मंत्रालय: 
उपभोक्ता मामले एवं खाद्य वितरण
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    अगस्त 10, 2015
    Gray
  • रेफर
    स्टैंडिंग कमिटी
    अगस्त 26, 2015
    Gray
  • रिपोर्ट
    स्टैंडिंग कमिटी
    अप्रैल 26, 2016
    Gray
  • वापस लिए गए
    लोकसभा
    जनवरी 05, 2018
    Gray
  • उपभोक्ता संरक्षण बिल 2015, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री राम विलास पासवान द्वारा 10 अगस्त, 2015 को लोक सभा में पेश किया गया।
     
  • यह बिल उपभोक्ता संरक्षण एक्ट, 1986 की जगह लाया जाएगा।बिल के उद्देश्य और कारण कहते हैं कि ऐसा कानून का दायरा बढ़ाने और बाज़ार में परिवर्तनों के कारण उपभोक्ता संरक्षण कानून को आधुनिक बनाने के लिए किया गया है।
     
  • उपभोक्ता की परिभाषा: उपभोक्ता वह व्यक्ति होता है जो कोई वस्तु खरीदता है या सेवा किराए पर लेता है। इसमें ऐसी वस्तु या सेवा का उपयोगकर्ता शामिल होता है, दोबारा बिक्री या वाणिज्य उद्देश्यों के लिए वस्तु प्राप्त करने वाला नहीं। इसमें ऑफलाइन, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ऑनलाइन, टेलीशॉपिंग, या मल्टी लेवल मार्केटिंग सहित सभी प्रकार के लेनदेन शामिल हैं।
     
  • उपभोक्ता के अधिकार: उपभोक्ता के अधिकारों में शामिल हैं: (i) जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक वस्तुओं और सेवाओं की मार्केटिंग से सुरक्षा का अधिकार, (ii) वस्तु या सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, प्रभाव, शुद्धता, मानक और मूल्य की जानकारी का अधिकार, (iii) प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं या सेवाओं पाने के आश्वासन का अधिकारऔर (iv) अनुचित या बाधा डालने वाले व्यापार अभ्यासों के निवारण का अधिकार।
     
  • केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी (सीसीपीए): उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देने, संरक्षित और लागू करने के लिए केंद्र सरकार सीसीपीए की स्थापना करेगी। सीसीपीए बाकी कार्यों के अलावा निम्न कार्य करेगी: (i) उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन की पूछताछ, उपयुक्त मंच पर मुकदमे की जाँच और उसकी शुरुआत; (ii) वस्तुओं की वापसी के लिए आदेश पारित करना, या सेवाओं की वापसी और अदा मूल्य की भरपाई करना, और अनुचित व्यापार अभ्यासों को रोकने के लिए निर्देश जारी करना; (iii) सुरक्षा संबंधी सूचना जारी करना और विज्ञापनों को वापस लेने का आदेश; और (iv) ऐसे अनुबंधों को रद्द घोषित करना जो उपभोक्ता के लिए अनुचित हों।
     
  • उत्पाद का दायित्व: यदि किसी उत्पाद के निर्माण, विनिर्माण, डिज़ाइन, परीक्षण, सर्विस मार्केटिंग आदि में कमी के कारण उपभोक्ता को व्यक्तिगत रूप से चोट लगती है या संपत्ति को नुकसान होता है, तो उत्पाद देयता कार्रवाई के लिए निर्माता जिम्मेदार है।
     
  • उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग: उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की स्थापना जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर की जाएगी। उपभोक्ता इन आयोगों के पास निम्न के संबंध में शिकायत दर्ज कर सकता है: (i) अनुचित या बाधा डालने वाले व्यापार अभ्यास, (ii) खराब वस्तु या सेवाएँ, (iii) ज़्यादा या धोखे से कीमत लेना, (iv) बिक्री के लिए ऐसी वस्तुओं या सेवाओं की पेशकश करना जो जीवन और सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकती हैं, और (v) अनुचित अनुबंध के कारण घाटा होना
     
  • जिला आयोग किसी शिकायत के संबंध में निम्न आदेश जारी कर सकता है: खराबी ठीक करना, वस्तु बदलना, कीमत वापस करना, खतरनाक उत्पादों की बिक्री या निर्माण को रोकना, अनुचित व्यापार अभ्यासों को बंद करना या उपभोक्ता को होने वाले किसी नुकसान के लिए मुआवजा देना।  इसके निर्णयों पर राज्य आयोग में अपील की जा सकती है। इसके बाद राष्ट्रीय आयोग के सामने और फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने अपील दायर की जा सकती है।
     
  • उपभोक्ता मध्यस्थता सेल: बिल में उपभोक्ता विवाद के निपटान के तरीके के रूप में मध्यस्थ को प्रस्तावित किया गया है। उपभोक्ता मध्यस्थता सेल की स्थापना की जाएगी और उन्हें जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर निवारण आयोगों के साथ संबद्ध किया जाएगा।
     
  • दंड: किसी भी आयोग के आदेश को नहीं मानने वाले व्यक्ति को एक माह से तीन वर्ष तक का कारावास, या उसके साथ 10,000 रुपए से 50,000 रुपए तक का जुर्माना देना होगा।

 

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