मंत्रालय: 
विधि एवं न्याय
  • प्रस्तावित
    लोकसभा
    जून 06, 2018
  • प्रस्तावित-अस्वीकृत
    लोकसभा
    जुलाई 31, 2018
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अध्यादेश की मुख्‍य विशेषताएं

  • अध्यादेश यह स्पष्ट करने के लिए इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 में संशोधन करता है कि रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट के एलॉटीज़ के साथ फाइनांशियल क्रेडिटर के तौर व्यवहार किया जाए।
     
  • कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स के रूटीन फैसलों के लिए वोटिंग की सीमा को 75% से घटाकर 51% किया गया है। कुछ मुख्य फैसलों के लिए यह सीमा घटाकर 66% की गई है।  
     
  • अध्यादेश संहिता के अंतर्गत एनसीएलटी में दायर की गई रेज़ोल्यूशन एप्लीकेशन को वापस लेने की अनुमति देता है। कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स के 90% वोट के साथ यह फैसला लिया जा सकता है।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट के एलॉटीज़ को फाइनांशियल क्रेडिटर के रूप में वर्गीकृत करने के औचित्य पर सवाल उठ सकते हैं। इसके अतिरिक्त अध्यादेश यह स्पष्ट नहीं करता कि एलॉटीज़ सुरक्षित (सेक्योर्ड) क्रेडिटर हैं या असुरक्षित (अनसेक्योर्ड) क्रेडिटर। एलॉटीज़ की स्थिति स्पष्ट न होने के कारण उनकी वरीयता को लेकर अनिश्चितता हो सकती है कि इनसॉल्वेंसी की कार्यवाहियों के दौरान उन्हें उनका बकाया कब मिलेगा। 

भाग क : अध्यादेश की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 कंपनियों और व्यक्तियों के बीच इनसॉल्वेंसी को रिज़ॉल्व करने के लिए एक समयबद्ध प्रक्रिया प्रदान करती है। इनसॉल्वेंसी वह स्थिति है, जब व्यक्ति या कंपनियां अपना बकाया ऋण नहीं चुका पाते। नवंबर 2017 में संहिता की समीक्षा करने, उसे लागू करने में आने वाली समस्याओं को चिन्हित करने और सुझाव देने के लिए इनसॉल्वेंसी लॉ कमिटी का गठन किया गया था।[1]  कमिटी ने मार्च 2018 में अपनी रिपोर्ट सौंपी।[2] उसने अनेक सुझाव दिए जैसे सूक्ष्म, लघु और मध्यम दर्जे के उपक्रमों को संहिता के कुछ प्रावधानों से छूट दी जाए, रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट के एलॉटीज़ के साथ फाइनांशियल क्रेडिटर्स के तौर पर व्यवहार किया जाए, कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स की वोटिंग की सीमा को कम किया जाए, इत्यादि। इसके बाद 6 जून, 2018 को इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2018 जारी किया गया।

प्रमुख विशेषताएं

  • एलॉटीज़ की स्थिति: संहिता स्पष्ट करती है कि फाइनांशियल क्रेडिटर ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्होंने देनदार को किसी प्रकार का लोन या फाइनांशियल क्रेडिट दिया होता है। अध्यादेश स्पष्ट करता है कि किसी रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट के एलॉटी (अंडर-कंस्ट्रक्शन रेज़िडेंशियल या कमर्शियल प्रॉपर्टी के खरीदार) को फाइनांशियल क्रेडिटर समझा जाएगा, चूंकि किसी रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट की फाइनांसिंग के लिए एलॉटीज से कमर्शियल स्तर पर उधार लिया जाता है।  
     
  • फाइनांशियल क्रेडिटर्स के प्रतिनिधि: इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया के दौरान फैसले लेने (वोट द्वारा) के लिए फाइनांशियल क्रेडिटर्स की कमिटी का गठन किया जाएगा। अध्यादेश स्पष्ट करता है कि कुछ मामलों में, जैसे जब ऋण क्रेडिटर्स के एक समूह पर बकाया है, कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स में फाइनांशियल क्रेडिटर्स का प्रतिनिधित्व अधिकृत प्रतिनिधियों द्वारा किया जाएगा। क्रेडिटर्स से मिलने वाले पूर्व निर्देशों के अनुसार, ये प्रतिनिधि कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स में वोट देंगे।
     
  • कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स की वोटिंग की सीमा: कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स के फैसलों के लिए वोटिंग की सीमा 75% से घटाकर 51% कर दी गई है। कुछ मुख्य फैसलों के लिए यह सीमा घटाकर 66% की गई है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति, (ii) रेज़ोल्यूशन प्लान की मंजूरी, (iii) इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया की समय सीमा को बढ़ाना।
     
  • रेज़ोल्यूशन एप्लीकेंट होने की अयोग्यता: अध्यादेश उस मानदंड में संशोधन करता है जो किसी व्यक्ति को रेज़ोल्यूशन प्लान सौंपने से रोकता है। उदाहरण के लिए संहिता किसी ऐसे व्यक्ति को रेज़ोल्यूशन एप्लीकेंट होने से रोकती है, जिसके एकाउंट को एक वर्ष से अधिक समय से नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) के रूप में चिन्हित किया गया है। अध्यादेश प्रावधान करता है कि यह मानदंड लागू नहीं होगा, अगर वह एप्लीकेंट एक फाइनांशियल एंटिटी है और देनदार से संबंधित पक्ष नहीं है (कुछ अपवादों को छोड़कर)। दूसरा, संहिता कहती है कि किसी डीफॉल्टर का गारंटर भी एप्लीकेंट नहीं हो सकता। अध्यादेश स्पष्ट करता है कि यह प्रतिबंध उस स्थिति में लागू होगा, जब क्रेडिटर ने ऐसी गारंटी का इस्तेमाल तो कर लिया है, लेकिन ऋण नहीं चुकाया है।
     
  • सूक्ष्म, लघु और मध्यम दर्जे के उपक्रमों (एमएसएमईज़) पर संहिता का लागू होना: अध्यादेश कहता है कि एनपीएज़ और गारंटरों से संबंधित अयोग्यता के मानदंड एमएसएमईज़ के रेज़ोल्यूशन के लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों पर लागू नहीं होंगे। संहिता के अन्य प्रावधानों को एमएसएमईज़ पर लागू करते समय केंद्र सरकार जनहित में उनमें परिवर्तन कर सकती है या उन्हें हटा सकती है।
     
  • दायर की गई एप्लीकेशंस को वापस लेना: रेज़ोल्यूशन एप्लीकेंट राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में दायर की गई किसी एप्लीकेशन को वापस ले सकता है, इसके बावजूद कि प्रोसेस शुरू हो गया हो। वापसी के इस प्रस्ताव को कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स के 90% वोट द्वारा मंजूर किया जाना चाहिए।

भाग ख:  प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट में एलॉटीज का फाइनांशियल क्रेडिटर्स के तौर पर वर्गीकरण

कॉरपोरेट देनदार के संबंध में संहिता दो प्रकार के क्रेडिटर्स को परिभाषित करती है: (i) फाइनांशियल क्रेडिटर, जो देनदार को लोन या फाइनंशियल क्रेडिट देते हैं, और (ii) ऑपरेशनल क्रेडिटर्स, जो देनदार को वस्तुएं या सेवाएं देते हैं पर जिनका भुगतान बाकी होता है। फाइनांशियल क्रेडिटर्स सुरक्षित या असुरक्षित हो सकते हैं। सुरक्षित क्रेडिटर वे होते हैं जिनके लोन को कोलेट्रल (सिक्योरिटी) से सुरक्षा मिली होती है।  

उदाहरण के लिए ए नाम का व्यक्ति रेस्त्रां शुरू करने का फैसला करता है। वह बैंक से लोन लेता है ताकि रेस्त्रां के लिए प्रॉपर्टी खरीद सके। इसके लिए वह प्रॉपर्टी की जमीन को कोलेट्रल के तौर पर इस्तेमाल करता है। उसका दोस्त बी शुरुआती खर्चे, जैसे शेफ्स और दूसरे सपोर्ट स्टाफ की सैलरी चुकाने, सामान खरीदने के लिए उसे कुछ राशि उधार देता है। इस उदाहरण में बैंक और दोस्त बी फाइनांशियल क्रेडिटर हैं। बैंक एक सुरक्षित फाइनांशियल क्रेडिटर है, चूंकि उसका लोन कोलेट्रल (रेस्त्रां की जमीन) से सुरक्षित है और दोस्त बी एक असुरक्षित क्रेडिटर है। रेस्त्रां के शेफ्स, स्टाफ ऑपरेशनल क्रेडिटर्स हैं। सामान का सप्लायर भी ऑपरेशनल क्रेडिटर है।

