जाएगी।
     
  • स्वैच्छिक मध्यस्थता: संहिता में इस बात की अनुमति दी गई है कि नियोक्ता और श्रमिक स्वेच्छा से औद्योगिक विवादों को मध्यस्थता के लिए भेज सकते हैं। विवाद से संबंधित पक्षों को विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने से संबंधित एक लिखित समझौते पर हस्ताक्षर करने होंगे। विवाद की जांच के बाद मध्यस्थ सरकार को मध्यस्थता संबंधी फैसला सौंपेगा।
     
  • औद्योगिक विवाद का समाधान: केंद्र या राज्य सरकारें औद्योगिक विवादों में मध्यस्थता करने और समझौता कराने के लिए सुलह अधिकारियों को नियुक्त कर सकती है। ये अधिकारी विवाद की जांच करेंगे और सुलह की प्रक्रिया को विवाद के उचित और सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुंचाएंगे। अगर कोई समाधान नहीं निकलता तो विवाद का कोई भी पक्ष औद्योगिक ट्रिब्यूनल में आवेदन कर सकता है।
     
  • औद्योगिक ट्रिब्यूनल: संहिता औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए औद्योगिक ट्रिब्यूनल की स्थापना का प्रावधान करती है। औद्योगिक ट्रिब्यूनल में दो सदस्य होंगे: (i) न्यायिक सदस्य जोकि उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या उसने न्यूनतम तीन साल के लिए जिला जज या अवर जिला जज के रूप में कार्य किया हो, और (ii) अर्थशास्त्र, बिजनेस, कानून और श्रम संबंधों के क्षेत्रों में 20 वर्ष के अनुभव वाला प्रशासनिक सदस्य।
     
  • केंद्र सरकार औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए राष्ट्रीय औद्योगिक ट्रिब्यूनल बना सकती है, जोकि: (i) राष्ट्रीय महत्व के सवाल उठाएगी, या (ii) एक से अधिक राज्य में औद्योगिक इस्टैबलिशमेंट्स को प्रभावित कर सकत है। राष्ट्रीय औद्योगिक ट्रिब्यूनल के सदस्यों में निम्नलिखित शामिल होंगे: (i) न्यायिक सदस्य, जोकि उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो, और (ii) प्रशासनिक सदस्य, जोकि केंद्र सरकार में सचिव स्तर का अधिकारी हो।

 

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