मंत्रालय: 
वित्त
  • जारी
    जून 05, 2020
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  • अस्वीकृत
    सितंबर 19, 2020
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अध्यादेश की मुख्‍य विशेषताएं

  • इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता में कॉरपोरेट देनदार और क्रेडिटर्स, दोनों को इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति है। अध्यादेश में प्रावधान किया गया है कि 25 मार्च, 2020 से छह महीने की अवधि के दौरान होने वाले डीफॉल्ट्स पर इनसॉल्वेंसी की कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती (इस अवधि को एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है)।
     
  • अगर कोई डायरेक्टर या पार्टनर यह जानता था कि इनसॉल्वेंसी की कार्यवाही को टाला नहीं जा सकता, फिर भी उसने क्रेडिटर्स के संभावित नुकसान को कम करने के लिए उपयुक्त कदम नहीं उठाए तो उसे जिम्मेदार माना जा सकता है। अध्यादेश के अंतर्गत उपरिलिखित अवधि के दौरान डीफॉल्ट्स के लिए यह प्रावधान लागू नहीं होगा।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया पर प्रतिबंध लगाने से कई मुद्दे उठते हैं। पहला, यह उन मामलों में भी रेज़ोल्यूशन पर पाबंदी लगाता है जहां यह एसेट्स वैल्यू को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका है। दूसरा, यह देनदार के इस विकल्प को खत्म करता है कि वह पुनर्गठन के लिए इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया का लाभ उठाए। तीसरा, यह स्पष्ट नहीं कि कुछ खास डीफॉल्ट्स के खिलाफ इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया पर हमेशा के लिए रोक क्यों लगाई गई है।  
     
  • यह सवाल किया जा सकता है कि क्या कॉरपोरेट देनदार के पर्सनल गारंटर के खिलाफ उन डीफॉल्ट्स पर इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए जिनके लिए किसी देनदार के खिलाफ इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं की अनुमति नहीं है।

भाग क : अध्यादेश की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 में कंपनियों और व्यक्तियों की इनसॉल्वेंसी को रिज़ॉल्व करने की समयबद्ध प्रक्रिया का प्रावधान है। इनसॉल्वेंसी वह स्थिति हैजब व्यक्ति या कंपनियां अपना बकाया ऋण नहीं चुका पाते। कोविड-19 संकट के मद्देनजर विश्व बैंक ने इनसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क की दो मुख्य चुनौतियों को स्पष्ट किया था: (iसामान्य स्थितियों में व्यवहार्य कंपनियों को समय से पहले इनसॉल्वेंसी में जाने से रोकने की जरूरत, और (iiऐसी फर्म्स की संख्या में बढ़ोतरी जोकि इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन के अभाव में इस संकट का सामना नहीं कर पाएंगी।[1]  भारत में इनसॉल्वेसी प्रक्रियाओं को शुरू करने के लिए डीफॉल्ट की सीमा को एक लाख रुपए से बढ़ाकर एक करोड़ रुपए किया गया।[2] इसके अतिरिक्त रेगुलेशंस में संशोधन किए गए और यह प्रावधान किया गया कि कुछ गतिविधियों के लिए चालू प्रक्रियाओं की समय सीमा में लॉकडाउन की अवधि को नहीं गिना जाएगा।[3]  इस सिलसिले में इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2020 को 5 जून, 2020 को जारी किया गया।[4] अध्यादेश के अनुसार, कोविड-19 ने व्यापार क्षेत्र के लिए अनिश्चितता और तनाव पैदा किया है जोकि उनके नियंत्रण में नहीं है। ऐसे में ऋण भुगतान में डीफॉल्ट करने वाले कॉरपोरेट देनदार को बचाने के लिए पर्याप्त संख्या में रेज़ोल्यूशन एप्लिकेंट्स का मिलना मुश्किल है।4 