अध्यादेश स्पष्ट करता है कि रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट में एलॉटीज़ को फाइनांशियल क्रेडिटर समझा जाएगा। इससे एलॉटीज को निम्नलिखित प्राप्त होगा: (i) रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया को शुरू करने की शक्ति, (ii) कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स में प्रतिनिधित्व, और (iii) लिक्विडेशन की स्थिति में एक निश्चित राशि मिलने की गारंटी।

एलॉटीज़ को फाइनांशियल क्रेडिटर्स के तौर पर वर्गीकृत करने के औचित्य पर सवाल उठाए जा सकते हैं

इनसॉल्वेंसी लॉ कमिटी (2017) ने कहा था कि रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट के एलॉटीज़ द्वारा चुकाई राशि दरअसल प्रॉजेक्ट को फाइनांस करने के लिए जमा की जाती है, इसलिए उसे फाइनांशियल ऋण कहा जाएगा।2 यह भी कहा गया कि कुछ मामलों मे एलॉटीज़ रियल एस्टेट प्रॉजेक्ट के लिए बैंक से अधिक धन देते हैं। अध्यादेश प्रावधान करता है कि रियल एस्टेट प्रॉजेक्ट की बिक्री के दौरान एलॉटीज़ से जमा की गई राशि कमर्शियल स्तर का उधार होता है और इसीलिए इसे रियल ऐस्टेट कंपनी (या देनदार) का वित्तीय ऋण समझा जाए। हालांकि यह कहा जा सकता है कि रियल ऐस्टेट प्रॉजेक्ट के एलॉटीज़ से जमा राशि भविष्य के एसेट (या उन्हें एलॉट की गई प्रॉपर्टी) के लिए अग्रिम भुगतान है। इसे डेवलपर को ब्याज पर दिए जाने वाले स्पष्ट लोन की तरह या ऐसे लोन की तरह नहीं देखा जाता जिसमें पैसे की कोई टाइम वैल्यू होती है, इसलिए यह फाइनांशियल ऋण के रूप में क्वालिफाई नहीं हो सकता

एलॉटीज़ को फाइनांशियल क्रेडिटर्स के तौर पर वर्गीक़ृत करने से लिक्विडेशन के दौरान उनकी वरीयता स्पष्ट नहीं होती

कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया के दौरान फैसले लेने के लिए फाइनांशियल क्रेडिटर्स की कमिटी का गठन किया जाएगा। कमिटी निम्नलिखित का चुनाव कर सकती है: (i) देनदार कंपनी को रिज़ॉल्व करना, या (ii) लोन चुकाने के लिए देनदार के एसेट्स को लिक्विडेट करना (बेचना)। अगर कमिटी निर्धारित समय सीमा में फैसला नहीं लेती तो ऋण चुकाने के लिए देनदार के एसेट्स को लिक्विडेट कर दिया जाता है। लिक्विडेशन की स्थिति में रेज़ोल्यूशन की फीस और दूसरी लागत चुकाने के बाद सबसे पहले सुरक्षित क्रेडिटर्स को भुगतान किया जाता है। फिर कर्मचारियों का वेतन चुकाया जाता है और इसके बाद सभी असुरक्षित क्रेडिटर्स को भुगतान किया जाता है।

हालांकि अध्यादेश एलॉटीज़ को फाइनांशियल क्रेडिटर कहता है लेकिन यह स्पष्ट नहीं करता कि उन्हें सुरक्षित क्रेडिटर माना जाएगा या असुरक्षित क्रेडिटर। इसलिए वरीयता क्रम में उनकी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

 

[1].  ‘Constitution of Insolvency Law Committee, Order Number 35/14/2017, Ministry of Corporate Affairs, November 16, 2017.

[2].  Report of the Insolvency Law Committee, March 2018. 

 

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