मंत्रालय: 
स्वास्थ्य
  • प्रस्तावित
    राज्यसभा
    फ़रवरी 11, 2014
    Gray
  • रेफर
    स्टैंडिंग कमिटी
    फ़रवरी 24, 2014
    Gray
  • रिपोर्ट
    स्टैंडिंग कमिटी
    अप्रैल 29, 2015
    Gray
  • पारित
    राज्यसभा
    मार्च 21, 2017
    Gray
  • पारित
    लोकसभा
    अप्रैल 11, 2017
    Gray
  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने 11 फरवरी, 2014 को राज्यसभा में ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) और एक्वायर्ड इम्यून डेफिशिएंसी सिंड्रोम (एड्स) (रोकथाम व नियंत्रण) बिल, 2014 पेश किया। यह बिल एचआईवी और एड्स को फैलने से रोकने और नियंत्रित करने का प्रयास करता है। साथ ही, एचआईवी और एड्स से पीड़ित लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकता है, उपचार के संबंध में उनसे सहमति लेने और गोपनीयता बरतने की बात करता है, उनके अधिकारों की रक्षा करने की बाध्यता तय करता है और उनकी शिकायतों के निवारण की व्यवस्था करने का प्रयास करता है।
     
  • एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों से भेदभाव पर प्रतिबंधः बिल उन विभिन्न प्रकार के भेदभावों का उल्लेख करता है जिनके आधार पर एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों और उनके साथ जीने वालों से भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया है। इनमें (i) रोजगार, (ii) शैक्षणिक संस्थान, (iii) स्वास्थ्य सेवाओं, (iv) निवास या किसी संपत्ति को किराये पर लेने, (v) सरकारी या निजी पद की उम्मीदवारी और (vi) बीमा (जब तक वह बीमांकिक गणना पर आधारित न हो) से किसी व्यक्ति को मना करना, उसकी बर्खास्तगी, उसे बीच में रोकना या उसके साथ अनुचित व्यवहार करना शामिल है। रोजगार, स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा हासिल करने की पूर्व शर्त के तौर पर एचआईवी की जांच अनिवार्य करना भी प्रतिबंधित है।
     
  • 18 वर्ष से कम आयु के एचआईवी ग्रस्त या एचआईवी प्रभावित व्यक्ति को साझा परिवार में रहने और परिवार की सुविधाओं को हासिल करने का अधिकार है। बिल किसी भी व्यक्ति को ऐसी सूचनाएं प्रकाशित करने या भावनाएं भड़काने से भी प्रतिबंधित करता है जो एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों या उनके साथ जीने वालों के खिलाफ नफरत फैलाती हो।
     
  • प्रभावित व्यक्ति की सहमति और एचआईवी से संबंधित स्थिति का खुलासा: बिल कहता है कि किसी व्यक्ति से सहमति लिए बिना उसकी एचआईवी जांच, मेडिकल उपचार या उस पर रिसर्च नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति की सहमति हासिल किए बिना, उसकी एचआईवी की स्थिति का खुलासा नहीं किया जा सकता। ऐसा अपवादस्वरूप तभी किया जा सकता है, जब अदालती आदेश द्वारा ऐसा करना अपेक्षित हो।
     
  • किसी लाइसेंसधारी ब्लड बैंक की स्क्रीनिंग, अदालती आदेश, मेडिकल रिसर्च और महामारी विज्ञान के उद्देश्यों, जहां जांच अज्ञात है और किसी व्यक्ति की एचआईवी स्थिति को निर्धारित करने के लिए नहीं की जा रही, के लिए एचआईवी जांच से पहले सहमति लिए जाने की जरूरत नहीं होगी। एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों के संबंध में सूचना रखने वाली संस्थाओं को आंकड़ों को सुरक्षित रखने के उपाय करने चाहिए।
     
  • केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिकाः केंद्र और राज्य सरकारों को निम्नलिखित उपाय करने चाहिए : (i) एचआईवी और एड्स को फैलने से रोकना, (ii) एचआईवी और एड्स प्रभावित व्यक्तियों को एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी प्रदान करना और उनके लिए इनफेक्शन मैनेजमेंट करना, (iii) विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों को कल्याणकारी योजनाओं के लाभ उपलब्ध कराना, (iv) एचआईवी या एड्स से जुड़े ऐसे शिक्षण कार्यक्रमों को प्रतिपादित करना, जो विभिन आयु वर्गों के अनुरूप, लिंग संवेदी और कलंक से रहित हों, (v) एचआईवी और एड्स प्रभावित बच्चों की देखभाल और उपचार के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करना। राज्य की देखरेख और अभिरक्षा में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एचआईवी की रोकथाम, जांच, उपचार और परामर्श सेवा प्राप्त करने का अधिकार होगा।
     
  • ओम्बड्स्मन की भूमिका: एक्ट के उल्लंघन और स्वास्थ्य सेवाओं के प्रावधानों की जांच करने के लिए प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा एक ओम्बड्स्मन की नियुक्ति की जानी चाहिए। यह ओम्बड्स्मन हर छह महीने में राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपेगा जिसमें दर्ज की गई शिकायतों की संख्या और प्रकृति, इस संबंध में की गई कार्रवाई और जारी किए गए आदेशों की जानकारी होगी।
     
  • संरक्षक: 12 से 18 वर्ष के बीच के बच्चों में अपने एचआईवी या एड्स प्रभावित परिवार के मामलों को समझने और देखभाल करने लायक परिपक्वता होती है। इस आयु वर्ग के बच्चे 18 वर्ष से छोटे अपने भाई-बहन के संरक्षक (गार्जियन) बनने के लिए सक्षम होंगे। इसके दायरे में शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला, बैंक खाता संचालित करना, प्रॉपर्टी को प्रबंधित करना, देखभाल और उपचार इत्यादि मामले आएंगे।
     
  • अदालत की कार्यवाहियां: एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों से संबंधित मामले अदालतों द्वारा जल्द निस्तारित किए जाने चाहिए। जिन भी कानूनी मामलों में, एचआईवी ग्रस्त या एचआईवी प्रभावित व्यक्ति पक्षकार है, वहां अदालत यह आदेश दे सकती है कि कार्यवाही निम्नलिखित प्रकार से संचालित की जा सकती है: (क) व्यक्ति की पहचान को छिपाकर, (ख) बंद कमरे में, और (ग) किसी ऐसी सूचना को प्रकाशित करने से रोककर जिससे आवेदक की पहचान प्रकट होती हो। एचआईवी ग्रस्त या एचआईवी प्रभावित व्यक्ति के भरण-पोषण के आवेदन के संबंध में आदेश जारी करते समय, अदालत उस व्यक्ति के चिकित्सा खर्च को भी ध्यान में रखेगी।

 

यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।