मुख्य विशेषताएं

  • कुछ डीफॉल्ट्स के लिए इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को शुरू करने पर प्रतिबंध: संहिता कॉरपोरेट देनदार और क्रेडिटर्स को इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति देती है। अध्यादेश में प्रावधान है कि 25 मार्च, 2020 से छह महीने के दौरान होने वाले डीफॉल्ट्स के लिए (जिसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है) कॉरपोरेट देनदार या उसके क्रेडिटर्स इनसॉल्वेंसी की कार्यवाही शुरू नहीं कर सकते।
     
  • अनुचित व्यापारकुछ स्थितियों में कॉरपोरेट देनदार के डायरेक्टर या पार्टनर को कंपनी के एसेट्स में व्यक्तिगत योगदान करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यह जिम्मेदारी तब भी ठहराई जाएगी, जब कोई डायरेक्टर या पार्टनर यह जानता था कि इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को टाला नहीं जा सकता, फिर भी उसने क्रेडिटर्स के संभावित नुकसान को कम करने के लिए उपयुक्त कदम नहीं उठाए। रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल ऐसे व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहराने के लिए एनसीएलटी में आवेदन कर सकता है। अध्यादेश रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल को उन डीफॉल्ट्स के संबंध में आवेदन दायर करने से प्रतिबंधित करता है जिनके लिए इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं पर पाबंदी लगाई गई है।

भाग ख: प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

कुछ डीफॉल्ट्स के लिए इनसॉल्वेसी रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया को शुरू करने पर पाबंदी

इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता 2016 (आईबीसी) में कॉरपोरेट देनदार और क्रेडिटर्स को इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया को शुरू करने की अनुमति दी गई है। अध्यादेश में यह प्रावधान किया गया है कि 25 मार्च, 2020 से लेकर छह महीने के दौरान (जिसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है) किए गए डीफॉल्ट्स के लिए कोई भी इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकता, न ही खुद कॉरपोरेट देनदार और न ही उसका कोई क्रेडिटर। हम इससे जुड़े कुछ मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।  

कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को पूरी तरह से रोकने की जरूरत 

अध्यादेश एक निर्दिष्ट अवधि में होने वाले डीफॉल्ट्स के खिलाफ इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं को शुरू करने पर पाबंदी लगाता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या इस प्रक्रिया को पूरी तरह से रोकने की जरूरत थी। एक तरफ कंपनियों को बचाने की जरूरत थी जोकि महामारी से पहले वायबल यानी वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य थीं और जिनकी इनसॉल्वेंसी अस्थायी है ताकि वे समय पहले इनसॉल्वेंसी में न चली जाएं।1  दूसरी तरफ इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं पर पूरी तरह से रोक लगाने से तनावग्रस्त कंपनियों को आईबीसी फ्रेमवर्क के अंतर्गत मदद मांग करने का अवसर नहीं मिलेगा। कुछ कंपनियों के लिए इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं को स्थगित करने से उनका वित्तीय संकट और गहरा हो सकता है और वैल्यू में गिरावट हो सकती है।   

अध्यादेश यह भी कहता है कि इस दौरान पर्याप्त संख्या में रेज़ोल्यूशन एप्लिकेंट्स मिलना मुश्किल है।4  इससे कंपनी के लिक्विडेशन का जोखिम बढ़ जाता है जिसे सामान्य स्थिति में बिक्री द्वारा बचाया जा सकता है। हालांकि इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया का एक और संभावित परिणाम ऋण का पुनर्गठन है। इसमें इनसॉल्वेंसी को रिज़ॉल्व करने के लिए ऋण बाध्यताओं को पुनर्गठित किया जाता है लेकिन कंपनी को किसी थर्ड पार्टी खरीदार को नहीं बेचा जाता। उदाहरण के लिए युनाइडेट किंगडम में इनसॉल्वेंसी कानून को जून 2020 में संशोधित किया गया ताकि वित्तीय संकट से जूझने वाली कंपनियों को पुनर्गठन के नए विकल्प दिए जा सकें।[5]

