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16वीं लोकसभा- मौके हैं तो मुश्किलें भी

May 20th, 2014 1 comment

हम सबने यह देखा है कि भारतीय संसदीय इतिहास में 15वीं लोकसभा का कार्यकाल सबसे निराशाजनक में से एक रहा। कमोबेश निर्धारित समय का 40 फीसद बाधित रहा। पूर्ण लोकसभा के कार्यकाल में सबसे कम बिल पारित हुए। इससे न केवल सरकार के विधायी कार्य गंभीर रूप से बाधित हुए बल्कि अपने निर्वाचिकों का प्रतिनिधित्व करते हुए हमारे सांसद सरकार को जवाबदेह बनाने के मौके से भी वंचित रहे। अक्सर बाधित रहने, पेपर स्प्रे कांड, कार्यवाही का वाकआउट और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बार-बार व्यवस्था बनाए रखने की मनुहार करते रहने वाकयों के लिए 15वीं लोकसभा याद की जाती रही। अब जब 15वीं लोकसभा अपने कार्यकाल की समाप्ति की ओर पहुंच चुकी है, तो ऐसा लगता है कि यह महत्वपूर्ण संस्था अपनी साख और विश्वसनीयता खोती दिख रही है। ऐसे में 16वीं लोकसभा से इसकी साख और विश्वसनीयता बरकरार रखने की लोगों की अपेक्षाएं और आकांक्षाएं ज्यादा बढ़ जाती हैं।

विधायी एजेंडा

राज्यसभा में मौजूदा समय में 60 बिल लंबित हैं। इनमें राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज बिल भी शामिल है। लोगों को विशिष्ट पहचान संख्या जारी करने के लिए स्थापित किए जाने वाले राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण संबंधी नेशनल आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया बिल और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक (संशोधन) बिल भी लंबित हैं। इनमें से कई बिलों के अपने खास महत्व हैं और ये बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करते हैं। नई गठित लोकसभा को इन बिलों को पारित करने को अपनी प्राथमिकता में लेना होगा।

इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार को रोकने संबंधी बिलों का एक पूरा समूह है जिसे पूर्व की लोकसभा में सिरे नहीं चढ़ाया जा सका। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए संसद में पेश किए गए इन नौ बिलों में से केवल तीन ही दोनों सदनों से पारित किए जा सके हैं। बचे हुए छह बिल सिटिजन चार्टर, इलेक्ट्रॉनिक सर्विस डिलीवरी, बेनामी ट्रांजैक्शन, सरकारी खरीदफरोख्त, ज्युडिशियल स्टैंडर्ड और प्रीवेंशन ऑफ ब्राइबेरी ऑफ फॉरेन ऑफिशियल लैप्स हो चुके हैं। वित्तीय और आर्थिक क्षेत्रों से जुड़े कुछ अहम बिल जैसे जीएसटी बिल, डायरेक्ट कोड बिल, माइक्रोफाइनेंस बिल और माइंस व मिनरल्स बिल पिछली लोकसभा से नहीं पारित कराए जा सके।

संसद को मजबूती

हमारे प्रतिनिधि लोकतंत्र में चुने गए प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होते हैं। अपने वर्तमान स्वरूप में एंटी डिफेक्शन लॉ हमारे लोकतंत्र की स्वत: स्फूर्त प्रक्रिया चेक एंड बैलेंस को कमजोर करता है। इस बिल का मकसद सरकार की अस्थिरता को कम करना था, लेकिन यह सांसदों के उनके निर्वाचकों के हितों की आवाज उठाने की स्वतंत्रता को सीमित करता दिखता है। 15वीं लोकसभा में करीब एक चौथाई बिल 30 मिनट के भीतर ही पारित हो गए जिसका आशय यह है कि व्यावहारिक रूप से इनको लेकर कोई बहस नहीं हुई। 25 फीसद से कम बिलों पर तीन घंटे से अधिक की बहस हुई। यह संकेत देता है कि महत्वपूर्ण मसलों से संबंधी बिल अक्सर अपर्याप्त बहस और समझ के ही पारित हो रहे हैं। नई लोकसभा को अपने सांसदों को उचित मौके और पर्याप्त समय देना चाहिए जिससे वे किसी बिल को लेकर अपनी राय जाहिर कर सकें और बिल को पारित करने से पहले उसके विभिन्न प्रावधानों के निहितार्थ सामने आ सकें। अधिकांश बिल ध्वनिमत से पारित हो जाते हैं। इसमें किसी को यह पता नहीं चलता कि इस पर प्रत्येक सांसद ने कैसे और किस तरह वोट किया। किसी बिल पर सांसदों द्वारा किए गए वोट को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे सांसदों और संसद की कार्यशैली में बहुत बड़ी पारदर्शिता और जवाबदेही लायी जा सकती है। कुछ अन्य सीमाएं भी अस्तित्व में हैं जो संसद को ज्यादा प्रभावी होने के आड़े आती हैं। इनमें सांसदों को उनके संसदीय उत्तरदायित्व निभाने के लिए रिसर्च की अपर्याप्त मदद, एक कमजोर कमेटी प्रणाली जिसकी कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है, विधायी जांच और फीडबैक से पहले की प्रक्रिया की कमी, सदन में मामलों को उठाने के लिए सांसदों के पास पर्याप्त समय की अनुपलब्धता आदि शामिल हैं। इन बाधाओं को दूर करके नई गठित लोकसभा के सदस्य अपना उत्तरदायित्व प्रभावी तरीके से संपन्न कर पाएंगे।

संसद उन कुछ चुनिंदा संस्थाओं में है जिसे हमारे पूर्वजों ने इस भरोसे के साथ हमें सौंपा है जिस पर हम तर्कसंगत तरीके से गर्व कर सकें। 16वीं लोकसभा के हमारे प्रतिनिधियों के पास अब उस दायित्व को पूरा करने के लिए वह मौका और चुनौती है जिसकी मदद से हम सब अधिक विचारात्मक और सृजनात्मक लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ सकें।

– This article was published in Dainik Jagran on May 18, 2014.