इसके अतिरिक्त यह सवाल उठता है कि निर्दिष्ट अवधि के दौरान सभी डीफॉल्ट्स के साथ एक जैसा व्यवहार करने की क्या जरूरत है। ऐसे डीफॉल्ट्स भी हो सकते हैं जोकि कोविड-19 संबंधी व्यवधानों के कारण न हुए हों, बल्कि महामारी से पहले कंपनी की किसी समस्या का परिणाम हों। यह कहा जा सकता है कि डीफॉल्ट कोविड-19 के कारण हुआ है या नहीं, यह व्याख्या का विषय है और विवादों को उत्पन्न कर सकता है जिसके कारण मुकदमेबाजी की आशंका बढ़ सकती है। 

कॉरपोरेट देनदार पर इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को शुरू करने की पाबंदी 

अध्यादेश के अंतर्गत कॉरपोरेट देनदार इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को शुरू नहीं कर सकता। सवाल यह है कि क्या उसे इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को शुरू करने से रोका जाना चाहिए। कॉरपोरेट देनदार इस बात का आकलन बेहतर तरीके से कर सकता है कि इनसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क के अंतर्गत सहायता जरूरी है। इनसॉल्वेंट देनदार द्वारा इनसॉल्वेंसी की कार्यवाहियों को स्वेच्छा से और समय पर शुरू करने से देनदार और लेनदार दोनों को अधिक से अधिक लाभ हो सकता है। उल्लेखनीय है कि स्पेन, जर्मनी और फ्रांस में क्रेडिटर द्वारा इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं को शुरू करने पर तो पाबंदी थी लेकिन देनदार द्वारा इनसॉल्वेंसी को फाइल से संबंधित प्रावधान में राहत दी गई थी। देनदार द्वारा स्वैच्छिक इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं के लिए अनुमति दी गई है।1,[6]

निर्दिष्ट डीफॉल्ट्स के खिलाफ इनसॉल्वेंसी की कार्यवाहियों पर हमेशा के लिए पाबंदी

अध्यादेश कहता है कि निर्दिष्ट अवधि के दौरान होने वाले डीफॉल्ट्स के खिलाफ इनसॉल्वेंसी की कोई कार्यवाही कभी भी शुरू नहीं की जा सकती। इससे ऐसा परिदृश्य उभर सकता है जब क्रेडिटर्स कंपनी को इन डीफॉल्ट्स के लिए जिम्मेदार न ठहरा सकें, जबकि कंपनी की भुगतान करने की क्षमता बहाल हो गई हो। यह अस्पष्ट है कि अस्थायी विपरीत परिस्थितियों के बदल जाने के बाद भी देनदार को इन डीफॉल्ट्स की देनदारियों से क्यों बचाया जा रहा है।  

कॉरपोरेट देनदार के पर्सनल गारंटर के खिलाफ इनसॉल्वेंसी की कार्यवाहियों को शुरू करना

संहिता के अंतर्गत कॉरपोरेट देनदार के पर्सनल गारंटर के खिलाफ इनसॉल्वेंसी की कार्यवाहियां शुरू की जा सकती हैं।[7] यह एक ऐसा व्यक्ति होता है जो कॉरपोरेट देनदार के ऋण के लिए गारंटी प्रदान करता है। हालांकि अध्यादेश निर्दिष्ट अवधि के दौरान होने वाले डीफॉल्ट्स के लिए कॉरपोरेट देनदार के खिलाफ इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं पर पाबंदी लगाता है लेकिन पर्सनल गारंटर के खिलाफ ऐसी कार्यवाहियों का निषेध नहीं करता। सवाल यह है कि क्या पर्सनल गारंटर को उन डीफॉल्ट्स के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए जिनके लिए मूल देनदार की देनदारियों में राहत दे दी गई है।

 

[2].  Aatma Nirbhar Bharat Package – Progress So Far, Press Information Bureau, Ministry of Finance, July 12, 2020.

[7].  The Insolvency and Bankruptcy (Application to Adjudicating Authority for Insolvency Resolution Process for Personal Guarantors to Corporate DebtorsRules, 2019.

 

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